- नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार जनवरी से दिसंबर 2025 में 13 प्रतिशत भारतीय बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए
- शहरों में 15 प्रतिशत और गांवों में 12 प्रतिशत लोग बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती हुए हैं
- हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज 2017-18 से बढ़कर 2025 में गांवों में 47 प्रतिशत और शहरों में 44 प्रतिशत हो गया
अस्पताल में एक बार भर्ती हुए तो बिल का मीटर चालू हो जाता है. अगर कोई बड़ी बीमारी हो गई तो सारी सेविंग्स तक खत्म हो जाती है. हैरान करने वाली बात यह है कि इंश्योरेंस होने के बावजूद अस्पताल में भर्ती होने का ज्यादातर खर्च लोगों को अपनी ही जेब से देना पड़ता है. सर्वे बताता है कि सरकारी अस्पताल की तुलना में निजी अस्पताल 11 गुना ज्यादा वसूल रहे हैं.
यह बात नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) के सर्वे में सामने आई है. यह सर्वे जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच हुआ था. इसमें सामने आया कि सर्वे के दौरान पिछले 15 दिनों में 13% भारतीय अस्पताल में भर्ती हुए. गांवों की तुलना में शहरों में लोग ज्यादा बीमार पड़े. शहरों में रहने वाले लगभग 15% और गांवों में रहने वाले 12% भारतीय को बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.
सर्वे में सामने आया है कि ज्यादातर लोग इलाज के लिए सरकारी के बजाय निजी अस्पताल में इलाज के लिए जाना पसंद करते हैं. और अगर अस्पताल में भर्ती हो जाते हैं तो अपनी जेब से हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जबकि अब पहले की तुलना में ज्यादा लोगों के पास हेल्थ इंश्योरेंस है.
NSS का सर्वे बताता है कि 2017-18 की तुलना में 2025 में हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज काफी बढ़ा है लेकिन फिर भी अस्पताल में भर्ती होने पर लोगों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ रहा है. 2017-18 में गांवों में 14% और शहरों में 19% लोगों के पास हेल्थ इंश्योरेंस था. 2025 में गांवों में 47% और शहरों में 44% लोगों के पास हेल्थ इंश्योरेंस हो गया, लेकिन इसके बावजूद अस्पताल में भर्ती होने पर लोगों का 90 फीसदी से ज्यादा खर्च अपनी जेब से देना पड़ता है.

2025 में सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 7,042 रुपये का बिल बन जाता है. इसमें से 6,631 रुपये का बिल लोगों को अपनी जेब से देना पड़ा. इसी तरह, अगर निजी अस्पताल में भर्ती हुए हैं तो यहां का औसत खर्च 56,343 रुपये आता है, जिसमें से 50,508 रुपये जेब से लगाना पड़ता है.
सर्वे में एक और हैरान करने वाला आंकड़ा सामने आया है और वह यह कि सरकारी अस्पताल की तुलना में निजी अस्पताल में डॉक्टर की फीस कई गुना ज्यादा है. इसे ऐसे समझ लीजिए कि अगर आप शहर में रहते हैं तो किसी निजी अस्पताल में भर्ती हो गए, तो यहां आपका जितना बिल बनेगा, उसमें से लगभग 14% तो डॉक्टर या सर्जन की फीस ही होगी.
गांव में सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 7,330 रुपये का खर्च आता है, जिसमें से 363 रुपये डॉक्टर या सर्जन की फीस होती है. वहीं, निजी अस्पताल में भर्ती होने पर 49,734 रुपये का खर्च आता है और इसमें से 7,580 रुपये तो सिर्फ डॉक्टर या सर्जन की फीस का ही खर्चा होता है. मतलब गांवों में सरकारी अस्पताल की तुलना में निजी अस्पताल के डॉक्टर की फीस 20 गुना ज्यादा है.

इसी तरह, शहर में सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर 6,413 रुपये का खर्च आता है. इसमें से 246 रुपये डॉक्टर या सर्जन की फीस में जाता है. जबकि, निजी अस्पताल में भर्ती होने पर कुल 66,955 रुपये के खर्च में 9,130 रुपये डॉक्टर या सर्जन की फीस होती है. शहरों में निजी अस्पताल के डॉक्टर या सर्जन की फीस सरकारी अस्पताल की तुलना में 37 गुना ज्यादा है.
कुल मिलाकर सर्वे से पता चलता है कि सरकारी अस्पताल की तुलना में निजी अस्पताल में इलाज करवाना काफी महंगा है. यह भी पता चलता है कि हेल्थ इंश्योरेंस होने के बावजूद मेडिकल बिल जेब से ही भरना पड़ता है.
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