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कितना होना चाहिए किसी प्राइवेट अस्पताल के कमरे का किराया, संसदीय समिति ने सरकार को दिया यह फार्मूला

संसद की एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज सरकारी अस्पतालों की तुलना में पांच से 10 गुना तक महंगा है. समिति का कहना है कि प्रसव, कैंसर, हृदय रोग और गुर्दे के खराबी की स्थिति में यह अंतर और बढ़ जाता है.

कितना होना चाहिए किसी प्राइवेट अस्पताल के कमरे का किराया, संसदीय समिति ने सरकार को दिया यह फार्मूला
नई दिल्ली:

समाजवादी पार्टी के राज्य सभा सदस्य प्रो. राम गोपाल यादव की अध्यक्षता वाली स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की संसदीय स्थायी समिति ने अपना रिपोर्ट पिछले हफ्ते पेश किया. इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य और इलाज को लेकर कई चौकाने वाले आंकड़े दिए गए हैं और सिफारिशें की गई हैं. इन्हीं में से एक सिफारिश अस्पतालों के कमरों के किराए को लेकर है. समिति ने सिफारिश की है कि किसी शहर के अस्पताल के कमरों का अधिकतम किराया उस इलाके में स्थित किसी तीन सितारा होटल के कमरे के किराए जितना ही होना चाहिए. समिति का कहना है कि इसमें रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ आदि की फीस को भा शामिल किया जा सकता है.  

कितना होना चाहिए अस्पताल के कमरे का किराय

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उसका मानना है कि कुछ निजी अस्पताल, विशेषकर महानगरों में स्थित निजी अस्पताल, अस्पताल में रहने के लिए भारी शुल्क वसूलते हैं. अस्पतालों के बिलिंग ढांचे का विश्लेषण करने के बाद समिति ने पाया है कि अस्पतालों के कमरे के किराए को तत्काल तर्कसंगत बनाना जरूरी है. समिति का कहना है कि अस्पताल के कमरे के शुल्क एक समान नहीं होते है. समिति का कहना है कि भौगोलिक क्षेत्रों के साथ-साथ एक ही क्षेत्र के अस्पतालों में भी बुनियादी ढांचे, सेवा स्तर और परिचालन लागत में अंतर के कारण किराया अलग-अलग होते हैं. समिति ने सिफारिश की है कि किसी अस्पताल के कमरे का किराया अस्पताल के आसपास के क्षेत्र में स्थित तीन सितारा होटलों के कमरे के शुल्क से अधिक नहीं होना चाहिए. समिति ने सिफारिश की है कि मूल कमरे के शुल्क में रेजिडेंट डॉक्टर की लागत, नर्सिंग लागत, उपभोग्य सामग्रियों की लागत, भोजन शुल्क और कपड़े धोने का शुल्क को जोड़ा जा सकता है, ताकि कुल लागत तर्कसंगत हो जाए.

सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कितना खर्चीला है

इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में एक और कमी की ओर इशारा किया है.समिति ने राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से पिछले साल जनवरी से दिसंबर के बीच किए गए नेशनल सैंपल सर्वे के हवाले से कहा है कि निजी अस्पतालों और सरकारी अस्पलातों में इलाज के खर्च में भारी अंतर है. समिति ने कहा है कि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज सरकारी अस्पतालों की तुलना में पांच से दस गुना तक अधिक महंगा है. समिति का कहना है कि प्रसव, कैंसर, हृदय रोग और गुर्दे के खराबी की स्थिति में यह अंतर साफ-साफ दिखाई देता है. समिति के मुताबिक भारत में किसी बीमारी के लिए अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च करीब 37,858 रुपये है, जबकि जेब से होने वाला खर्च करीब 34,064 रुपये है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने का औसत खर्च 6,631 रुपये है जबकि निजी अस्पतालों में यह बढ़कर 50,508 रुपये हो जाता है. समिति का कहना है कि कैंसर, हृदय रोग और गुर्दे की खराबी जैसी गंभीर बीमारियों के मामले में यह अंतर और भी ज्यादा हो जाता है. 

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