ओडिशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर के 214 फीट ऊंचे शिखर पर हर दिन एक अद्भुत रस्म निभाई जाती है. यहां मंदिर के शीर्ष पर स्थित नीलचक्र पर लगा पवित्र ध्वज रोज बदला जाता है. इस परंपरा को पूरा करने के लिए चुनारा सेवक रोजाना बिना किसी सुरक्षा उपकरण के, नंगे पैर मंदिर की खड़ी दीवारों पर चढ़ते हैं. चाहे आंधी-तूफान हो या कड़ाके की धूप, यह जानलेवा चढ़ाई कभी नहीं रुकती है. ऐसी मान्यता है कि यदि एक दिन भी झंडा चढ़ाने की रस्म पूरी नहीं की गई तो मंदिर को 18 सालों के लिए बंद करना पड़ेगा. आइए जानते हैं इस अद्भुत रस्म और इसके पीछे की अनोखी मान्यताओं के बारे में.
45 मंजिला इमारत जितनी ऊंचाई और बिना सेफ्टी गियर के चढ़ाई
श्री जगन्नाथ मंदिर की ऊंचाई जमीन से 214 फीट यानी करीब 45 मंजिला इमारत के बराबर है. हर दिन शाम के वक्त चुनारा सेवक अपने कमर पर नए ध्वज बांधकर मंदिर की खड़ी दीवारों और पत्थरों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं.
क्या है पतितपावन बाण और नीलचक्र का महत्व
मंदिर के शिखर पर फहराने वाले इस पवित्र तिकोने ध्वज को स्थानीय भाषा में पतितपावन बाण कहा जाता है. पतितपावन का अर्थ है समाज के गिरे हुए और दबे-कुचले लोगों का उद्धार करने वाला. धार्मिक मान्यता है कि जिन भक्तों को किसी कारणवश मंदिर के अंदर जाने का अवसर नहीं मिलता, वे बाहर से ही इस ध्वज के दर्शन कर लें तो उन्हें साक्षात भगवान जगन्नाथ के दर्शन का पुण्य मिल जाता है. जिस विशाल चक्र पर यह ध्वज बांधा जाता है, उसे नीलचक्र कहते हैं. अष्टधातु से बना यह चक्र करीब 36 फीट के घेरे वाला है और इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि पुरी में आप किसी भी दिशा से इसे देखें, यह हमेशा आपके ठीक सामने ही नजर आता है.
आंधी-तूफान हो या भारी बारिश, कभी नहीं रुकती यह परंपरा
चुनारा सेवकों का यह परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस पवित्र सेवा को निभाता आ रहा है. बचपन से ही इन्हें मंदिर के शिखर पर चढ़ने का कड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है.
इसके साथ ही हर एकादशी के दिन शिखर पर महादीप भी जलाया जाता है. चाहे कितनी भी तेज बारिश हो, भयानक चक्रवाती तूफान हो या कड़कती बिजली हो, यह परंपरा कभी नहीं रुकती है.
एक दिन भी चूके तो 18 साल के लिए बंद हो जाएगा मंदिर
इस परंपरा के पीछे एक बहुत गहरी धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है, जो इसे और भी खास बनाती है. ऐसा माना जाता है कि यह परंपरा करीब 800 से 1800 साल पुरानी है. लोक मान्यता के अनुसार अगर किसी भी दिन यह ध्वज बदलने की रस्म छूट जाती है, तो मंदिर को अगले 18 वर्षों के लिए बंद करना पड़ेगा. हालांकि इतिहासकार इसे एक धार्मिक मान्यता मानते हैं, लेकिन इसी अटूट आस्था और अनुशासन के कारण आज तक एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जब महाप्रभु का ध्वज न बदला गया हो.
हवा की उल्टी दिशा में लहराता है ध्वज
जगन्नाथ मंदिर के इस ध्वज से जुड़ा एक ऐसा रहस्य भी है, जो आज तक वैज्ञानिकों को भी हैरान करता है. सामान्य तौर पर कोई भी झंडा उसी दिशा में लहराता है, जिस दिशा में हवा चल रही होती है. लेकिन श्री जगन्नाथ मंदिर का पतितपावन बाण हमेशा हवा की दिशा के ठीक उलट लहराता है. इसके अलावा चुनारा सेवकों के अनुसार आमतौर पर मंदिर के ऊपर लाल, पीले या सफेद रंग के ध्वज बांधे जाते हैं, लेकिन जब भी किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की आशंका होती है तो महाप्रभु की कृपा के प्रतीक के रूप में सफेद ध्वज बांधा जाता है. करोड़ों भक्तों के लिए यह ध्वज केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि उम्मीद, दैवीय सुरक्षा और महाप्रभु जगन्नाथ की शाश्वत उपस्थिति का जीवंत प्रतीक है.
ये भी पढ़ें: ओडिशा में चक्रवात 'अर्नब' का तांडव: गंजाम में बाढ़ से हाहाकार, 120 लोगों को एयरलिफ्ट करने की तैयारी
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं