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बिहार का क्या है 'मंगल ग्रह' से संबंध, शेरघाटी के किस 'पत्थर' का अध्ययन करने में जुटे हैं वैज्ञानिक

कहानी 25 अगस्त 1865 को बिहार के शेरघाटी के एक खेत में गिरे उस उल्कापिंड की जो करीब 40 किमी की दूरी तय कर भारत आया था.

बिहार का क्या है 'मंगल ग्रह' से संबंध, शेरघाटी के किस 'पत्थर' का अध्ययन करने में जुटे हैं वैज्ञानिक
नई दिल्ली:

इसरो का मार्स ऑर्बिटर मिशन मंगल ग्रह के लिए भारत का पहला अंतरग्रहीय मिशन था. इसे पांच नवंबर, 2013 को लॉन्च किया गया था. इसने 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में प्रवेश किया था. लेकिन इससे 149 साल पहले ही मंगल ग्रह से एक उल्कापिंड भारत में गिरा था. करीब पांच किलो वजन का यह उल्कापिंड बिहार के शेरघाटी में गिरा था. इसके बाद से शेरघाटी को सम्मान देने के लिए मंगल ग्रह से आए उल्कापिंड को वैज्ञानिक 'शेरगोटाइट' कहने लगे. धरती पर संग्रहित मंगल ग्रह से आए करीब 300 उल्कापिंडों में से करीब दो सौ 'शेरगोटाइट' प्रकृति के माने जाते हैं.

शेरघाटी में कब गिरा था मंगल ग्रह से आया उल्कापिंड

25 अगस्त 1865 की सुबह करीब नौ बजे आज के बिहार के गया जिले में स्थित शेरघाटी के पास, आसमान से एक पत्थर गिरा था. जब यह पत्थर धरती से टकराया, उस समय आसमान में बादल छाए हुए थे. अचानक जोरदार धमाके जैसी आवाज आई. धरती से टकराने के बाद पत्थर का वह टुकड़ा जमीन में धंस गया. इसलिए जब उसे बाहर निकाला गया तो दो टुकड़ों में टूट चुका था. देश में उस समय अंग्रेजों का शासन था.इसलिए तत्कालीन डिप्टी मजिस्ट्रेट डब्लूसी कॉस्टली ने उन लोगों के बयान दर्ज किए जिन्होंने उस पत्थर को गिरते हुए देखा था. 

कॉस्टली ने बिहार के मजिस्ट्रेट ए होप को भेजी अपनी रिपोर्ट में लिखा था, ''शुरुआत में मुझे संदेह था कि यह वास्तव में उल्कापिंड है या नहीं. इसकी वजह यह थी कि इसका रंग 1850 में फरीदपुर जिले में गिरे उल्कापिंड से अलग था. लेकिन जिले के उप अफीम एजेंट पेप्पे ने मुझे बताया कि इसके उल्कापिंड होने में कोई संदेह नहीं है. उन्होंने खुद उस जिले में गिरे ऐसे दो पत्थर देखे थे.''

अंग्रेजों ने क्यों माना उल्कापिंड

अंग्रेज सरकार ने पत्थर के उस टुकड़े को कलकत्ता भेजा गया.वहां एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल ने दिसंबर में पत्थर के इस टुकड़े को प्राप्त किया. आसमान से गिरने की वजह से पत्थर के इस टुकड़े को उल्कापिंड माना गया था. 

