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9 नवंबर से कैंसर की दवाओं की कीमतों में कटौती, NPPA ने 543 ब्रांडों की दवाओं के शुल्क में किया बदलाव

Cancer Drug: नई कीमतें 9 नवंबर से लागू होंगी. कई ऐसी दवाएं हैं जिनका इस्तेमाल कैंसर के इलाज में बड़े पैमाने पर किया जाता है और उनके दाम में कटौती की गई है.

9 नवंबर से कैंसर की दवाओं की कीमतों में कटौती, NPPA ने 543 ब्रांडों की दवाओं के शुल्क में किया बदलाव
सांकेतिक तस्वीर

कैंसर के इलाज पर होने वाला लाखों रुपये का खर्च अब कई मरीजों और उनके परिवारों के लिए कुछ हद तक कम हो सकेगा. केंद्र सरकार के फैसले के बाद 9 नवंबर से देशभर में कैंसर की कई जरूरी दवाएं पहले के मुकाबले काफी सस्ती हो जाएंगी. दवाओं की कीमतों में इतनी बड़ी कटौती की गई है कि कुछ दवाएं 80 से 90 फीसदी तक सस्ती हो गई हैं.

सरकार के तहत काम करने वाली नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने कैंसर की दवाओं के 543 ब्रांडों की कीमतों में संशोधन किया है. इसके साथ ही सरकार ने 137 एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है. माना जा रहा है कि इससे बाजार में मरीजों को कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध होंगी और इलाज का बोझ कुछ हद तक घटेगा.

नई कीमतें 9 नवंबर से लागू होंगी. कई ऐसी दवाएं हैं जिनका इस्तेमाल कैंसर के इलाज में बड़े पैमाने पर किया जाता है और उनके दाम में कटौती की गई है.

किन दवाओं के दाम कितने घटे?

  • Anarzole की कीमत 695.76 रुपये से घटाकर 73 रुपये कर दी गई है.
  • Azacytin Injection का दाम 6,337 रुपये से घटकर 1,495 रुपये हो गया है.
  • Bevacizab Injection की कीमत 21,767 रुपये से घटाकर 5,930 रुपये कर दी गई है.
  • Dasanat 20 का दाम 2,812 रुपये से घटकर 1,085 रुपये रह गया है.
  • Enuta की कीमत 6,578 रुपये से घटाकर 2,232 रुपये कर दी गई है.

सरकार का कहना है कि ट्रेड मार्जिन पर सीमा तय करने और कीमतों की समीक्षा का मकसद मरीजों तक जरूरी दवाएं अधिक किफायती दर पर पहुंचाना है. नई दरें लागू होने के बाद देशभर में कैंसर उपचार से जुड़ी कई प्रमुख दवाएं पहले की तुलना में काफी कम कीमत पर उपलब्ध होंगी.

सुप्रीम कोर्ट ने भी दवा कीमतों पर जताई थी सख्त नाराजगी

कैंसर की दवाओं के दाम कम करने के सरकार के फैसले से पहले इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र सरकार और निजी अस्पतालों से कड़े सवाल पूछ चुका है. हाल ही में सुनवाई के दौरान अदालत ने एक ऐसे मामले का जिक्र किया था, जिसमें कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाला एक इंजेक्शन डिस्ट्रीब्यूटर को करीब 11,000 रुपये में उपलब्ध था, लेकिन एक निजी अस्पताल ने उसी इंजेक्शन के लिए मरीज से 1.30 लाख रुपये वसूलने की बात कही. इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि आखिर इस भारी अंतर का औचित्य क्या है और मरीजों से इस तरह की "लूट" को कैसे सही ठहराया जा सकता है.

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि मरीजों के पास मोलभाव की कोई ताकत नहीं होती और दवाओं की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ आखिरकार उन्हीं पर पड़ता है. 

कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि जब जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में इतना बड़ा अंतर है तो नियमन व्यवस्था प्रभावी क्यों नहीं है. अदालत ने निजी अस्पतालों से भी सवाल किया था कि अगर वे हर सेवा का शुल्क लेते हैं तो दवाओं पर 100 से 400 गुना तक का मार्जिन क्यों रखा जाता है. इसी बहस के बीच केंद्र ने अदालत को बताया था कि 137 एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला लिया गया है, जिसके बाद अब 543 कैंसर दवा ब्रांडों की कीमतों में कटौती लागू की जा रही है.

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