- RSS प्रमुख मोहन भागवत ने एक जेबकतरे से जुड़ा किस्सा सुनाया है. जो अयोध्या में रामलला के दर्शन के बाद सुधर गया.
- रामलला के दर्शन के बाद उसने जेब काटना छोड़ दिया था. कारसेवा में लोगों को देखकर वह बदल गया था.
- मोहन भागवत ने बताया कि रामलला के दर्शन के बाद उसने फिर कभी लोगों की जेब नहीं काटी.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने राम लला मंदिर और एक जेबकतरे से जुड़ा दिलचस्प किस्सा बताया है. उन्होंने बताया कि कैसे एक जेबकतरा राम लला के दर्शन के बाद सुधर गया था. मोहन भागवत ने बताया 'अयोध्या में पहली कार सेवा के बाद मैं एक जिले का प्रचारक था. पहली कार सेवा हो चुकी थी, लोग वापस आ चुके थे. ऐसे में उन लोगों से एक-एक करके पूछना था कि कार सेवा के बाद क्या बदलाव हुआ. इसी पूछताछ के दौरान मुझे एक मंदिर के बाहर रास्ते पर पंक्चर ठीक करने वाला एक शख्स बैठा दिखा. कार्यकर्ता मुझे उसके पास लेकर गए और मेरा उससे परिचय कराया. जिसने मुझे बताया कि कैसे वह रामलला के दर्शन करने के बाद उसने लोगों की जेब काटना छोड़ दिया है.'
सरयू में विसर्जित किए थे औजार
मोहन भागवत ने बताया 'मैंने कार्यकर्ताओं से पूछा कि भाई ये कौन है इन सज्जन का मुझे परिचय करा देने का विशेष कारण क्या है. तो उन्होंने कहा ये सज्जन अभी पंक्चर वाले हैं लेकिन पहले ये जेबकतरा थे. अयोध्या में कार सेवा के लिए जाने वालों की भीड़ जब इन्होंने ट्रेन में देखी तो इनको लगा कि वहां अपने हाथ की सफाई करने का अच्छा मौका है. ऐसे में वह अपने सारे औजार लेकर भीड़ में शामिल हो गए. लेकिन जब उन्होंने अयोध्या में रामलला के दर्शन किए तो उनका ह्रदय परिवर्तन हो गया. उसने सरयू में स्नान किया और जेबकाटने में इस्तेमाल करने वाला सारा सामान वहीं विसर्जित कर दिया. वापस आकर उसने लोगों से कहा कि हमने जेब काटने का काम छोड़ दिया है. अब मेरी कुछ सहायता करो ताकि मैं कोई छोटा-मोटा काम शुरू कर सकूं.'
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'कार सेवकों की भक्ति से हुआ परिवर्तन'
आरएसएस प्रमुख ने कहा 'उस जेब कतरे को किसी ने प्रवचन नहीं दिया था और न ही किसी ने बिठाकर उसे अच्छी बातें समझाई थी. संघ की शाखा तो उसको पता भी नहीं थी. जबकि उसका इरादा जेब काटने का ही था. लेकिन जब उसने कारसेवकों की भक्ति देखी. उसने देखा कैसे लोग अपना काम छोड़कर भक्ति पूर्वक अयोध्या चले गए हैं. कई कारसेवक तो जान हथेली पर लेकर डेढ़ सौ किलोमीटर पैदल चलकर अयोध्या पहुंचे थे. वहां उन्होंने संघर्ष किया कुछ लोगों ने अपने प्राण भी न्योछावर कर दिए. जब उस जेब कतरे ने यह सब वातावरण देखा तो उसमें परिवर्तन आ गया और राम लला के दर्शन करने के बाद उसने लोगों के जेब काटना छोड़ दिया.'
मोहन भागवत ने बताया कि इसी तरह हमारे एक और कार्यकर्ता थे. उनका मानना था कि पहले अपना करियर बनाओं उसके बाद देश का करियर बनाओ. लेकिन जब उनको इलाहाबाद भेजा गया व्यवस्था देखने के लिए तो उनमें भी परिवर्तन हुआ. एक महीने बाद जब मैं उनसे मिलने गया तो उन्होंने बताया कि मैं वहां त्रिवेणी संगम में विसर्जन करके आ गया हूं. मैंने सोचा त्रिवेणी संगम में तो अस्थि विसर्जन करते हैं. लेकिन इनके घर में तो कोई देहांत वगैरह किसी का हुआ नहीं है. फिर किस बात का विसर्जन कर दिया. मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि मैंने करियर पहले बनाएंगे उस इच्छा का विसर्जन त्रिवेणी संगम में कर दिया है. अब पहले अपना काम करेंगे और उसके बाद जैसी फुर्सत मिलेगी वैसे अपना जीवन रखेंगे.'
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