विज्ञापन

तपती गर्मी के बीच पर्यावरण बचाने की मुहिम, 2.5 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए, अब 'पीपल की छांव' से दे रहे संदेश

ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण लगातार बढ़ते तापमान के बीच पर्यावरण और पेड़-पौधों की जरूरत फिर से दोहराई जा रही है. पर्यावरण और पेड़-पौधों की जरूरत को लेकर कई लोग उल्लेखनीय काम कर रहे हैं. उसी में एक स्वामी प्रेम परिवर्तन भी हैं.

तपती गर्मी के बीच पर्यावरण बचाने की मुहिम, 2.5 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए, अब 'पीपल की छांव' से दे रहे संदेश
टीम के साथ पौधे लगाते स्वामी प्रेम परिवर्तन.
नई दिल्ली:

इस समय पूरा भारत प्रचंड गर्मी की जद में है. दुनिया के सबसे अधिक तापमान वाले शहरों की लिस्ट में भारत के ही अधिकतर शहर रह रहे है. दिन की तपती गर्मी के साथ-साथ रात में भी तापमान इतना ज्यादा रह रहा है कि सुकून की नींद मुश्किल हो जा रही है. एसी, कूलर, पंखा भी हांफ रह रहे हैं. ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण लगातार बढ़ते तापमान के बीच पर्यावरण और पेड़-पौधों की जरूरत फिर से दोहराई जा रही है. पर्यावरण और पेड़-पौधों की जरूरत को लेकर कई लोग उल्लेखनीय काम कर रहे हैं. उसी में एक स्वामी प्रेम परिवर्तन भी है. जिन्होंने लगभग पांच दशक तक जमीनी स्तर पर काम करके 2.70 लाख हेक्टेयर में पेड़ लगाकर वनस्पति को पुनर्स्थापित किया और ढाई करोड़ पेड़ लगाए. उनके इस मुहिम के कारण लोग उन्हें पीपल बाबा भी कहते है. 

अब वह अपने अनुभवों को किताब के जरिए लोगों के सामने लाए हैं. उन्होंने राजस्थान, उत्तराखंड, यूपी समेत कई राज्यों में धरती को बचाने की मुहिम के चलते हरियाली फैलाई है. उन्होंने राजस्थान के जयपुर, उदयपुर, बड़गांव और जोधपुर में भी करीब डेढ़ लाख पौधे लगाए हैं. 

राजस्थान-गुजरात में लगाए लाखों पौधे

उनका कहना है कि पीपल के पत्ते की अपनी एक अलग ही खुशबू होती है. आयुर्वेद में पीपल के पत्तों का पाउडर अस्थमा के लिए और इसका काढ़ा हृदय रोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. मराठवाड़ा में लोग नीम को बहुत पसंद करते थे, इसलिए मैंने उनकी गलियों को नीम से भर दिया. राजस्थान और गुजरात में लोग अरावली की कठोर प्रजातियां चाहते थे. 

जैसे लसोड़ा, चामरोड़, बहेड़ा, निर्गुंडी, वज्रदंती, मेहंदी, करौंदा. उनका कहना है कि अगर आप उस छाया के मूल्य का आकलन करेंगे, तो हैरान रह जाएंगे. एक छायादार पेड़ की छांव से एक विक्रेता को प्रतिदिन का किराया लगभग 200 रुपए प्रतिदिन देने से मुक्ति मिल जाती है. इस तरह सालाना करीब 70,000 रुपए की बचत होती है. 

उत्तराखंड, हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों में बीता जीवन, अब किताब में लिखा अनुभव

कोरोना काल में भी वह और उनकी टीम पौधों को पानी देते थे. पीपल बाबा बताते हैं कि नानी की बदौलत उनका उत्तराखंड के जंगलों, कॉर्बेट, राजाजी, हरिद्वार, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल और अल्मोड़ा से परिचय हुआ. तबादले के बाद उनके परिवार का ठिकाना हिमाचल प्रदेश का डलहौजी बना. उन्होंने कोलकाता, चंडीगढ़ में भी पढ़ाई की. 

अपने पौधरोपण अभियान और जीवन के अनुभवों को उन्होंने एक किताब 'पीपल की छांव' में उतारा है. जिसे पेंग्विन प्रकाशन के द्वारा लॉन्च की जा रही है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अमेजन आदि पर मिलेगी. उनका कहना है कि पर्यावरणीय परिवर्तन केवल संस्थानों या नीतियों से शुरू नहीं होता, बल्कि यह साधारण नागरिकों से शुरू होता है, जो कार्य करने का निर्णय लेते हैं.

यह भी पढ़ें - ब्रिटेन से लेकर भारत तक गर्मी तक टॉर्चर, लंदन में टूटा 80 साल का रिकॉर्ड, आखिर क्यों इतनी तप रही धरती?

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com