- राष्ट्रपति ने कहा कि पश्चिम बंगाल के संथाल और आदिवासी अभी तक विकास के लाभ पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पाए हैं.
- मुर्मू ने सिलीगुड़ी में अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में आयोजन स्थल बदलने और प्रशासन की भूमिका पर चिंता जताई.
- उन्होंने कहा कि संथाल समाज मुख्य रूप से साल के वृक्ष की पूजा करता है, लेकिन बरगद का पेड़ रखा गया था.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शनिवार को चिंता व्यक्त की कि पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में रहने वाले संथाल और अन्य आदिवासी राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद अभी तक विकास से पूरी तरह लाभान्वित नहीं हो पाए हैं. मुर्मू ने सिलीगुड़ी में आयोजित नौवें अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में कहा, “मुझे नहीं लगता कि इस क्षेत्र में रहने वाले संथाल और अन्य आदिवासी पूरी तरह से प्रगति कर रहे हैं. विकास के लाभ आप तक उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं, जिस स्तर पर पहुंचने चाहिए थे.”
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि आज यहां 'इंटरनेशनल संथाल काउंसिल' का सम्मेलन होना था. इस विशाल मैदान को देखकर मुझे लगता है कि यदि कार्यक्रम यहीं होता तो बहुत अच्छा रहता. मुझे नहीं पता कि प्रशासन के मन में क्या था. पहले उन्होंने अनुमति दी, फिर अंत में न जाने क्या हुआ. उन्होंने हमसे कहा कि यहां जगह की कमी (कंजेस्टेड) है. लेकिन मैं देख रही हूं कि यहां तो 5 लाख लोग आसानी से इकट्ठा हो सकते हैं. पता नहीं हमें उस छोटी जगह पर क्यों ले जाया गया जहां हमारे संथाल भाई-बहन अधिक संख्या में नहीं पहुंच पाए.
#WATCH | Darjeeling, West Bengal | President Droupadi Murmu says, "Today was the International Santal Conference. When I came here after attending it, I realised it would have been better if it had been held here, because the area is so vast... I don't know what went through the… pic.twitter.com/zMYyvDo0Y2
— ANI (@ANI) March 7, 2026
द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि इसीलिए मैंने सोचा कि मैं स्वयं आपके पास आऊं और देखूं कि आप लोग यहां कैसे रहते हैं. बस यहां थोड़ी साफ-सफाई की आवश्यकता है. मुझे पता चला है कि यहां के लोग बहुत बुद्धिमान और सुलझे हुए हैं, फिर भी प्रशासन ने कार्यक्रम ऐसी जगह रखा जहां संथाल लोग आसानी से न पहुंच सकें.
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि आज यहां पूजा थी और संथाल समाज मुख्य रूप से साल (सखुआ) के वृक्ष की पूजा करता है, लेकिन मैंने यहां बरगद का पेड़ देखा. पूछने पर मुझे बताया गया कि आप लोग साल की टहनी लाकर यहां पूजा करते हैं. मेरा मानना है कि इतने बड़े क्षेत्र में साल के वृक्ष लगाए जाने चाहिए. प्रशासन को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए. हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) देश है, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और संथाल समाज के साथ-साथ प्रकृति और पेड़-पौधों का भी सम्मान होना चाहिए. सभी को अपने उत्थान के प्रयास में सहयोग मिलना चाहिए.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि मुझे उस स्थान की स्थिति उतनी अच्छी नहीं लगी, इसलिए मैं यहां चली आई. मुझे यह देखकर दुख हुआ कि शायद प्रशासन के मन में यह रहा होगा कि लोग न आएं और राष्ट्रपति बस ऐसे ही घूमकर चली जाएं.
द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि शिष्टाचार के नाते, जब राष्ट्रपति का आगमन होता है, तो मुख्यमंत्री और मंत्रियों को उपस्थित रहना चाहिए. मुख्यमंत्री ममता दीदी नहीं आईं और राज्यपाल महोदय का तबादला हो गया है. इसलिए वे भी नहीं आ पाए. चूंकि तिथि पहले से तय थी, इसलिए मैं यहां आ गई. कोई बात नहीं, मैं आप सभी को धन्यवाद देती हूं कि आप इतनी अल्प सूचना पर हजारों की संख्या में यहां एकत्र हुए.
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि मैं चाहती हूं कि आप सभी मिल-जुलकर रहें. यह केवल संथालों या आदिवासियों का ही नहीं, बल्कि आदिवासियों, गैर-आदिवासियों, हिंदी भाषियों, बंगालियों और गोरखाओं—सबका देश है. हम सब भाई-भाई हैं. हमारे पूर्वजों ने हमें मिल-जुलकर रहना सिखाया है और हम उसी परंपरा को निभाएंगे. हम एक-दूसरे के त्योहार मिल-जुलकर मनाएंगे.
द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि मैं यहां केवल यह देखने आई थी कि प्रशासन ने जिस जगह को 'कंजेस्टेड' बताया था, वह वास्तव में कैसी है. मैं सोच रही थी कि अगर जगह की कमी होगी तो सरकार से कहकर जगह दिलवाऊंगी, पर यहां तो पर्याप्त स्थान उपलब्ध है. मैं भी बंगाल की ही बेटी हूं. ममता दीदी मेरी छोटी बहन जैसी हैं, पता नहीं वे किसी बात पर मुझसे नाराज हैं या क्या, जो कार्यक्रम वहां रखा गया. मुझे कोई गिला-शिकवा नहीं है. वे भी खुश रहें और आप लोग भी स्वस्थ व सुखी रहें.
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