- दिल्ली के साकेत मेट्रो स्टेशन के पास तीन मंजिला इमारत गिरने से 6 लोगों की मौत
- दिल्ली साकेत बिल्डिंग हादसे की कई दिल झकझोर देने वाली कहानियां सामने आई हैं
- एक कैंटीन चलाने वाली महिला की मौत छात्रों को बचाते हुए हो गई
राजधानी दिल्ली के साकेत मेट्रो स्टेशन के पास शनिवार शाम तीन मंडिला कमर्शियल इमारत गिरने से छह लोगों की मौत हो गई है. कुछ ही ढेर में पूरी इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई और मलबे के ढेर में तब्दील हो गई. बचाव एजेंसियों द्वारा मौके पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है. इस मामले में सीएम रेखा गुप्ता ने जांच के आदेश दे दिए हैं. सरकार ने एमसीडी के दो इंजीनियरों को भी सस्पेंड कर दिया है. एक पल पहले जहां कामयाबी का जश्न था, महीनों की मेहनत से सजे सुनहरे सपने थे और बच्चों की खिलखिलाहट थी, अगले ही पल वहां सिर्फ चीखें, गहराती धूल और मौत का सन्नाटा पसरा था. साकेत इमारत हादसे की ढहती दीवारों ने सिर्फ कंक्रीट का मलबा नहीं गिराया, बल्कि कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी. कोई यहां महीनों की तैयारी के बाद नौकरी का इंटरव्यू देकर दोस्तों को पार्टी देने पहुंचा था, तो किसी बेबस पिता की आंखों का वो डर सच साबित हो गया जो अपनी मासूम बच्ची को मलबे में तलाश रहा था. इस खौफनाक मंजर के बीच जहां लाचारी की चीखें थीं, वहीं फर्ज और इंसानियत की एक ऐसी मिसाल भी देखने को मिली, जिसने हर आंख को नम कर दिया. साकेत बिल्डिंग हादसे में कई झकझोर देने वाली कहानियां सामने आ रही हैं.
जॉब इंटरव्यू का जश्न मनाने के लिए दोस्तों को पार्टी देने पहुंचे थे, खुशी मातम में बदली
साकेत बिल्डिंग हादसे में जान गंवाने वालों में 28 साल के कपिलभी थे, जो भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) में नौकरी पाने के लिए तैयारी कर रहे थे. कपिल के दोस्तों ने बताया कि वह बार्क जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अच्छा इंटरव्यू होने के बाद इमारत के पास वाली कैंटीन में पांच दोस्तों के साथ छोटी सी पार्टी कर रहे थे. इस इंटरव्यू का रिजल्ट जुलाई में आएगा. जिन कैंटीन में ये दोस्त पहुंचे थे वहां अक्सर छात्र पहुंचते थे. कपिल बिहार के मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) का पूर्व छात्र था और दिल्ली में कोचिंग कर रहे थे. एक दोस्त ने कहा, ‘कपिल ने अपने दोस्तों को फोन कर बताया था कि उसका इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ था. जब इमारत गिरी तो वे कैंटीन में एक साथ बैठे थे.'

पिता का डर सही निकला, मलबे से बच्ची का शव बरामद हुआ
बिल्डिंग के मलबे के पास अपनी 24 साल की बेटी एकता की खबर का बेसब्री से इंतजार कर रहे रमेश चंद का डर रविवार को सच साबित हो गया, जब बचाव दल ने उसका शव बरामद कर लिया. राजस्थान के अलवर शहर के रहने वाले रमेश चंद ने बताया कि एकता के कुछ दोस्तों ने शनिवार रात उन्हें फोन करके कहा कि इमारत ढहने की घटना के बाद एकता से संपर्क नहीं हो पा रहा है, जिसके बाद वह तुरंत दिल्ली भागे. डेंटल सर्जरी में ग्रेजुएट एकता पिछले एक साल से दिल्ली में रहकर एफएमजीई की तैयारी कर रही थीं. यह परीक्षा 28 जून को होने वाली है. एकता एफएमजीई से पहले शनिवार सुबह एक टेस्ट में शामिल हुई थीं, जिसमें उनका प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था.

