- पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की घटनाओं का वास्तविक आंकड़ा NCRB के आधिकारिक रिकॉर्ड से काफी अलग पाया गया है.
- 2022 में बीरभूम में हुई हिंसा में कम से कम 10 लोगों की मौत हुई लेकिन NCRB ने राजनीतिक हत्या दर्ज नहीं की.
- 2023 के पंचायत चुनावों की हिंसा में 40+ लोगों की मौत हुई, लेकिन आंकड़ों में कोई राजनीतिक हत्या नहीं है.
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की हालिया हत्या ने इस सवाल को फिर सामने ला खड़ा किया है कि राज्य में होने वाली राजनीतिक हत्याओं का वास्तविक आंकड़ा क्या है और आधिकारिक रिकॉर्ड में क्या दर्ज हो रहा है.
उत्तर 24 परगना में चुनाव नतीजों के कुछ दिन बाद चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई. यह घटना हालिया वर्षों की प्रमुख राजनीतिक हत्याओं में गिनी जा रही है और इसे एक बड़े पैटर्न का हिस्सा माना जा रहा है.
NCRB बनाम जमीनी रिपोर्ट: बड़ा अंतर
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 2014 से 2021 के बीच 47 राजनीतिक हत्याएं दर्ज की गईं. लेकिन 2022 के बाद से आधिकारिक आंकड़ों में एक भी राजनीतिक हत्या दर्ज नहीं दिखाई गई है. इसके उलट, जमीनी स्तर और मीडिया रिपोर्ट्स एक अलग तस्वीर पेश करती हैं.
2022: बीरभूम कांड, लेकिन रिकॉर्ड में ‘शून्य'
2022 में बीरभूम के बोगटुई में हुई हिंसा में कम से कम 10 लोगों की मौत हुई, जहां एक राजनीतिक नेता की हत्या के बाद घरों को आग के हवाले कर दिया गया था. इसके बावजूद NCRB के रिकॉर्ड में उस साल 0 राजनीतिक हत्या दर्ज की गई.

2023: पंचायत चुनाव में हिंसा
2023 के पंचायत चुनावों के दौरान विभिन्न जिलों में व्यापक हिंसा हुई. 40 से ज्यादा लोगों की मौत हुई. लेकिन NCRB के आंकड़ों में फिर भी शून्य राजनीतिक हत्या दर्ज रही.
2024-2026: कम घटनाएं, लेकिन आंकड़ों में बदलाव नहीं
2024 में हिंसा की घटनाएं अपेक्षाकृत कम रहीं, लेकिन फिर भी 5-6 मौतें चुनावी टकराव से जुड़ी बताई गईं.2026 में अब चंद्रनाथ रथ की हत्या ने एक बार फिर इस मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया है.
क्या है असली सवाल?
विश्लेषकों के मुताबिक, असली विवाद यह है कि किसे 'पॉलिटिकल किलिंग' माना जाए. कई मामलों को सामान्य हत्या या अन्य श्रेणियों में दर्ज किया जाता है. यही वजह है कि आधिकारिक डेटा और जमीनी घटनाओं के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है.
बंगाल की राजनीति और हिंसा का इतिहास
पश्चिम बंगाल लंबे समय से चुनावी हिंसा, राजनीतिक टकराव और पार्टी कैडर आधारित संघर्ष जैसे मुद्दों से जूझता रहा है. बीरभूम (2022), पंचायत हिंसा (2023) और अब 2026 की घटनाएं इस पैटर्न को लगातार सामने ला रही हैं.
कागजों में भले ही आंकड़ा ‘शून्य' दिख रहा हो, लेकिन जमीन पर लगातार सामने आ रही घटनाएं एक अलग कहानी बयां कर रही हैं. यही अंतर अब बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल बन गया है कि क्या बंगाल में राजनीतिक हिंसा कम हुई है, या फिर उसकी गिनती का तरीका ही बदल गया है?
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