- RSS ने अपने शताब्दी वर्ष में वैश्विक स्तर पर नैरेटिव बदलने के लिए अंतरराष्ट्रीय दौरे शुरू किए
- सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी की यात्रा की है
- अमेरिका में होसबाले ने एआई और तकनीकी नवाचार पर थ्राइव 2026 सम्मेलन में भाग लिया
अपने शताब्दी वर्ष में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि के प्रति भी सतर्क नजर आ रहा है. दुनिया भर में आरएसएस के बारे में बताने के लिए संघ ने वैश्विक दौरे शुरू किए हैं. इन दौरों में हिंदुत्व और आरएसएस को लेकर एक तबके में चलाए जा रहे दुष्प्रचार का मुकाबला भी किया जा रहा है. आरएसएस के सरकार्यवाह (महासचिव) दत्तात्रेय होसबाले हाल ही में अमेरिका और यूरोप की यात्रा समाप्त कर भारत वापस आए हैं. इसके बाद अगली कड़ी में जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, कजाखस्तान और कुछ दक्षिण पूर्वी देशों का दौरा किया जाएगा.
यह दौरा एक ऐसे समय भी हुआ जब हाल ही में भारत के अल्पसंख्यकों और मानवाधिकारों को लेकर अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की रिपोर्ट में आरएसएस पर प्रश्न उठाए गए थे. इस वैश्विक संपर्क अभियान में इसी तरह की गलत और नकारात्मक धारणाओं को दूर करने के लिए संघ ने बड़े पैमाने पर शिक्षाविदों, नीति निर्धारकों और व्यापार जगत के नेताओं से मिल कर जानकारी साझा की. उन्होंने इस दौरान आरएसएस की वास्तविक कार्यों और भारत की प्रगति की तस्वीर प्रस्तुत की गई.
तीन देशों की यात्रा
होसबोले का यह वैश्विक संपर्क अभियान 11 अप्रैल से 28 अप्रैल तक चला. इस दौरान उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी की यात्रा की. इस दौरे का मुख्य उद्देश्य वैश्विक विचारकों, शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं के साथ सांस्कृतिक मूल्यों, तकनीकी शासन और सभ्यतागत दृष्टिकोणों पर संवाद स्थापित करना रहा.
होसबोले के इस अभियान की शुरुआत ब्रिटेन से हुई. वे 11 से 14 अप्रैल तक ब्रिटेन में रहे. वहां उन्होंने विभिन्न समुदायों और शिक्षाविदों से मुलाकात की. इसके बाद, उनकी यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा संयुक्त राज्य अमेरिका में केंद्रित रहा.
16-17 अप्रैल को, उन्होंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के फैकल्टी क्लब में आयोजित 'थ्राइव (THRIVE) 2026' शिखर सम्मेलन को संबोधित किया. 'ग्लोबल साइंस एंड इनोवेशन फोरम' द्वारा आयोजित इस सम्मेलन का विषय एआई (AI) और उभरती रणनीतिक तकनीकों के युग में मानवीय लचीलेपन और नवाचार के लिए तकनीक का उपयोग करना था. इस मंच पर प्राचीन ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक नवाचार के संगम पर चर्चा की गई. इस कार्यक्रम में उनके साथ नोबेल पुरस्कार विजेता स्टीवन चू, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एच.आर. मैकमास्टर और निवेशक विनोद खोसला जैसे दिग्गज शामिल थे.
इसके बाद, 23 अप्रैल को होसबोले ने वाशिंगटन डीसी स्थित हडसन इंस्टीट्यूट में 'द न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस' में भाग लिया. यह सम्मेलन भारत की उभरती वैश्विक भूमिका और दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच साझेदारी को गहरा करने पर केंद्रित रहा. वहां उन्होंने भारत के राजदूत विनय क्वात्रा और अन्य रणनीतिक विचारकों के साथ संवाद भी किया. इस वैश्विक दौरे में होसबोले ने कई महत्वपूर्ण इंटरव्यू भी दिए. उन्होंने एनपीआर वन को इंटरव्यू दिया. साथ ही हडसन इंस्टीट्यूट वॉशिंगटन डीसी के फेलो और द वॉल स्ट्रीट जर्नल के स्तंभकार वॉल्टर रसेल मीड से फायरसाइड चैट भी की.
सभ्यतागत मूल्यों और भविष्य की राह
अपनी यात्रा के अंतिम चरण में, सरकार्यवाह ने 26 से 28 अप्रैल तक जर्मनी का दौरा किया. उस दौरान उन्होंने यूरोपीय विचारकों के साथ चर्चा जारी रखी. उन्होंने SWP, कोनराड-आडेनावर फाउंडेशन और बर्लिन विधानसभा से जुड़े प्रतिनिधियों से मुलाकात कर आपसी समझ बढ़ाने पर चर्चा की. बातचीत में भारतीय प्रवासियों की शिक्षा, आर्थिक भागीदारी और कर-योगदान को महत्वपूर्ण बताया गया. होसबाले ने आरएसएस को सेवा, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक एकता से जुड़ा बड़ा स्वयंसेवी संगठन बताया. हिंदू स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में उन्होंने भारतीय संस्कृति, शांतिपूर्ण संवाद और सभ्यतागत निरंतरता पर जोर दिया.
संघ के अनुसार होसबोले के दौरे में कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया. जैसे एआई के युग में तकनीक को मानवीय मूल्यों के साथ जोड़ना. वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए सभ्यतागत दृष्टिकोण प्रस्तुत करना. संघ के शताब्दी वर्ष में संगठन के 100 वर्षों की सेवा और वैश्विक कल्याण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करना.
इस दौरे में होसबोले के साथ रहे आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर के अनुसार इस अंतरराष्ट्रीय दौरे का उद्देश्य आरएसएस के पिछले सौ वर्षों की यात्रा के बारे में दुनिया को नियमित तौर पर बताना है. साथ ही, वर्तमान मुद्दों और समस्याओं के हल के बारे में भी जानकारी देना. जैसे कि आज योग विकसित देशों में भी लोगों की मदद कर रहा है. साथ ही किस तरह दुनिया भर के समाज के लिए हमारे सामाजिक मूल्य सहायक हो सकते हैं.
ऑर्गेनाइजर में दिए अपने साक्षात्कार में आंबेकर ने कहा कि हिंदुत्व, आरएसएस और भारत के बारे में कई तरह की गलतफहमियां हैं. इसके बारे में समाज के महत्वपूर्ण अंग, बड़ी हस्तियों और लोगों से सीधा संवाद करना भी इन दौरों का उद्देश्य है.
आंबेकर के अनुसार दुनिया भर में लोग भारत के बारे में उत्सुक हैं. कुछ भारत और हिंदुत्व को योग के माध्यम से जानते हैं. कुछ जानना चाहते हैं कि भारत ने आर्थिक प्रगति कैसे की. लंदन में कैंब्रिज, ऑक्सफर्ड के शिक्षाविदों ने कई मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की.
यह अंतरराष्ट्रीय दौरा न केवल आरएसएस की वैश्विक पहुंच को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय मूल्य और आधुनिक नवाचार एक साथ कैसे चल सकते हैं. आरएसएस अपने शताब्दी वर्ष में अपनी छवि को लेकर अधिक सतर्क दिख रहा है. वैश्विक स्तर पर इस तरह का संपर्क अभियान उसकी दीर्घकालिक रणनीति और दूरगामी सोच को भी बता रहा है.
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