
- संघ ने शताब्दी वर्ष की तैयारी में दिल्ली विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यान माला का आयोजन किया
- भागवत ने हिंदू को जातीय या धार्मिक नहीं सांस्कृतिक और समावेशी जीवन दृष्टि के रूप में परिभाषित किया
- संघ में स्वयंसेवकों को पद या पैसा नहीं, बल्कि सेवा का अवसर मिलता है, 4 गुणों को सामाजिक व्यवहार आधार बताया गया
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने शताब्दी वर्ष की तैयारी के तहत दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यान माला का आयोजन कर एक नया संवाद प्रारंभ किया है. '100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज' शीर्षक वाली इस व्याख्यान माला में संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने जिस गंभीरता और संतुलन से संगठन की विचारधारा, कार्यप्रणाली और भविष्य की दिशा को सामने रखा, वह केवल संघ के भीतर के लोगों के लिए नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों के लिए एक विमर्श का आमंत्रण है.
हिन्दू की परिभाषा पर नया दृष्टिकोण
व्याख्यान माला के पहले दिन भागवत ने 'हिंदू' की परिभाषा को नए दृष्टिकोण से रखा. उन्होंने कहा कि हिंदू कोई जातीय या धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और समावेशी जीवन दृष्टि है. यह विचार 'विविधता में एकता' के भारतीय आदर्श को मजबूती से सामने रखता है. जब वे कहते हैं कि 'जो सबको साथ लेकर चलता है, वह हिंदू है', तो यह परिभाषा रूढ़ियों को तोड़ती है और समकालीन भारत को एक व्यापक पहचान देती है.
संघ में सिर्फ सेवा का अवसर
दूसरे दिन संघ की कार्यशैली और सामाजिक दृष्टिकोण पर फोकस किया गया. भागवत ने बताया कि स्वयंसेवक को संघ में न पद मिलता है, न पैसा- सिर्फ सेवा का अवसर मिलता है. उन्होंने चार गुणों—मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा—को संघ के सामाजिक व्यवहार का आधार बताया. यह संदेश विशेष रूप से उल्लेखनीय था कि आज के भारत में जब सामाजिक तनाव, ध्रुवीकरण और कट्टरता बढ़ रही है, वहां संघ जैसे संगठन सज्जन शक्ति को संगठित करने की बात कर रहा है. यह एक प्रकार का वैकल्पिक नैतिक नेतृत्व प्रस्तुत करने का प्रयास है.
पारदर्शिता और उत्तरदायित्व
तीसरे दिन का सवाल-जवाब सत्र इसका सभी को बेसब्री से इंतज़ार था, ये संघ की बढ़ती पारदर्शिता और उत्तरदायित्व का प्रमाण था. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा दिए गए उत्तरों और व्याख्यान से यह स्पष्ट हुआ कि अब संघ का स्वरूप पहले से कहीं अधिक संवादशील, समावेशी और रणनीतिक रूप से परिपक्व हो चुका है.
काशी-मथुरा आंदोलन पर स्पष्टता
तीसरे दिन सबसे चर्चित विषयों में से एक था- काशी और मथुरा से जुड़े मंदिरों का मुद्दा. भागवत ने इस विषय पर स्पष्ट शब्दों में कहा: 'संघ की कोई योजना नहीं है कि मथुरा-काशी के लिए कोई आंदोलन चलाया जाए. राम जन्मभूमि एक अपवाद था.' इस वक्तव्य से यह साफ हुआ कि आरएसएस अब आंदोलन की राजनीति से दूरी बनाते हुए संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायपालिका में विश्वास जताना चाहता है. यह संघ की विचारधारा में हो रहे उस परिवर्तन का प्रतीक है, जो टकराव की बजाय समरसता और स्थिरता को प्राथमिकता देता है.
सत्ता से दूरी, विचार से प्रतिबद्धता
एक अन्य सवाल के उत्तर में जब मोहन भागवत से भाजपा और सत्ता से संबंधों पर बात की गई, तो उन्होंने दो टूक कहा: 'सरकारें बदलती रहेंगी, संघ नहीं बदलेगा. यह बयान संघ की स्वायत्त को रेखांकित करता है. जहां एक ओर संघ और भाजपा के संबंधों पर बार-बार सवाल उठते हैं, वहीं यह वक्तव्य यह दर्शाता है कि संघ राजनीतिक सत्ता का उपकरण नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का वाहक है.
हिंदू राष्ट्र की अवधारणा – शक्ति नहीं, संस्कृति
हिंदू राष्ट्र की बहुचर्चित अवधारणा पर भागवत ने एक समावेशी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया. उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ सत्ता आधारित राष्ट्र नहीं, बल्कि ऐसा राष्ट्र है जो संस्कृति, परंपरा और साझा मूल्यों पर आधारित हो. इस राष्ट्र की परिकल्पना में हर धर्म, पंथ और भाषा को सम्मान है. यह परिभाषा संघ को उस छवि से बाहर निकालती है, जिसमें वह केवल एक संप्रदाय विशेष का प्रतिनिधि दिखाया जाता है. यह विचार समाज में सांस्कृतिक एकता को बल देने का प्रयास है.
मोहन भागवत ने संघ की कार्यशैली को चार मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित बताया:
मैत्री – जो हमारे साथ हैं, उनसे मित्रता.
करुणा – जो भटक गए हैं, उनके प्रति सहानुभूति.
मुदिता – जो अच्छा कर रहे हैं, उनके लिए प्रसन्नता.
उपेक्षा – जो संघ और समाज के विरुद्ध नकारात्मकता फैला रहे हैं, उनकी उपेक्षा.
ये गुण बताते हैं कि संघ अब केवल संगठनात्मक शक्ति से नहीं, बल्कि नैतिक और वैचारिक शक्ति से समाज को प्रभावित करना चाहता है.
खुले मंच से संवाद
संघ ने अपने 100 वर्षों की यात्रा में दूसरी बार इतने खुले मंच पर संवाद किया है. इससे पहले 2018 में दिल्ली के इसी विज्ञान भवन में ऐसी ही तीन दिवसीय व्याख्यान माला का आयोजन संघ माइनर से पहली बार किया गया था, अंतिम दिन डॉ. भागवत ने 218 सवालों के उत्तर दिए, जो केवल संगठनात्मक नहीं थे, बल्कि समाज की जिज्ञासाओं और शंकाओं से जुड़े हुए थे. यह स्पष्ट संकेत है कि संघ अब केवल अपने स्वयंसेवकों से नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र से संवाद करना चाहता है.
नई दिशा में बढ़ रहा आरएसएस
तीसरे और अंतिम दिन के विचारों और संवाद ने यह संदेश दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक नई दिशा में बढ़ रहा है – जहां वह केवल शाखाओं और कार्यकर्ताओं का संगठन नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों से जुड़ने वाला विचार मंच बनना चाहता है. डॉ. मोहन भागवत का नेतृत्व इस बदलाव का संवाहक बनकर उभर रहा है, जो टकराव नहीं, सहयोग चाहता है; जो धर्म नहीं, संस्कृति की बात करता है; और जो राजनीति नहीं, राष्ट्र निर्माण में विश्वास रखता है. यह व्याख्यान माला न केवल संघ के शताब्दी वर्ष की तैयारी थी, बल्कि उसके नए स्वरूप की झलक भी है.
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