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दशकों से यूपी की सत्ता में हिस्सेदारी मांग रहे हैं राजभर, बसपा के बाद ओमप्रकाश राजभर ने दिखाया है सपना

उत्तर प्रदेश अपनी जाति केंद्रित राजनीति के लिए मशहूर है. प्रदेश में जातियों की पार्टियां हैं तो पार्टियों की जातियां भी हैं, आइए जानते हैं कि प्रदेश में अति पिछड़ी मानी जानेी वाली राजभर किस दिशा में जा रही है.

दशकों से यूपी की सत्ता में हिस्सेदारी मांग रहे हैं राजभर, बसपा के बाद ओमप्रकाश राजभर ने दिखाया है सपना
नई दिल्ली:

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब बस कुछ ही महीने रह गए हैं. इस वजह से राज्य का राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है. चुनाव से पहले ही नेताओं की बयानबाजी तेज हो गई है. इस काम में सबसे आगे हैं योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर. सोशल मीडिया पर वो समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर निशाना साधने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं. राजभर ने अखिलेश यादव के पीडीए वोट बैंक की नई परिभाषा दी है, 'पीट देगा अहीर'. कांशीराम की बसपा से अपनी राजनीति शुरू करने वाले ओमप्रकाश राजभर ने 2002 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नाम से अपनी नई पार्टी बना ली थी. वो अब तक सपा समेत कई राजनीतिक दलों से समझौता कर चुनाव लड़ चुके हैं. आइए जानते हैं कि राजभर की राजनीति कैसी रही है और उनका आधार वोट क्या है. 

बसपा के संस्थापक कांशीराम राजनीति में बहुजन का सिद्धांत लेकर आए थे. उनके बहुजन में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अल्पसंख्यक समाज आता है, माना जाता है कि भारतीय समाज में इस बहुजन की आबादी करीब 85 फीसदी है. इनमें से एससी-एसटी और अल्पसंख्यकों की जनसंख्या तो पता है, लेकिन ओबीसी की आबादी नहीं पता है. मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार में ओबीसी राजनीति को पंख लग गए. इसी के बाद जनता दल बिखरना शुरू हुआ. जनता दल के बिखरे नेताओं ने ही समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय लोकदल जैसे दलों का गठन किया. इसके बाद देश में ओबीसी राजनीति चल निकली. लेकिन नई सदी में पिछड़ी जातियों में भी अति पिछड़ी जातियों को लगा कि वो इस राजनीति में ठगे जा रहे हैं. इसके बाद उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागने लगी. इसी के तहत ओमप्रकाश राजभर ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी  का गठन किया. शुरू में उन्होंने अपनी जाति राजभर को संगठित करना शुरू किया. इसमें उन्हें सफलता भी मिली. 

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राजभरों की पार्टी सुभासपा

सुभासपा मुख्य रूप से अति पिछड़ी जाती राजभर की राजनीति करती है. साल 2001 में बनी सामाजिक न्याय समिति जिसे हुकुम सिंह समिति भी कहा जाता है, उसके अनुसार प्रदेश में राजभर आबादी 2.44 फीसदी है.राजभर जाति के लोगों ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से लोहा लिया था. वो खुद को मध्ययुगीन महाराजा सुहेलदेव राजभर का वंशज होने का दावा करते हैं. कई औपनिवेशिक गजेटियर में भी राजा सुहेलदेव का उल्लेख राजभर और पासी राजा के रूप में भी मिलता है. इससे उन पर राजभरों का दावा विवाद का विषय है. लेकिन महाराजा सुहेलदेव पर राजभरों का दावा अकेला नहीं है, उन पर क्षत्रियों के साथ-साथ पासी जाति के लोग भी अपना दावा जताते हैं.  

