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फाल्टा में कुछ नया नहीं हुआ... राजनीतिक हिंसा और बंगाल के 'रोमांस' का इतिहास लंबा है

बंगाल में हिंसा कोई नई बात नहीं है. बंगाल में राजनीतिक हिंसा का एक लंबा इतिहास रहा है. 1905 में बंगाल विभाजन ने हिंसा को जन्म दिया. आजादी से पहले भी हिंसा हुई. आजादी के बाद बनी सरकारों ने भी हिंसा रोकने के लिए कुछ खास नहीं किया.

फाल्टा में कुछ नया नहीं हुआ... राजनीतिक हिंसा और बंगाल के 'रोमांस' का इतिहास लंबा है
फाल्टा में हिंसा के बाद तैनात केंद्रीय सुरक्षाबल.
IANS
  • फाल्टा के सभी पोलिंग बूथों में दोबारा वोटिंग का आदेश 21 प्रतिशत से अधिक बूथों पर हिंसा की वजह से दिया गया
  • बंगाल में चुनावी प्रक्रिया में केंद्रीय बलों की सबसे ज्यादा मौजूदगी के बावजूद राजनीतिक हिंसा का असर दिखा
  • बंगाल में राजनीतिक हिंसा की जड़ें नक्सलबाड़ी आंदोलन, वाम मोर्चा काल और तृणमूल शासन के दौर से जुड़ी हैं
कोलकाता:

फाल्टा विधानसभा के सभी पोलिंग बूथ में दोबारा वोटिंग का होना, पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का एक सबूत है. पूरे विधानसभा क्षेत्र में दोबारा वोटिंग का आदेश देना एक बेहद दुर्लभ और कड़ा कदम है लेकिन यह आदेश इसलिए दिया गया, क्योंकि 21% से ज्यादा बूथों पर हिंसा की खबरें आईं. 

यह सब तब हुआ जब राज्य में पहली बार सबसे ज्यादा केंद्रीय बल और केंद्र सरकार के अधिकारियों की मौजूदगी रही. इन मौजूदगी में चुनावी प्रक्रिया में इतने बड़े पैमाने पर 'दखल' यह दिखाता है कि हिंसक गुंडे संसाधनों और क्षमताओं, दोनों ही मामलों में कमजोर नहीं हैं.

हालांकि, पश्चिम बंगाल के इतिहास में यह पहले चुनाव हैं, जो सबसे ज्यादा शांतिपूर्ण तरीके से हुआ. फिर भी हिंसक अतीत यहां दिखाई दिया. भले ही यह सिर्फ इस रूप में हो कि बीजेपी ने टीएमसी के दोबारा जीतने की स्थिति में उस हिंसा के लौटने का डर दिखाया.

हालांकि, फाल्टा में उपचुनाव का राज्य के चुनावी जनादेश पर तो कोई खास असर नहीं पड़ेगा. हां, यह सिर्फ ममता बनर्जी और टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित कर सकता है. यह घटना बंगाल के उस विरोधाभासी पहलू को उजागर करती है, जहां राजनीतिक हिंसा, एक विशाल सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ मौजूद रहती है.

लगभग सवा सदी के अस्तित्व में राजनीतिक हिंसा स्थिर रही, क्योंकि यह केवल आपराधिक कृत्यों की एक श्रृंखला भर नहीं थी. बल्कि इसके बजाय बंगाल में हिंसा एक गहरे संरचनात्मक घटनाक्रम के रूप में उभरी है, जिसमें राजनीतिक सत्ता, स्थानीय बाहुबल और आर्थिक अस्तित्व आपस में गुंथे हुए हैं.

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राजनीतिक हिंसा की जड़ें...

अक्सर, राज्य में राजनीतिक हिंसा की जड़ें आजादी के बाद के तीन प्रमुख कालखंडों से जोड़ी जाती हैं- नक्सलबाड़ी आंदोलन (1967-72), वाम मोर्चा काल (1977-2011) और मौजूदा तृणमूल काल.