शेरघाटी के उल्कापिंड के टुकड़े वियना और लंदन भी भेजे गए थे. लेकिन करीब एक सदी बाद यह तय हो पाया कि यह उल्कापिंड मंगल ग्रह से आया था. दरअसल 1958 में पोटैशियम-आर्गन विधि से किए गए अध्ययन में पाया गया कि शेरघाटी का उल्कापिंड दूसरे कई ऐसे उल्कापिंडों से काफी कम उम्र का है, जिन्हें 'अकोंड्राइट' ( ये उल्कापिंड अपनी आंतरिक गर्मी की वजह से पिघल जाते हैं और फिर से जम जाते हैं, इससे इनके कोंड्रूल पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं.) कहा जाता है. वहीं 1979 में रुबिडियम-स्ट्रॉन्शियम विधि से की गई जांच में शेरगोटाइट समूह के उल्कापिंडों की उम्र 16.5 करोड़ से 20 करोड़ साल के बीच आंकी गई. साल 1983 में बोगार्ड और जॉनसन नाम के वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका में मिले एक शेरगोटाइट उल्कापिंड में गैसों की पहचान की. इन गैसों की संरचना मंगल ग्रह के वातावरण से मिलती थी. इसका पता अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वाइकिंग अंतरिक्ष अभियानों ने लगाया था. इससे उल्कापिंडों के मंगल ग्रह से आने का दावा बेहद मजबूत हो गया. 

उल्कापिंडों की उम्र कितनी है

इन उल्कापिंडों की उम्र को लेकर विवाद बना रहा है. सीसे के समस्थानिकों के अध्ययन से इनकी उम्र चार अरब साल से भी अधिक होने के संकेत मिले. लेकिन 2023 में आर्गन डेटिंग से शेरघाटी उल्कापिंड की उम्र करीब 16.1 करोड़ साल आंकी गई. वैज्ञानिक संग्रहों में मौजूद मंगल ग्रह के नमूनों में करीब 80 फीसद शेरगोटाइट समूह के ही हैं. अंतरिक्ष अभियान जब तक मंगल ग्रह की चट्टाने लेकर पृथ्वी पर नहीं आते हैं,  तब तक पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप से मिले ऐसे उल्कापिंड ही मंगल ग्रह की चट्टानों के अध्ययन का प्रमुख साधन बने रहेंगे. 

नासा के ऑपर्च्युनिटी रोवर ने 2004 में मंगल ग्रह पर 'बाउंस रॉक' नामक एक चट्टान की खोज की थी. यह बेसाल्ट नाम की ज्वालामुखीय चट्टान थी. इसकी विशेषताएं शेरगोटाइट उल्कापिंडों से काफी मिलती-जुलती थी. इस खोज ने पृथ्वी पर मिले उल्कापिंडों और मंगल ग्रह की सतह पर मौजूद चट्टानों के बीच संबंध स्थापित करने में मदद की. बिहार की धरती पर गिरा यह पत्थर आज भी वैज्ञानिकों को दूसरे ग्रह के बारे में समझ बढ़ाने में मदद कर रहा है. 

लुई मोनेट ने इस उल्कापिंड के एक टुकड़े का इस्तेमाल कर अपनी एक घड़ी ऑनली इंडिया लॉच की थी.

लुई मोनेट ने इस उल्कापिंड के एक टुकड़े का इस्तेमाल कर अपनी एक घड़ी 'ऑनली इंडिया' लॉच की थी.
Photo Credit: louis Moinet

किसने बनाई दो करोड़ की घड़ी

शेरघाटी में गिरे मंगल ग्रह के इस पत्थर पर केवल वैज्ञानिकों की ही निगाह नहीं है. इस पत्थर के एक टुकड़े से स्विट्जरलैंड की लग्जरी घड़ी निर्माता कंपनी लुई मोइनेट (Louis Moinet) ने एक खास घड़ी बनाई. लुई मोइनेटन ने भारतीय संस्कृति को समर्पित इस घड़ी को नाम दिया 'ONLY INDIA'. इस कंपनी ने इस घड़ी का केवल एक पीस ही बनाया था. इसमें ज्यादातर काम हाथ से किया गया है. इसमें मोर पंख और 18 कैरेट सोने का इस्तेमाल किया गया है. कंपनी ने इसकी कीमत तो नहीं बताई थी, लेकिन माना जाता है कि इसकी कीमत दो करोड़ रुपये से अधिक है. कंपनी ने यह भी नहीं बताया है  कि घड़ी खरीदी किसने. 

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