मलबे के नीचे दबी किताबें और सपने, महीनों की तैयारी मिट्टी में मिली
साकेत बिल्डिंग हादसे में विदेश में मेडिकल और इंजीनियरिंग में दाखिले की तैयारी कर रहे कुछ अभ्यर्थियों का सपना और महीनों की तैयारी मलबे के नीचे दबकर रह गई. इस इमारत में कई कोचिंग संस्थान थे, जिनमें मेडिकल और इंजीनियरिंग की परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती थी. इस पूरे इलाके में यहां कई लाइब्रेरी, कोचिंग, हॉस्टल और कैंटीन हैं. यहां पढ़ाई करने वाले बच्चों में फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट (FMG) के अभ्यर्थी, नीट, गेट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थी शामिल हैं.

एक अन्य छात्र ने बाद के हालात को प्रलय जैसा बताया. उसने कहा कि हर तरफ धूल ही धूल थी. लोग अपने फोन, किताबें, लैपटॉप और टैबलेट वहीं छोड़कर भाग गए. बाद में, कुछ छात्र अपना सामान लेने वापस गए. जब वे लौटे, तो उन्होंने बताया कि सब कुछ धूल और मलबे के नीचे दबा हुआ था.
कैंटीन ऑनर ने छात्रों को खाना खिलाया और उन्हें बचाने की कोशिश में खुद जान गंवा दी
बिल्डिंग इमारत ढहने से ठीक पहले छात्रों की जान बचाने की कोशिश में अपनी जान गंवाने वाली कैंटीन चलाने वाली पार्वती ओझा को याद करते हुए एक छात्र ने कहा, 'वह हमारी मां जैसी थीं.' हादसे में जीवित बचे लोगों और मृतकों के परिवार के सदस्यों ने बताया कि नेपाल मूल की 50 वर्षीय पार्वती ओझा पिछले दो दशक से दिल्ली में रह रही थीं और छात्रों को किफायती भोजन उपलब्ध कराती थीं. शनिवार शाम को जब कैंटीन के पास की तीन मंजिला इमारत ढहने लगी, तो वह अंदर मौजूद छात्रों को सचेत करने के लिए दौड़ीं और मलबे में दबने से उनकी मौत हो गई.

पार्वती के रिश्तेदार हरि प्रसाद ओझा ने बताया कि उन्होंने 12 आलू परांठे और चार कोल्ड कॉफी का ऑर्डर पूरा ही किया था, तभी उन्हें कुछ गड़बड़ होने का अहसास हुआ. उन्होंने कहा, 'हम दोनों को अचानक कंपन महसूस हुआ और हम बाहर की तरफ भागे. हमने देखा कि इमारत गिर रही थी और हमें अहसास हुआ कि इसकी चपेट में कैंटीन भी आ सकती है.' हरि प्रसाद ने कहा कि लेकिन बाहर आने के बाद भी वह छात्रों को आवाज देने और उन्हें बाहर निकालने के लिए वापस अंदर दौड़ीं. वह उन्हें बचाना चाहती थीं. वह कभी वापस नहीं आईं.
‘सब कुछ धूल में मिल गया'... साकेत हादसे में बचे लोगों ने याद किया भयावह मंजर
इमारत से सटी कैंटीन के पास मौजूद छात्र रोनित ने बताया कि ऐसा लगा जैसे पूरा इलाका अचानक गायब हो गया हो. उन्होंने कहा कि मैंने इमारत का एक हिस्सा गिरते हुए देखा और समझ गया कि ढांचा ढहने ही वाला है. एक जोरदार आवाज हुई और देखते ही देखते चारों ओर धूल ही धूल हो गई. हम देख नहीं पा रहे थे कि कौन कहां खड़ा है. लोग चीखते-चिल्लाते इधर-उधर भाग रहे थे.

जब इमारत गिरी, तो उसका मलबा टिन की छत वाली कैंटीन पर जा गिरा, जिससे कई लोग उसके नीचे दब गए. कैंटीन में आने वाले ऋषभ ने कहा, 'हमने अजीब सी आवाज सुनी, और फिर अचानक अफरा-तफरी मच गई. कुछ लोग भागने की कोशिश में गिर पड़े, जबकि अन्य अपने दोस्तों को पुकार रहे थे. मेरी आंखें जल रही थीं और लोग खड़े होने के लिए सुरक्षित जगह ढूंढने की कोशिश कर रहे थे.' इसके बाद का मंजर भी उतना ही भयावह था. ऋषभ ने कहा, 'लोग एक-दूसरे का नाम पुकार रहे थे और यह देखने के लिए फोन चेक कर रहे थे कि कौन सुरक्षित है.'
(एजेंसी के इनपुट के साथ)
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