संसद के मॉनसून सत्र में केंद्र सरकार ने खदानों और खनिजों से जुड़े नियमों में बदलाव करते हुए एक बिल पेश किया. अगर यह कानून बन जाता है तो इसके बाद राज्य सरकारें मिनरल राइट्स पर एक्स्ट्रा टैक्स नहीं लगा सकते. इस बिल का नाम 'माइन्स एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल 2026' है. इसका मकसद खनिजों पर टैक्स लगाने की राज्यों की शक्ति को सीमित करना और केंद्र सरकार का कंट्रोल बढ़ाना है.
लोकसभा में इस बिल को कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने पेश किया था. बिल में कहा गया है कि 'राज्य सरकार खनिज अधिकारों पर कोई टैक्स, सेस या ऐसा ही कोई अन्य चार्ज नहीं लगाएगी.' ये प्रावधान सिर्फ खनिज नहीं, बल्कि खनिज वाली जमीनों पर भी लागू होंगे.
बिल के जरिए ये बदलाव 2024 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद किया जा रहा है, जिसमें 9 जजों की बेंच राज्यों के उस अधिकार को सही ठहराया था, जिसके तहत वे MMDR एक्ट के तहत रॉयल्टी से अलग खनिज अधिकारों पर टैक्स लगा सकते हैं. कोर्ट ने कहा था कि रॉयल्टी कोई टैक्स नहीं हैं.
#MonsoonSession2026
— SansadTV (@sansad_tv) August 10, 2026
Union Minister of Mines @kishanreddybjp introduces The Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 in #LokSabha
That the Bill further to amend the Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957.@LokSabhaSectt… pic.twitter.com/zZAlyhw1Ti
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इस बिल से केंद्र को कैसे मिलेगा फुल कंट्रोल?
कोई एक्स्ट्रा टैक्स नहीं: इस बिल में प्रावधान है कि राज्य सरकारें खनिज और खनिज की जमीनों पर कोई टैक्स, सेस या लेवी नहीं लगा सकतीं. प्रस्तावित बिल के मुताबिक, अब राज्य सरकारें चाहकर भी खनिज अधिकारों पर कोई एक्स्ट्रा टैक्स नहीं लगा सकतीं.
- पुराना टैक्स नहीं वसूलेंगे: इसमें प्रस्ताव कि संशोधित MMDRA के लागू होने से पहले अगर राज्य सरकार के पास टैक्स, सेस या लेवी जमा नहीं हुई है, तो उसे वसूला नहीं जाएगा. मतलब पुराने टैक्स, सेस या लेवी को अब अमान्य माना जाएगा. हालांकि, लागू होने से पहले जमा हो चुका है तो उसे वापस नहीं किया जाएगा.
- खनिज वाली जमीन: मौजूदा कानून में खनिज वाली जमीन खदानों वाले रेगुलेटरी ढांचे में नहीं हैं. लेकिन नए बिल में प्रस्ताव है कि 'खनिज वाली जमीन' उसे माना जाएगा, जिसमें केंद्र सरकार की ओर से तय किए गए पैमानों के अनुसार खनिज हों. इसके बाद यह जमीन को केंद्र सरकार के दायरे में लाने का प्रस्ताव करता है.
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लेकिन इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
बिल पेश करते हुए केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि मिनरल्स पर टैक्स और लेवी लगाने में किसी भी तरह की क्षेत्रीय असमानता का असर जनहित पर पड़ता है. अगर बहुत ज्यादा टैक्स और लेवी असंतुलित तरीके से लगाए जाते हैं, तो इंडस्ट्री लोकल सप्लाई लाइनों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर सकती है. इससे बाजारों का विकास ठीक से नहीं हो पाएगा, ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बढ़ेगा और प्रदूषण भी बढ़ेगा.
उन्होंने कहा कि भले ही हमारे पास खनिजों के काफी लोकल संसाधन हों, लेकिन घरेलू सप्लाई महंगी होने के कारण मिनरल के इंपोर्ट में बढ़ोतरी का भी जोखिम है.
उन्होंने कहा कि टैक्स का बहुत ज्यादा बोझ आखिरकार सामानों की लागत बढ़ा सकती है और नतीजतन देश के आम नागरिकों के लिए बुनियादी चीजों की लागत भी बढ़ सकती है. इसके अलावा, अगर रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स (पुराने समय से लागू होने वाला टैक्स) लगाया जाता है तो इससे निवेशकों का भरोसा कम होगा.
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