- प्रयागराज माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच संगम घाट पर विवाद के कारण टकराव हुआ था.
- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म UP के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में उमाशंकर उपाध्याय के नाम से हुआ.
- 2003 में दंड संन्यास लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद नाम ग्रहण किया और 2022 में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य बने.
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माघ मेले के दौरान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच के विवाद की देशभर में काफी चर्चा है. 17 जनवरी की इस घटना को सप्ताह भर होने को आया है, लेकिन विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. राजनीति के दिग्गजों से संत समाज तक की राय इस मुद्दे पर बंटी नजर आ रही है. संगम क्षेत्र में स्नान के दौरान हुए टकराव से शुरू हुआ मामला अब धार्मिक मर्यादा, प्रशासनिक व्यवस्था और परंपराओं की प्रतिष्ठा के सवालों तक पहुंच गया है. यह कोई पहला मामला नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती विवादों में हैं. शंकराचार्य उपाधि पर भी विवाद है.
अब लोग जानना चाहते हैं कि आखिर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हैं कौन और उनका अब तक का आध्यात्मिक और सामाजिक सफर कैसा रहा है.

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ये है मामला
17 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रयागराज मेघा मेला में संगम घाट पर स्नान करने पहुंचे थे. पूरे लाव-लश्कर के साथ वह अपनी पालकी पर आए थे, लेकिन पुलिस प्रशासन ने उन्हें बिना रथ के आगे बढ़ने को कहा. इसी बात को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला व्यवस्था में जुटे कर्मचारियों के बीच विवाद हो गया. इस दौरान उनके समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की हालत बन गई और अविमुक्तेश्वरानंद मेले में ही धरने पर बैठ गए.
उमाशंकर उपाध्याय जीते छात्रसंघ चुनाव
शंकराचार्य बनने से पहले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उमाशंकर उपाध्याय के नाम से जाना जाता था. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के ब्राह्मणपुर जिले में 5 अगस्त 1969 को उमाशंकर उपाध्याय का जन्म हुआ. उमाशंकर उपाध्याय की प्राथमिक शिक्षा प्रतापगढ़ में ही हुई. वाराणसी के मशहूर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की शिक्षा ग्रहण की है. इस दौरान पढ़ाई के दौरान वो छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे. वे 1994 में छात्रसंघ का चुनाव भी जीते थे. बाद में वे गुजरात चले गए.

2022 में ऐसे बने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य
गुजरात में उनका संपर्क ब्रह्मचारी राम चैतन्य से हुआ, जो स्वामी करपात्री महाराज के शिष्य थे. उन्हीं की प्रेरणा से उमाशंकर उपाध्याय ने गंभीरता से संस्कृत अध्ययन की ओर ध्यान दिया. उमाशंकर उपाध्याय ब्रह्मचारी राम चैतन्य के माध्यम से करपात्री महाराज से मिले और फिर ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से मिले. इसके बाद 15 अप्रैल 2003 को दंड संन्यास की दीक्षा ली और इसी के साथ उन्हें नया नाम स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद दिया गया. 11 सितंबर 2022 को पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया, जिसके बाद अगले दिन उनका पट्टाभिषेक हुआ और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य बने.
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जानें शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को
- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती उत्तराखंड के जोशीमठ स्थित ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य हैं. इनका जन्म 5 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के पट्टी तहसील के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था.
- उनका मूल नाम उमाशंकर उपाध्याय है और उनकी प्राथमिक शिक्षा प्रतापगढ़ जिले में में ही हुई.
- उन्होंने वाराणसी के मशहूर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की शिक्षा ग्रहण की है. पढ़ाई के दौरान वो छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे और 1994 में छात्रसंघ का चुनाव भी जीते.
- बाद में उपाध्याय गुजरात में धर्म और राजनीति में समान दखल रखने वाले स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य के संपर्क में आए.
- उनके कहने पर ही उमाशंकर उपाध्याय ने संस्कृत की पढ़ाई शुरू की. करपात्री जी के बीमार होने पर वे वापस आए और उनके निधन तक सेवा की.
- इसी दौरान वे ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के संपर्क में आए. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य की पढ़ाई पूरी करने की. उन्होंने संस्कृत व्याकरण, वेद, पुराण, उपनिषद, वेदांत, आयुर्वेद और शास्त्रों की गहन शिक्षा ली.
- बाद में उन्हें 15 अप्रैल 2003 को दंड सन्यास की दीक्षा दी गई. इसके बाद उन्हें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती नाम मिला.
- सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया.
- इस पद को लेकर तब से ही कुछ विवाद और कानूनी पेच सामने आते रहे हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट में है. उनके वकील टीएन मिश्रा के अनुसार, 11 सितंबर, 2022 को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की मृत्यु के बाद, 12 सितंबर, 2022 को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का 'पट्टाभिषेक' हुआ.
- 21 सितंबर, 2022 को स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने अभिषेक को रोकने के लिए एक अपील दायर की थी. हालांकि, मिश्रा ने दावा किया कि कोर्ट ने पाया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछली कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे और अपने आदेश में कोर्ट ने खुद उन्हें "शंकराचार्य" कहा था.
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