हमारी सुबह पापा के गुड मॉर्निंग मैसेज पढ़ने से ही होती थी। उस दिन संदेश नहीं आया तो हमें खटका। हम कुछ सोच पाते, इससे पहले सेना के एक सीनियर अधिकारी का फोन आया और उन्होंने हमारी जिंदगी की सबसे मनहूस खबर सुनाई। उन्होंने बताया कि हमारे पिताजी पाकिस्तान के साथ चल रहे संघर्ष में शहीद हो गए हैं। यह कहानी है, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पंजाब सीमा पर शहीद हुए सूबेदार मेजर पवन कुमार की। वह बीते साल मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद हुए थे, लेकिन अब उनके नाम को दिल्ली के राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में भी शामिल किया गया है
वह पाकिस्तानी की गोलीबारी में शहीद हुए थे। 50 साल के सूबेदार मेजर पवन कुमार जरियाल बीते साल 31 अगस्त को ही रिटायर होने वाले थे। ऐसे में उन्होंने आखिरी पोस्टिंग अपने घर के पास ही पंजाब में ली थी और तीन महीने बाद उनकी वापसी की घर पर तैयारियां हो रही थीं। मेजर पवन कुमार के पिता भी सेना में रहे थे। उनके पिता गरज सिंह जरियाल ने कहा कि वह अगले तीन महीने में रिटायर हो जाते और उनके वेलकम की तैयारियां थीं। किसे पता था कि अब वह नहीं लौटेंगे और तिरंगे में लिपटा उनका शव ही घर लौटेगा.
पवन कुमार के पिता गरज सिंह जरियाल का कहना है कि तीन महीने बाद उनका बेटा पास में होता. वो 32 साल सेना में रहा था. कुछ महीनों की तो बात थी, हम सब बेहद खुश थे. लेकिन किसी ने क्या सोचा ता कि वो तिरंगे में लिपटा हुआ घर लौटेगा. भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव भड़कने के बाद सिर्फ एक बार ही मेरी उससे बात हो पाई थी. उसने बताया था कि वो सब बंकर में छिपे हैं.
सेना से रिटायर्ड हवलदार गरज सिंह ये बताते हुए अपने आंसू नहीं रोक सके. पवन कुमार के मां-बाप के अलावा पत्नी सुषमा देवी और दो बच्चे हैं. बेटा अभिषेक 22 साल और बेटी अनामिका 21 साल की है. अभिषेक इग्नू स्टडी सेंटर से धर्मशाला में पढ़ाई कर रहा है. अभिषेक ने कहा कि पिता के रोजाना मैसेज से हम खुश होते थे. उस दिन संदेश आया कि उनके पिता को सिर में गहरी चोट लगी है. फिर दूसरी कॉल आई की वो शहीद हो गए हैं.
'त्याग चक्र' पर उन छह जवानों के नाम लिखे हैं जिन्होंने 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अपनी जान गंवाई थी. इनमें भारतीय सेना के पांच सैनिक और भारतीय वायु सेना का एक एयर वॉरियर शामिल हैं. इनमें वीर चक्र से सम्मानित राइफलमैन सुनील कुमार और वायु सेना मेडल पाने वाले सार्जेंट सुरेंद्र कुमार भी शामिल हैं; दोनों को उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत सम्मानित किया गया था.
'ऑपरेशन सिंदूर' पिछले साल मई में पहलगाम में हुए उस घातक आतंकी हमले के जवाब में शुरू किया गया था, जिसमें 26 आम नागरिकों की जान चली गई थी.भारतीय सशस्त्र बलों ने सीमा पार आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए, लेकिन इस ऑपरेशन में इन छह बहादुर जवानों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी.
अब उनके नाम उन हजारों अन्य सैनिकों के नामों के साथ दर्ज हैं जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया. उनके परिवारों के लिए, यह नाम लिखा होना सिर्फ़ एक सम्मान की बात नहीं है। यह एक ऐसी स्थायी याद है जो बताती है कि देश ने उनके अपनों को भुलाया नहीं है
नेशनल वॉर मेमोरियल में आने वाला हर व्यक्ति अब इन नामों के पास से गुजरेगा; हर नाम साहस, कर्तव्य और बलिदान की एक कहानी बयां करता है.
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