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This Article is From Aug 07, 2020

बासमती चावल की वजह से मध्यप्रदेश और पंजाब के मुख्यमंत्रियों में ठनी

बासमती चावल की वजह से मध्यप्रदेश और पंजाब के मुख्यमंत्रियों में ठन गई है. मामला प्रधानमंत्री दफ्तर तक पहुंच गया है. 'कड़कनाथ' मुर्गे के बाद मध्यप्रदेश ने बासमती चावल के जीआई टैग के लिए फिर अपना दावा ठोका है.

बासमती चावल की वजह से मध्यप्रदेश और पंजाब के मुख्यमंत्रियों में ठनी
बासमती चावल के जीआई टैग का मामला PMO पहुंचा
नई दिल्ली:

बासमती चावल की वजह से मध्यप्रदेश और पंजाब के मुख्यमंत्रियों में ठन गई है. मामला प्रधानमंत्री दफ्तर तक पहुंच गया है. 'कड़कनाथ' मुर्गे के बाद मध्यप्रदेश ने बासमती चावल के जीआई टैग के लिए फिर अपना दावा ठोका है. जवाब में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री को पत्र‍ लिखकर कहा है कि मध्यप्रदेश बासमती उगाने वाले विशेष क्षेत्र में नहीं आता. ऐसे में उसे बासमती का जीआई टैग देना जीआई टैगिंग के उद्देश्य को ही बर्बाद कर देगा. मध्यप्रदेश में तो 27 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हैं, किसानों की कर्जमाफी, बिजली बिल, यूरिया जैसे मुद्दे तो हैं ही, अब दो राज्यों के बीच चावल युद्ध से भी कांग्रेस-बीजेपी के बीच नई लड़ाई शुरू हो गई है.

गौरतलब है चावल में बासमती का अपना ठाठ है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है तो इसमें बड़ी हिस्सेदारी बासमती की है. पिछले साल भारत ने 70 लाख टन चावल का निर्यात किया. बासमती चावल के उत्पादन और निर्यात में बड़ी हिस्सेदारी देश के 7 उत्तरी राज्यों पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड  दिल्ली, जम्मू-कश्मीर की रही है. मध्यप्रदेश के 13 जिलों में बासमती की खेती होती है, पिछले साल राज्य में 3 लाख टन बासमती की पैदावार हुई. लेकिन राज्य के पास जीआई टैग नहीं है, इसलिये सीहोर के शरबती गेंहू जैसी धाक, चावल के बाजार में नहीं है. भौगोलिक संकेतक यानी जीआई का इस्तेमाल ऐसे उत्पादों के लिये किया जाता है, जिनका एक विशिष्ट भौगोलिक मूल क्षेत्र होता है. इन उत्पादों की विशेषता और प्रतिष्ठा भी इसी मूल क्षेत्र के कारण होती है. ये टैग उत्पाद की गुणवत्ता और विशिष्टता का आश्वासन देता है. साल 2004 में सबसे पहले  'दार्जिलिंग टी' को जीआई टैग मिला, मध्य प्रदेश में झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गा सहित कई उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है.

शिवराज ने अपने तीसरे कार्यकाल में कोशिश की लेकिन रजिस्ट्रार जीआईटी ने दावे को नकार दिया था. सरकार मद्रास हाईकोर्ट गई लेकिन हार गई, अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है. केन्द्र में सरकार बीजेपी की है, कृषिमंत्री मध्यप्रदेश से आते हैं लेकिन बीजेपी सवाल कांग्रेस से पूछ रही है, तो कांग्रेस पलटवार कर रही है. कृषि मंत्री कमल पटेल ने कहा इसका जवाब कमलनाथ दें कि क्या मध्य प्रदेश के किसानों के साथ कांग्रेस नहीं है,  मध्य प्रदेश को बासमाती का जीआई टैग मिले इसके लिये हमने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है निश्चित तौर पर हम मध्य प्रदेश को जीआई टैग दिलाकर रहेंगे माननीय मुख्यमंत्री और हमारी भारत सरकार. वहीं कांग्रेस प्रवक्ता अभय दुबे ने कहा बीजेपी की मध्य प्रदेश में  पंजाब सरकार पर आरोप लगाती है क्या राज्य सरकार पंजाब की ऐडवाइस पर काम करती है. दुर्भाग्यपूर्ण है नाकामियां को छिपाने के लिये कांग्रेस पर आरोप लगा रही है. एक बार मोदी सरकार का विरोध किया होता तो इन 7 सालों में मध्य प्रदेश के चावल उत्पादक किसानों को न्याय मिल चुका होता.
  
वहीं पंजाब का कहना है कि मध्यप्रदेश का नाम एपीडा ( एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्राॅडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी) के बासमती चावल उत्पादक राज्यों की सूची में नहीं है. यहां उगने वाला बासमती ‘ब्रीडर' बीज की पैदाइश है. वहीं शिवराज ने अपने खत में कहा कि राज्य के 13 जिलों में बासमती चावल 1908 से पैदा किया जा रहा है. सिंधिया स्टेट ( ग्वालियर ) के रिकॉर्ड में लिखा है कि 1944 में प्रदेश के किसानों को बासमती बीज की आपूर्ति की गई थी. हैदराबाद के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ राइस रिसर्च की रिपोर्ट में दर्ज है कि राज्य में पिछले 25 वर्ष से बासमती चावल का उत्पादन किया जा रहा है.  आपको बता दें कि इस बासमती प्रकरण का आर्थिक-राजनीतिक फायदा यह है कि जीआई टैग मिला तो शिवराज और बीजेपी की साख बढ़ेगी, हमला करने के लिये कांग्रेसी राज्य है. वहीं पंजाब को डर बादशाहत खत्म होने और आर्थिक नुकसान का है.
 

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