इस जाति का प्रभाव केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही है. माना जाता है कि करीब 60 सीटों पर राजभर जाति के वोटों की संख्या ठीक-ठाक है.पूर्वांचल के ये जिले हैं वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, देवरिया, बलिया और मऊ. ओमप्रकाश राजभर मऊ जिले की जहूराबाद सीट से विधायक हैं. इनके अलावा गोरखपुर, संतकबीरनगर, महराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, बहराइच, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, श्रावस्ती, अयोध्या और अंबेडकरनगर में भी राजभर आबादी है. ओमप्रकाश राजभर अपनी राजभर जाती के अलावा भर, शाक्य, सैनी, अर्कवंशी अर्क, आरक, नोनिया, तेली, तमेरा, बार, वियार, बारी, बंजारा, पाल, प्रजापति, कुम्हार, लोहार, चौहान, निषाद, माली, केवट, बिंद, नाई, अहिरवार, विरार, वनवासी, गड़रिया, धीमर, धोबी, कोइरी, डोम, पतझर, गोंड और वाल्मीकि जाति का प्रतिनिधित्व करन का दावा करते हैं.ये वो जातियां हैं, जिनका प्रतिनिधित्व संसद-विधानसभाओं और सरकारी नौकिरयों में बहुत ही कम है. ओमप्रकाश राजभर जिस राजभर जाति से आते हैं, उसे पूर्वी उत्तर प्रदेश में भर के नाम से जाना जाता है. यह छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों की जाति है. वाराणसी में 2002 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की स्थापना करते हुए ओमप्रकाश राजभर ने अपनी पार्टी को अति पिछड़ों, अति दलितों और अल्पसंख्यकों की पार्टी बताया था. ओमप्रकाश राजभर से पहले राजभर जाति की राजनीतिक ताकत को बहुजन समाज पार्टी ने पहचाना था. उसने अपनी पार्टी में राजभरों को जगह दी थी. ओमप्रकाश राजभर भी पहले बसपा में ही थे. बसपा ने आजमगढ़ के सुखदेव राजभर को विधानसभा का अध्यक्ष भी बनाया था. वो कई बार विधायक रहे. इसके अलावा बसपा ने भीम राजभर नाम के एक राजभर नेता को अपना प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया था. 

चुनावों में कैसा रहा है सुभासपा का प्रदर्शन

सुभासपा 2007 के विधानसभा चुनाव से मैदान में उतरी लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. सुभासपा ने 97 सीटों पर मैदान में थी, इनमें से वह एक सीट पर दूसरे और आठ सीटों पर तीसरे नंबर पर रही. उसको करीब पांच लाख वोट मिले थे. उसने 2012 का चुनाव 52 सीटों पर लड़ा.लेकिन इस बार भी उसे कोई सफलता नहीं मिली. उसके उम्मीदवार नौ सीटों पर तीसरे नंबर पर रहे और पार्टी को पौने पांच लाख के आसपास वोट मिले थे.शुरूआती असफलता से परेशान सुभासपा ने 2017 के चुनाव में बीजेपी से हाथ मिला लिया. इसका उसे फायदा भी मिला और वह चार सीटें जीतने में कामयाब रही. विधानसभा चुनाव में यह सुभासपा को मिली पहली सफलता थी. लेकिन 2022 के चुनाव से पहले बीजेपी से गठबंधन तोड़ सपा से जा मिले. सपा ने उन्हें बीजेपी से अधिक सीटें लड़ने के लिए दीं. सुभासपा उस चुनाव में 19 में से छह सीटें जीत ली थीं. सपा-सुभासपा की दोस्ती बहुत दिनों तक नहीं चली. साल 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले सुभासपा ने एक बार फिर बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया. लेकिन 2004 से लोकसभा का चुनाव लड़ रही सुभासपा अभी तक जीत का स्वाद नहीं चख पाई है.

बीजेपी और सपा में राजभर जाति के नेता

ऐसा नहीं है कि राजभरों की राजनीति केवल ओमप्रकाश राजभर ही करते हैं. उनसे पहले भी राजभर नेता प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे हैं. बीजेपी ने हरिनारायण राजभर और सकल दीप राजभर को आगे बढ़ाया. वहीं अनिल राजभर अभी उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. ओमप्रकाश राजभर ने जिस सुहेलदेव का नाम अपनी पार्टी में जोड़ा है. उन सुहेलदेव का राष्ट्रीय स्मारक भी बीजेपी ने ही बहराइच में बनवाया है. वहीं अगर समाजवादी पार्टी की बात करें तो उसने भी राजभर नेताओं को आगे बढ़ाया है. लोकसभा चुनाव में उसने रमाशंकर राजभर को सलेमपुर से टिकट दिया था. वो जीतने में भी कामयाब रहे.इसी तरह से उसके  सपा ने सुभासपा छोड़कर आईं सीमा राजभर को अपनी महिला मोर्चा की कमान सौंपी हैं. सपा में सक्रिय होने के बाद से सीमा ओमप्रकाश राजभर पर लगातार निशाना साध रही हैं. इससे वो असहज होते दा रहे हैं. कहा यह भी जा रहा है कि सीमा राजभर के सपा जाने के बाद से ही ओमप्रकाश राजभर ने सपा और अखिलेश यादव पर हमला तेज कर दिया है. वहीं अगर सुभासपा की बात करें तो पार्टी में उनके अलावा कोई और बड़ा नेता नहीं है. पार्टी की कमान ओमप्रसाश राजभर के अलावा उनके बेटे अरविंद और अरुण राजभर हैं.

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