- पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय का पता रायसीना हिल के साउथ ब्लॉक से नए सेवा तीर्थ नामक भवन में स्थानांतरित
- पीएम मोदी की सोच के अनुसार नए पीएमओ का नाम सेवा तीर्थ रखा गया है, जो प्रधानसेवक की सेवा भावना दर्शाता है
- सरकारी स्थानों के नाम बदलकर सेवा, कर्तव्य और लोककल्याण की भावना को प्रतिबिंबित किया गया है
आजाद भारत में पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय का पता बदलने जा रहा है. अब तक रायसीना हिल पर बने साउथ ब्लॉक से काम कर रहा प्रधानमंत्री कार्यालय जल्दी ही नए पते पर शिफ्ट होगा. नए संसद भवन से चंद कदम दूर विजय चौक के नजदीक बने नए प्रधानमंत्री कार्यालय को सेवा तीर्थ का नाम दिया गया है. हालांकि जब नए सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत नए पीएमओ की कल्पना की गई थी तब इसे एक्जीक्यूटिव एनक्लेव कहा गया था लेकिन पिछले साल दिसंबर में सरकारी सूत्रों ने जानकारी दी कि इसका नाम सेवा तीर्थ रखा गया है.
पीएम मोदी की गहरी सोच
इस नाम के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गहरी सोच है. 2014 में जब उन्होंने देश की कमान संभाली थी तब उन्होंने स्वयं को प्रधानमंत्री के स्थान पर प्रधान सेवक कहा था. नए प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम सेवा तीर्थ रखने के पीछे भी यही सोच है कि प्रधानसेवक का स्थान सेवा तीर्थ में है जहां 145 करोड़ देशवासियों की सेवा के लिए दिन-रात, 365 दिन अथक परिश्रम वैसे ही किया जाएगा जैसे पिछले एक दशक से हो रहा है.

PM Office
एक ऐसी सरकार जहां नागरिक सबसे पहले हैं. जहां शासक और शासित का संबंध नहीं बल्कि सेवा और कर्तव्य का बोध है. सत्ता का उद्देश्य लोगों पर हुकुम चलाना नहीं बल्कि उनकी सेवा करना है और यह एक दायित्व है. नाम बदलना केवल सरकारी फैसला भर नहीं बल्कि इसके गहरे सांस्कृतिक और नैतिक आयाम भी हैं. हर इमारत या सड़क का बदला नाम यही संदेश देता है कि सरकारी कामकाज में पारदर्शिता है और लोगों की सेवा का संकल्प है.
प्रधानमंत्री मोदी की यह सोच पिछले एक दशक में बदले कई महत्वपूर्ण पतों में दिखती है. दशकों तक देश के प्रधानमंत्री का आवास रेसकोर्स रोड के नाम से जाना जाता था. पीएम मोदी ने इसे बदला. 2016 में रेस कोर्स रोड का नाम लोक कल्याण मार्ग रखा गया. इसके पीछे यह भावना है कि इस पते से देश के लोगों के कल्याण की कामना और संकल्प के साथ काम होता है.

राजपथ का नाम कर्तव्य पथ
फिर बारी आई राजपथ की. इसका नाम बदल कर कर्तव्य पथ किया गया. इसके पीछे यह सोच थी कि स्वतंत्र भारत में ऐसा रास्ता कैसे हो सकता है जो राज के लिए ले जाता हो. बल्कि यह देश की सेवा करने के कर्तव्य की याद दिलाने वाला होना चाहिए. इसी सोच के साथ इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन के बीच बना राजपथ कर्तव्य पथ हो गया.
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मकर द्वार से लेकर गज द्वार
फिर नया संसद भवन बना तो उसके प्रवेश द्वारों से भारतीय संस्कृति की झलक प्रस्तुत की गई. इसमें छह द्वार हैं- मकर द्वार, हंस द्वार, शार्दुल द्वार, गज द्वार, अश्व द्वार और गरुड़ द्वार. पौराणिक और शुभ पशुओं के नामों पर रखे गए ये द्वार बुद्धि, ज्ञान, शक्ति, साहस, धर्म, आत्म साक्षात्कार, समृद्धि और कर्म के प्रतीक हैं. नए संसद भवन के भीतर भी भारतीय संस्कृति और परंपराओं का ज्ञान और दर्शन बताने वाली कलाकृतियां और भित्तिचित्र आदि लगाए गए हैं. वहीं पुराने संसद भवन का नाम बदल कर संविधान सदन कर दिया गया क्योंकि इसी भवन के केंद्रीय कक्ष में संविधान सभा की बैठकें होती थीं जहां संविधान बनाया गया.

PMO Office
राज भवन का नाम बदला
यही सोच नए केंद्रीय सचिवालय के नामकरण में भी दिखी. सभी मंत्रालयों को नए कार्यालय मिले हैं. इन कार्यालयों का नाम कर्तव्य भवन रखा गया है. इसके पीछे भी यही सोच है कि शासन एक कर्तव्य है. पिछले महीने ही देश भर के सभी राज भवनों का नाम बदला है. अब वे राज भवन के स्थान पर लोक भवन के नाम से जाने जाते हैं. राज शब्द से छुटकारा पाया गया है जो गुलामी के शासनकाल का प्रतीक रहा है. प्रधानमंत्री मोदी ने अगले दस साल में पूरे देश से गुलामी के प्रतीक चिन्हों को हटाने का संकल्प रखा है. नामकरण के इस अभियान के पीछे यह सोच भी दिखती है.
युगे युगीन संग्रहालय
नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक को संग्रहालयों में बदला जा रहा है. यह दुनिया के सबसे बड़ा संग्रहालयों में से एक होगा. इसका नाम भी युगे युगीन भारत संग्रहालय रखा गया है जो भारत के पांच हजार साल के गौरवशाली इतिहास की झलक दुनिया के सामने रखेगा.
ये परिवर्तन एक बड़े वैचारिक बदलाव को भी बताते हैं. भारत का लोकतंत्र अब राज करने के लिए नहीं बल्कि कर्तव्य और सेवा के लिए है. यह समाज में ओहदा दिखाने का माध्यम नहीं है बल्कि लोगों को आगे रखने के लिए है. केवल पता नहीं बदल रहा, मानसिकता भी बदल रही है.
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