- केंद्र सरकार लोकसभा और विधानसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन बिल पर विचार कर रही है.
- प्रस्तावित फॉर्मूले के तहत लोकसभा और विधानसभा की सीटों में समानुपातिक रूप से 50 प्रतिशत वृद्धि हो सकती है.
- इसके तहत दक्षिण के राज्यों की जनसंख्या आधारित सीटों में वृद्धि के खिलाफ शिकायतों को दूर करने का प्रयास है
केंद्र सरकार लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों की संख्या पर लगी रोक हटाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है. सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से एक संविधान संशोधन बिल लाने पर मंथन किया जा रहा है. 2002 में सीटों की संख्या बढ़ाने पर लगी रोक को 2026 तक बढ़ा दिया गया था. सूत्रों के मुताबिक, सरकार संविधान संशोधन बिल में जिस फॉर्मूले पर विचार कर रही है, उसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या समानुपातिक रूप से बढ़ाई जा सकती है. इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या में 50 फीसदी की बढ़ोतरी की जा सकती है.
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटों की वर्तमान संख्या 80 से बढ़कर 120 और बिहार में सीटों की संख्या 40 से बढ़कर 60 हो जाएगी. इसी तरह सुदूर दक्षिण के राज्य तमिलनाडु में सीटें 39 से बढ़कर 58 हो जाएगी.
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नए फॉर्मूले में जनसंख्या के आंकड़े नहीं होंगे आधार
इस फॉर्मूले के तहत सभी राज्यों की विधानसभा की सीटों में भी 50 फीसदी की बढ़ोतरी होगी. इसका मतलब ये हुआ कि सीटों की संख्या बढ़ाने में जनसंख्या के आंकड़ों को आधार नहीं बनाया जाएगा और 50 फीसदी का एक समरूप फॉर्मूला लगाया जाएगा.
हालांकि आजादी के बाद से आज तक जब भी सीटों की संख्या में इजाफा किया गया है, उसका आधार जनसंख्या को बनाया गया है. जनसंख्या को आधार बनाकर सीटों की संख्या बढ़ाने का सिलसिला 1971 की जनगणना तक चला लेकिन उसके बाद पहली बार 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा और विधानसभाओं सीटों की संख्या बढ़ाने पर रोक लगाई गई थी. इस रोक को 2002 में 84वें संविधान संशोधन को लाकर 2026 तक बढ़ा दिया गया था.
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पुराने फॉर्मूले से दक्षिण के राज्यों को नुकसान
दोनों बार तर्क यही दिया गया कि अगर जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लोकसभा की सीटें बढ़ाई गईं तो दक्षिण भारत के राज्य नुकसान में रहेंगे क्योंकि उन्होंने उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तरी और पूर्वी राज्यों की तुलना में जनसंख्या नियंत्रण पर ज्यादा बेहतर काम किया है और जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी की है. हालांकि पिछले 50 सालों में जनसंख्या करीब तीन गुना बढ़ चुकी है, इसलिए अब सीटों की संख्या बढ़ाने की जरूरत महसूस की गई है.
दक्षिण की पार्टियां लंबे समय से कर रही हैं विरोध
ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि क्या दक्षिणी राज्यों खासकर अपनी सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी के दबाव में सरकार ने सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए जनसंख्या को आधार नहीं बनाया है? तेलुगु देशम और डीएमके जैसी दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियों सालों से इस बात का विरोध करती आई हैं कि सीटों की संख्या बढ़ाने का आधार जनसंख्या को बनाया जाए.
एनडीए की सहयोगी तेलुगु देशम की ओर से तो खुद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू इस बारे में अपनी राय केंद्र सरकार को भी दे चुके हैं. ऐसे में सीटों की संख्या को समान रूप से बढ़ाने के प्रस्ताव से केंद्र सरकार ने दक्षिणी भारत के राज्यों की एक बड़ी शिकायत दूर करने की कोशिश की है.
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