हालांकि, 1905 में भारत के तत्कालीन वायसराय जॉर्ज नथानिएल कर्जन ने बंगाल का बंटवारा कर उस हिंसा को बढ़ावा दिया, जो आज नजर आती है. यह मानना होगा कि इस फैसले के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन भारत के ज्यादातर हिस्सों में काफी हद तक संवैधानिक दायरे में रहे. हालांकि, बंगाल में इसने क्रांतिकारी या उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन को जन्म दिया. अनगिनत क्रांतिकारियों ने इतिहास में अपनी जगह बनाई. भले ही ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें 'आतंकवादी' का लेबल दिया था.

अनुशीलन समिति और युगांतर जैसी गुप्त संस्थाएं बनाई गईं, और इनमें से कुछ भारत के दूसरे हिस्सों में भी फैलीं जैसे कि उस समय के महाराष्ट्र में. इनमें से कई समूहों या व्यक्तियों ने ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या भी की और अगर वे किसी कार्रवाई के दौरान मारे गए या उन्हें फांसी दे दी गई तो उन्हें नायक या शहीद के रूप में देखा जाने लगा.

इस तरह का प्रभाव सात समंदर पार भी पहुंचा, जहां विनायक दामोदर सावरकर के प्रभाव में आकर मदन लाल ढींगरा ने एक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या कर दी और हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए. 

बंगाल से शुरू हुई शहादत की इस भावना ने एक राजनीतिक और सांस्कृतिक मिसाल कायम की. समय के साथ, इस क्षेत्र में किसी 'मकसद' के नाम पर किए गए बलिदान और हिंसा को सही ठहराया जाने लगा.

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फाल्टा में विरोध प्रदर्शन करते स्थानीय लोग. (Photo Credit: IANS)

फाल्टा में विरोध प्रदर्शन करते स्थानीय लोग. (Photo Credit: IANS)

बंगाल में आजादी से पहले का हिंसक इतिहास

आजादी से पहले बंगाल में लंबे समय तक और बेहद हिंसक माहौल रहा. इसकी शुरुआत 1946 में मुस्लिम लीग के 'डायरेक्ट एक्शन' के आह्वान के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों और चुन-चुनकर की गई हत्याओं से हुई थी। इस हिंसा का रुख, जो शुरू में ब्रिटिश शासन के खिलाफ था, बहुत जल्द ही बदलकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के बीच की आपसी हिंसा में तब्दील हो गया. आखिरकार, बंगाल में और काफी हद तक आज भी 'राजनीति' को एक सभ्य और शालीन लोगों का क्षेत्र नहीं माना जाता है.

बहरहाल, जैसे-जैसे भारतीय राष्ट्रवाद ने आजादी के आंदोलन को और भी ज्यादा मजबूती और स्पष्टता के साथ आगे बढ़ाया, 1940 के दशक में बंगाल में हिंसा का स्तर और भी बढ़ गया. 1946 के 'महान कलकत्ता हत्याकांड' से ठीक पहले 'तेभागा आंदोलन' हुआ था, जिसमें बंगाल के किसानों ने जमींदारों के खिलाफ हिंसक विद्रोह कर दिया था और फसल का दो-तिहाई हिस्सा देने की मांग की थी.

बंगाल की राजनीति का यह उग्र दौर, वहां की राष्ट्रवादी चेतना के साथ गहराई से जुड़ा हुआ था। इसकी जड़ें 1943 के उस भयानक 'बंगाल अकाल' में थीं, जिसने प्रांत की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से तबाह कर दिया था और नागरिकों और प्रशासन के बीच के भरोसे को पूरी तरह से खत्म कर दिया था। जैसे-जैसे स्थानीय संभ्रांत वर्ग अनाज की जमाखोरी और बेईमानी से व्यापार करके भारी मुनाफा कमा रहा था, वैसे-वैसे किसान और शहरी गरीब बहुत ज्यादा उग्र होते गए. समय के साथ, और कुछ इलाकों में, उन्होंने खुद को हिंसक दस्तों के रूप में संगठित कर लिया. इन दस्तों ने स्थानीय 'मस्तान' (गुंडे) जैसी भूमिका निभाने से लेकर, आर्थिक और राजनीतिक माफिया या नेताओं के नियंत्रण में काम करने वाले संगठित बलों का हिस्सा बनने तक, कई तरह के रूप अपना लिए.

