Bajrang Baan Ka Path Kaise Kare: हिंदू मान्यता के अनुसार कलयुग में हनुमत उपासना सभी दुख, बाधा और संकटों को दूर करने वाली मानी गई है. ऐसे में जो कोई भक्त उनकी सच्चे मन से पूजा और प्रार्थना करता है, उसकी मदद के लिए हनुमान जी दौड़े चले आते हैं. हनुमान जी को पूजा के जरिए मनाने के लिए मंगलवार का दिन सबसे ज्यादा शुभ और फलदायी माना जाता है, लेकिन इस मंगल का महत्व तब और भी ज्यादा बढ़ जाता है, जब ज्येष्ठ महीने में आता है और बड़ा मंगल या फिर कहें बुढ़वा मंगल कहलाता है. बड़ा मंगल के दिन जीवन से जुड़ी सभी संकटों को दूर करने के लिए आज बजरंग बाण का पाठ कब और कैसे करना चाहिए, आइए इसे विस्तार से जानते हैं.
बजरंग बाण के पाठ की विधि

Photo Credit: @Facebook:Shri Bade Hanuman Ji Temple
बड़ा मंगल पर आज बजरंग बाण का पाठ करने के लिए हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने लाल रंग का उनी या फिर कुश का आसन बिछाकर बैठें. इसके बाद हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करें और पांच बाती वाला घी का दीया जलाएं. साथ ही साथ धूप भी जलाकर हनुमान जी को अर्पित करें. इसके बाद बजरंगी को फल, गुड़-चना, मोतीचूर का लड्डू या फिर चूरमा का भोग लगाएं. इसके बाद पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ हनुमान जी का ध्यान करते हुए बजरंग बाण का पाठ करें. बजरंग बाण का पाठ करने के बाद प्रभु श्री राम के नाम का कीर्तन और हनुमान जी की आरती करना बिल्कुल न भूलें.
बजरंग बाण पाठ के नियम

- हिंदू मान्यता के अनुसार बजरंग बाण का पाठ हमेशा तन और मन से शुद्ध होकर करना चाहिए.
- बजरंग बाण का पाठ हमेशा अपनी बाधाओं को दूर करने के लिए करें न कि किसी की अहित की कामना को लिए करना चाहिए.
- बजरंग बाण का पाठ मंगलवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में या फिर रात्रि के समय शुद्ध घी का दीपक जलाकर करना चाहिए.
- बजरंग बाण के पाठ का पुण्यफल पाने के लिए इसे मंगलवार से प्रारंभ करके लगातार 21 या 41 दिनों तक करना चाहिए.
- बजरंग बाण के पाठ को सिद्ध करने के लिए साधक को साधना के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और भूलकर भी तामसिक चीजों का प्रयोग नहीं करना चाहिए.
- हनुमान जी की पूजा में बजरंग बाण का पाठ यदि पीपल के नीचे स्थित हनुमान मंदिर में किया जाए तो वह शीघ्र ही फलदायी होता है.
बजरंग बाण का पाठ

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय सन्मान.
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान.
जय हनुमंत संत हितकारी. सुन लीजै प्रभु अरज हमारी.
जन के काज विलंब न कीजै. आतुर दौरि महासुख दीजै.
जैसे कूदि सिंधु महि पारा. सुरसा बदन पैठि विस्तारा.
आगे जाई लंकिनी रोका. मारेहु लात गई सुर लोका.
जाय विभीषण को सुख दीन्हा. सीता निरखि परमपद लीन्हा.
बाग उजारि सिंधु महं बोरा. अति आतुर जमकातर तोरा.
अक्षयकुमार को मारि संहारा. लूम लपेट लंक को जारा.
लाह समान लंक जरि गई. जय जय धुनि सुरपुर में भई.
अब विलंब केहि कारण स्वामी. कृपा करहु उर अंतरर्यामी.
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता. आतुर होय दुख हरहु निपाता.
जै गिरिधर जै जै सुखसागर. सुर समूह समरथ भटनागर.
ॐ हनु हनु हनुमंत हठीले. बैरिहिं मारु बज्र की कीलै.
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो. महाराज प्रभु दास उबारो.
ऊँकार हुंकार प्रभु धावो. बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो.
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा. ऊँ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा.
सत्य होहु हरि शपथ पाय के. रामदूत धरु मारु जाय के.
जय जय जय हनुमंत अगाधा. दुःख पावत जन केहि अपराधा.
पूजा जप तप नेम अचारा. नहिं जानत हौं दास तुम्हारा.
वन उपवन, मग गिरिगृह माहीं. तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं.
पांय परों कर ज़ोरि मनावौं. यहि अवसर अब केहि गोहरावौं.
जय अंजनिकुमार बलवंता. शंकरसुवन वीर हनुमंता.
बदन कराल काल कुल घालक. राम सहाय सदा प्रतिपालक.
भूत प्रेत पिशाच निशाचर. अग्नि बेताल काल मारी मर.
इन्हें मारु तोहिं शपथ राम की. राखु नाथ मरजाद नाम की.
जनकसुता हरिदास कहावौ. ताकी शपथ विलंब न लावो.
जय जय जय धुनि होत अकाशा. सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा.
चरण शरण कर जोरि मनावौ. यहि अवसर अब केहि गोहरावौं.
उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई. पांय परौं कर जोरि मनाई.
ॐ चं चं चं चं चपत चलंता. ऊँ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता.
ऊँ हँ हँ हांक देत कपि चंचल. ऊँ सं सं सहमि पराने खल दल.
अपने जन को तुरत उबारो. सुमिरत होय आनन्द हमारो.
यह बजरंग बाण जेहि मारै. ताहि कहो फिर कौन उबारै.
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पाठ करै बजरंग बाण की. हनुमत रक्षा करै प्राण की.
यह बजरंग बाण जो जापै. ताते भूत प्रेत सब कांपै.
धूप देय अरु जपै हमेशा. ताके तन नहिं रहै कलेशा.
प्रेम प्रतीतहि कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान.
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान.
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