- सबरीमला मामले की संविधान पीठ में नौवें दिन सुनवाई के दौरान वकील ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक का समर्थन किया
- उपाध्याय ने धर्म और मजहब को अलग बताते हुए कहा कि धर्म मजहब से बड़ा होता है और विवादों की वजह बनता है
- उन्होंने संस्कृत को अंग्रेजी से श्रेष्ठ बताया और अनुच्छेद 25 और 26 पर प्रतिबंधात्मक व्याख्या की आलोचना की
सबरीमला मंदिर मामले में 9 जजों की संविधान पीठ के सामने 9वें दिन मंगलवार को सुनवाई के दौरान दिलचस्प और तीखी बहस देखने को मिली. मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक का समर्थन कर रहे वकील अश्विनी उपाध्याय की दलीलों के बीच सुनवाई कई बार अपने तय दायरे से बाहर जाती नजर आई, जिस पर न्यायाधीशों ने उन्हें बीच‑बीच में रोका. वहीं, एक अन्य वकील ने यह दावा कर चर्चा को और नया मोड़ दे दिया कि सबरीमला मूल रूप से हिंदू मंदिर नहीं बल्कि एक बौद्ध पगोडा था.
‘धर्म मजहब से अलग है' की दलील
सुनवाई के दौरान अश्विनी उपाध्याय ने रामचरितमानस, विष्णु पुराण और भगवद्गीता जैसी धार्मिक ग्रंथों की प्रतियां दिखाते हुए कहा कि धर्म और रिलीजन (मजहब) एक नहीं होते. उन्होंने दलील दी कि धर्म मजहब से बड़ा है और यही कारण है कि मजहब के नाम पर झगड़े होते हैं. उपाध्याय ने कहा कि पिछले 2000 सालों में अलग‑अलग धर्मों के झगड़ों की वजह से भारत 25 टुकड़ों में बंट गया, जबकि पिछले 200 सालों में भारत 7 देशों में बंट गया. यह कहते हुए कि हर एक्शन का एक रिएक्शन होता है, उन्होंने बेंच से फैसले के नतीजों पर सोचने की अपील की.
भविष्य को लेकर तुलना
उन्होंने सवाल किया कि अगले 25 सालों में क्या भारत चीन, सिंगापुर या जापान जैसे साइंटिफिकली इंटीग्रेटेड देश बनेगा या फिर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की राह पर जाएगा. उपाध्याय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 को सबसे ज्यादा प्रतिबंधात्मक तरीके से लिखा गया है. उन्होंने दावा किया कि आर्टिकल 25 के तहत धर्म प्रचार के अधिकार को कुछ पश्चिमी संविधानों में भी मान्यता नहीं दी गई है, जिनसे भारतीय संविधान ने कुछ प्रावधान लिए हैं.
संस्कृत बनाम अंग्रेजी की बहस
उन्होंने तर्क दिया कि संस्कृत में अंग्रेजी से ज्यादा अक्षर हैं और दावा किया कि डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने संस्कृत को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए एक बिल पेश किया था. उनका कहना था कि अंग्रेजी में “संविधान” के लिए कोई सही शब्द नहीं है, क्योंकि अंग्रेजी में सिर्फ 26 अक्षर हैं जबकि संस्कृत में 52. इस दौरान जस्टिस आर. महादेवन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि उपाध्याय उस विषय से आगे जा रहे हैं, जिस पर सुनवाई हो रही है, और खुद को मुद्दे तक सीमित रखने को कहा. जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने भी कन्नड़ भाषा का उदाहरण देते हुए इसी तरह की बहस में न जाने की सलाह दी.
‘धर्म और मजहब एक नहीं' पर जोर
लगातार टोके जाने के बावजूद उपाध्याय अपनी दलीलों पर टिके रहे. जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने उनसे पूछा कि वह आखिर कहना क्या चाह रहे हैं. इस पर उपाध्याय ने जवाब दिया कि धर्म और मजहब एक जैसे नहीं हैं और सभी मजहब भी एक जैसे नहीं हैं. इसके बाद CJI सूर्यकांत ने वकील को बताया कि उनका समय समाप्त हो गया है. अपनी बात को समेटते हुए उपाध्याय ने कहा कि सबरीमला मंदिर की एक अलग पवित्रता है और 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक सही है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म सोचने की आज़ादी देता है, जबकि मजहब नहीं.
बेंच का जवाब
इस पर जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि हर मजहब का अपना धर्म होता है, कोई भी धर्म दूसरे से बड़ा नहीं है और सभी बराबर हैं. उन्होंने कहा कि कोर्ट इन दार्शनिक बहसों में नहीं पड़ने वाला है. जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस अमानुल्लाह ने भी उपाध्याय को मामले के दायरे तक सीमित रहने की सलाह दी.
‘सबरीमला मंदिर नहीं, बौद्ध पगोडा था' का दावा
इसके बाद एक अन्य वकील ने बहस शुरू करते हुए कहा कि उनका मामला सीधे सबरीमला से जुड़ा है. उन्होंने दावा किया कि सबरीमला मूल रूप से हिंदू मंदिर नहीं बल्कि एक बौद्ध पगोडा था. उन्होंने कहा कि ‘शिबिर' का अर्थ प्रशिक्षण होता है और पहाड़ी के ऊपर बौद्धों का एक प्रशिक्षण केंद्र था, जिससे इसका नाम शबरीमला पड़ा. वकील ने तर्क दिया कि एक समय केरल में 60–70 प्रतिशत आबादी बौद्ध थी, लेकिन वैष्णव और शैव परंपराओं के आगमन और आदि शंकराचार्य के भक्ति आंदोलन के बाद बौद्ध धर्म का प्रभाव कम हो गया. हालांकि, पहाड़ी पर स्थित यह संरचना बनी रही और बाद में इसे मंदिर में बदल दिया गया. सबरीमला मंदिर मामले में संविधान पीठ के सामने सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी.
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