- निशिकांत दुबे ने सरकार से मांग की है कि ईसाई, इस्लाम धर्म अपनाने वाले आदिवासियों का एसटी दर्जा समाप्त किया जाए
- उन्होंने लोकसभा में कहा कि झारखंड में परिसीमन कराकर अनुसूचित जाति और जनजाति की आरक्षित सीटों का पुनर्गठन हो
- निशिकांत दुबे ने लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान यह विषय उठाया झारखंड में परिसीमन की मांग की
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से आग्रह किया कि ईसाई और इस्लाम धर्म स्वीकार करने वाले आदिवासियों का अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा खत्म किया जाए. उन्होंने लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान यह विषय उठाया और कहा कि यह सुनिश्चित करने के बाद झारखंड में परिसीमन कराया जाए. दुबे ने उच्चतम न्यायालय के एक हालिया आदेश का हवाला भी दिया कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता.
जो लोग मुस्लिम और ईसाई बनते हैं तो उनका
उन्होंने कहा, ‘‘झारखंड में 2001 के बाद भी परिसीमन नहीं हुआ, उसका कारण यह था कि जनसंख्या के असंतुलन के कारण अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति की सीटें कम हो रही थीं. आगे राज्य में जब परिसीमन होगा तो इन वर्गों के लिए आरक्षित सीटें कम हो जाएंगी.'' उन्होंने कहा, ‘‘सरकार से मांग है कि जो लोग मुस्लिम और ईसाई बनते हैं तो उनका आदिवासी का दर्जा खत्म किया जाए. इसके बाद झारखंड में परिसीमन करवाइए.''
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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन और अनुसूचित जाति (SC) तथा अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे को लेकर बेहद ही अहम टिप्पणी की है. अदालत ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के बाद किसी व्यक्ति का SC दर्जा समाप्त हो जाता है, लेकिन ST के मामले में केवल धर्म परिवर्तन को ही अंतिम आधार नहीं माना जा सकता.
SC का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म तक सीमित
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वालों के अलावा किसी अन्य धर्म के व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो जाता है, तो वह SC के रूप में मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता.
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ST के मामले में अलग दृष्टिकोण
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजाति (ST) के मामले में केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर सदस्यता खत्म नहीं मानी जा सकती. इसके लिए यह देखा जाना जरूरी है कि व्यक्ति अब भी जनजातीय पहचान, परंपराओं और समुदाय से जुड़ा हुआ है या नहीं.
(भाषा इनपुट्स के साथ)
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