पंजाब के मोहाली में शनिवार को कौमी इंसाफ मोर्चा के बैनर तले बंदी सिखों की रिहाई के लिए एक प्रदर्शन हुआ था. इस दौरान ये लोग चंडीगढ़ में घुसना चाहते थे, लेकिन सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के चलते ऐसा नहीं हो सका. अब 21 अगस्त को कौमी इंसाफ मोर्चा समेत कई संगठनों ने पंजाब बंद का ऐलान किया है. जिन बंदी सिखों की रिहाई या पेरोल की मांग की जा रही है, उनमें से एक पूर्व सीएम बेअंत सिंह का हत्यारा जगतार सिंह हवारा भी है. जगतार सिंह हवारा को 10 दिनों के पेरोल की मांग सीएम भगवंत मान ने उठाई है. इसके लिए उन्होंने राज्यपाल से भी मुलाकात की थी.
अब इस मामले में राजनीति भी तेज हो गई है और सड़कों पर प्रदर्शन भी हो रहा है. बीते आम चुनाव में अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह खालसा जीत गए थे. दोनों ही अलगाववादी विचारधारा के हैं और अब बंदी सिखों की रिहाई की मांग उठी है और सड़क पर प्रदर्शन भी हो रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि क्या पंजाब में फिर से अलगाववाद की छाया आ रही है? इस पर हमने 'स्टेट मिलिटेंसी ऐंड ह्यूमन राइट्स: ए स्टडी ऑफ पंजाब 1980-95' विषय पर पीएचडी करने वाले प्रोफेसर मलकीत सिंह से बात की. उन्होंने कहा कि पंजाब में ऐसी कोशिशें भले हो रही हैं, लेकिन जमीनी तौर पर ऐसे हालात नहीं हैं.
केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के प्रोफेसर मलकीत सिंह ने कहा, 'पंजाब में बंदी सिखों के मसले पर भाजपा पसोपेश में है. वह राष्ट्रीय स्तर पर खुद को राष्ट्रवादी दिखाना चाहती है, लेकिन यहां उसकी नीति स्पष्ट नहीं दिखती.' वह कहते हैं कि बंदी सिखों को जेल से निकालने का मसला बहुत गंभीर नहीं है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले ऐसा करना संवेदनशील जरूर है. उन्होंने कहा, 'यदि बंदी सिखों को चुनाव से पहले जेल से निकाला गया तो फिर मामला हिंदू बनाम सिख ध्रुवीकरण हो जाएगा. पंजाब में हिंदू और सिख एकता की बात करनी चाहिए.'
चुनाव से पहले बंदी सिख रिहा किए तो दिखेगा असर
उन्होंने कहा कि फिलहाल ऐसी जरूरत है कि पंजाब में भरोसा दिया जाए कि कानून-व्यवस्था दुरुस्त है. इसके बाद ही इन लोगों को छोड़ दिया जाए. यदि चुनाव से पहले हवारा समेत ऐसे लोगों को छोड़ा गया तो इसका असर देखने को मिल सकता है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि खालिस्तान वाली बात पंजाब में उतनी नहीं है, जितनी मीडिया में है या फिर देश से बाहर है. उन्होंने कहा, 'सिखों की ऐसी कोई डिमांड नहीं है. यदि सतलुज यमुना लिंक की बात है तो यह कोई अलगाववाद जैसी बात नहीं है बल्कि यह पानी की डिमांड है. इसके अलावा चंडीगढ़ पर हक की बात है तो वह भी गलत नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि किसी भी अन्य राज्य की ऐसी संयुक्त राजधानी नहीं है.'

आंध्र और तेलंगाना की भी अलग राजधानी, फिर पंजाब की क्यों नहीं?
प्रोफेसर मलकीत सिंह ने कहा कि जब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्य अलग हुए तो दोनों की राजधानी भी अलग-अलग हैं. ऐसे में पंजाब को ही क्यों अपनी राजधानी साझा करनी पड़ती है. यह सवाल यहां के लोगों के मन में है. उन्होंने कहा कि इसलिए राजधानी की मांग या फिर पानी की मांग को खालिस्तान से नहीं जोड़ा जा सकता. इसके अलावा वह कहते हैं कि यदि बंदी सिखों को चुनाव से ठीक पहले छोड़ा गया तो खालिस्तान की बात करने वाले तत्वों को अपना नैरेटिव बढ़ाने में मदद मिलेगी.
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