दिल्ली के विट्ठलभाई पटेल भवन का कमरा नंबर 405 पिछले दो दिनों में देश की राजनीति और छात्र आंदोलन का सबसे चर्चित कमरा बन गया. यहीं शुक्रवार और शनिवार को CJP के प्रतिनिधि सौरव दास और आशुतोष रांका की सरकार के साथ दूसरे और तीसरे दौर की लंबी बैठकें हुईं. कई घंटे चली बातचीत में आंदोलन की प्रमुख मांगों पर मंथन हुआ.
इस्तीफे की खबर आई तो संसद मार्ग पर थे आशुतोष रांका
शनिवार दोपहर करीब 2 बजकर 18 मिनट पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर सामने आई. उस समय आशुतोष रांका संसद मार्ग थाने के सामने मौजूद थे और वहां चल रहे तनावपूर्ण हालात को शांत करने का प्रयास कर रहे थे. इस्तीफे की खबर पर जब उनसे प्रतिक्रिया मांगी गई तो उनकी पहली प्रतिक्रिया थी कि "अभी कुछ उनको पता नहीं है". इसके बाद वे तेजी से जंतर-मंतर स्थित मंच की ओर रवाना हो गए, जहां सौरव दास और CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके पहले से मौजूद थे.
जीत का ऐलान लेकिन लिखित गारंटी पर अड़े रहे नेता
इस्तीफे की खबर की पुष्टि होते ही अभिजीत दीपके ने छात्रों की जीत की बात कही. हालांकि उन्होंने साफ कर दिया कि आंदोलन तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक सरकार लिखित गारंटी नहीं देती. CJP को आशंका थी कि मांगें मान लेने के बावजूद बाद में प्रदर्शनकारियों या संगठन के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है. इसी वजह से संगठन लगातार लिखित आश्वासन पर जोर देता रहा.
दूसरे दौर में इस्तीफे पर हुई लंबी चर्चा
सूत्रों के मुताबिक दूसरे दौर की बातचीत में सरकार की ओर से सौरव दास को समझाने की कोशिश हुई कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेना आसान फैसला नहीं है. सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधारों की बात कही और मुआवजे सहित कई मांगों पर सहमति भी जताई.
बताया जाता है कि जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने यह भी तर्क दिया कि शिक्षा मंत्री के बदलने से सुधार प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. उन्होंने कहा कि शिकायत सामने आने के बाद सरकार ने तुरंत कई कदम उठाए हैं. इसके बावजूद CJP अपने रुख पर कायम रही और संदेश दिया कि इस्तीफे से कम पर समझौता नहीं होगा.
तीसरे दौर में बनी सहमति
दोपहर 3 बजकर 45 मिनट पर सौरव दास और आशुतोष रांका पुलिस वाहन से संविधान क्लब पहुंचे. उस समय तक जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह वहां नहीं पहुंचे थे. गृह मंत्री से मुलाकात के बाद दोनों केंद्रीय मंत्री करीब चार बजे बैठक में शामिल हुए. करीब सवा घंटे चली बातचीत के बाद सरकार सभी प्रमुख मांगों पर लिखित गारंटी देने को तैयार हो गई. इसके बाद आंदोलन समाप्त करने का रास्ता साफ हो गया.
72 घंटे के अल्टीमेटम ने बढ़ाया दबाव
CJP ने सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम दे रखा था. संगठन ने चेतावनी दी थी कि मांगें नहीं मानी गईं तो बड़ा मार्च निकाला जाएगा. शुक्रवार शाम जब यह खबरें आने लगीं कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होगा तब CJP ने 26 जुलाई को कैंडल मार्च का ऐलान कर दबाव और बढ़ा दिया.
बढ़ते दबाव के बीच आया फैसला
शनिवार और रविवार को बड़ी भीड़ जुटने की आशंकाओं की खबरें लगातार सरकार तक पहुंच रही थीं. इसी दौरान विपक्ष के हमले और देशभर में बढ़ती राजनीतिक बहस ने भी माहौल को गरमा दिया. आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया और इसके बाद सरकार तथा
सोशल मीडिया से शुरू हुआ यह आंदोलन राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया. आंदोलन के समाप्त होने के साथ एक अध्याय तो खत्म हुआ लेकिन शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग अब भी केंद्र में बनी हुई है.
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