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सरकार कोई भी हो... हिंसा हमेशा रही

सिद्धार्थ शंकर रे (1971) के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार, राज्य के इतिहास में, सबसे हिंसक और दमनकारी दौरों में से एक के रूप में याद की जाती है. यह शासन अपने सुनियोजित "राज्य-प्रायोजित" दमन के लिए जाना जाता है. हालांकि इसका मुख्य उद्देश्य नक्सलवादी आंदोलन को कुचलना था, लेकिन इसने अन्य राजनीतिक विरोधियों को भी निशाना बनाया.

CPM के नेतृत्व वाले मुख्यधारा के वामपंथ को भी राज्य के दमन का सामना करना पड़ा, और जब 1977 के विधानसभा चुनावों के बाद ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने, तो उनके शासन ने भी, कुछ बदलावों के साथ, बिल्कुल रे के शासन जैसा ही रूप ले लिया.

बहुत जल्द ही, यह पार्टी जमीनी स्तर तक एक समानांतर सरकार बन गई. यह बात सामने आई कि आम नागरिक अपने सभी विवादों चाहे वे परिवार के भीतर के हों, अन्य व्यक्तियों के साथ हों, या राज्य के तंत्र और उसके अधिकारियों के साथ हों, को सुलझाने के लिए स्थानीय पार्टी पदाधिकारियों (अपार्चिक) के पास जाने लगे.

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फाल्टा में टीएमसी कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन. (Photo Credit: PTI)

फाल्टा में टीएमसी कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन. (Photo Credit: PTI)

वाम मोर्चे की तरह ही TMC का शासन?

यह 'पार्टी-समाज' व्यवस्था वाम मोर्चे की हार के बाद भी बनी रही और इसने अपनी निष्ठा TMC की ओर मोड़ ली. TMC ने इसे स्वीकार कर लिया, क्योंकि वाम मोर्चे के शासन के दौरान वह अपना कोई कैडर नेटवर्क खड़ा नहीं कर पाई थी. हालांकि, वाम मोर्चे के विपरीत, जिसने पार्टी के मुखिया प्रमोद दासगुप्ता की मौजूदगी के कारण पार्टी के लोगों को कुछ तय सीमाओं के भीतर ही सीमित रखा था, TMC का नेतृत्व, अति-उत्साही और बाहुबल-धनबल वाले दबंगों की 'मनमानी' पर अंकुश लगाने में असमर्थ रहा.

यह बंगाल और वहां के लोगों के लिए एक त्रासदी है कि जिन लोगों के पुरखों को इस परिघटना की शुरुआत में 'रोमांटिक' राष्ट्रवादियों के रूप में देखा जाता था, अब उनकी अगली पीढ़ी को जनता 'त्याज्य' मानती है और यदि उन्हें त्यागा न जाए, तो उन्हें खुश करने के लिए उनकी हर मांग पूरी करनी पड़ती है.

इस चुनाव के दौरान, स्थानीय व्यापारियों से 'जबरन वसूली' की परंपरा, या उन्हें व्यापार से जुड़ी 'सलाह' मानने के लिए मजबूर करने की प्रथा, एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरी. BJP ने इस भावना और इस घटना के 'दोबारा घटने' के डर को चुनावी लाभ के लिए भुनाने की कोशिश की, जबकि दूसरी ओर, कुछ राज्यों में उसके अपने शासन भी गैर-न्यायिक रास्तों पर चले हैं.

चुनावी नतीजों और अगले पांच सालों तक राज्य पर 'शासन' करने का मौका जिस भी पार्टी को मिले, उससे इतर, अब समय आ गया है कि इस व्यापक हिंसा की परंपरा को खत्म किया जाए. यह देखना बाकी है कि नई सरकार इस राह पर चलती है या इसे ही जारी रखती है.

(नीलांजन मुखोपाध्याय)

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