आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जितना एडवांस्ड है, ऐसे में इस बात की चिंता भी अक्सर होती है कि इसका भविष्य कैसा होगा? NDTV World Summit में इसी पर फ्यूचरिस्टिक माइक वॉल्श ने बात की. उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में AI न तो किसी की नौकरी खाएगा और न ही इंसानों की जगह ले पाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि हो सकता है कि कई युवा भारतीय अपनी पहली नौकरी पाने से पहले ही अपना पहला 'डिजिटल एम्प्लॉई' हायर कर लें.
माइक वॉल्श ने कहा, 'आज हम AI के बारे में जिस तरह से बात करते हैं, वह अक्सर कमी की सोच से उपजी होती है. हम पूछते हैं कि क्या हमारे डेटा सेंटरों को चलाने के लिए पर्याप्त पानी और बिजली होगी? हम सोचते हैं कि क्या AI की वजह से अपनी नौकरी खोने वालों के लिए काफी नए काम होंगे? हम यह भी सवाल उठाते हैं कि क्या हमारे संस्थान AI से आने वाले बदलावों के हिसाब से खुद को काफी तेजी से ढाल पाएंगे?'
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उन्होंने कहा कि हम Scarcity (कमी) की दुनिया से निकलकर Abundance (बहुतायत) की दुनिया में जा रहे हैं, जहां ज्ञान, एक्सपर्टीज और इंटेलिजेंस सबके लिए उपलब्ध होगी.
वॉल्श ने कहा कि लोग AI को सिर्फ चैटबॉट समझकर कम आंक रहे हैं. असली कहानी है 'डिजिटल लेबर' की - यानी ऐसा AI जो सिर्फ जवाब नहीं देता, बल्कि एक तय सीमा में जजमेंट लेकर काम पूरा करता है.

तीन बड़े बदलाव जो बदल देंगे दुनिया
- AI बनेगा नया इंटरफेस: उन्होंने चीन के KFC का उदाहरण दिया. शंघाई के KFC में मैनेजर कान में ईयरबड लगाए शांत खड़ा रहता है. AI उसे CCTV से बता रही होती है कि किचन में स्टाफ कम है, फ्रंट से किचन में भेजो, चिकन विंग्स का ऑर्डर करना है क्या? बस मैनेजर कहता है- Confirmed. इसी तरह दवा कंपनी Sanofi रोज 10 लाख मरीजों को AI नर्स से कॉल कर उनका हाल पूछ रही है, जो इंसानों से मुमकिन ही नहीं था. भारत में Portea कंपनी को नर्स नहीं मिल रही थीं, तो AI एजेंट ने 10,000 लोगों को कॉल करके स्टाफ जॉइन कराया.
- AI अब असली दुनिया में उतर रहा है: Waymo जैसी Self-Driving कार असल में पहियों वाला रोबोट है. Walsh ने मजाक में कहा- 'मुझे AGI पर भरोसा है, लेकिन दिल्ली के ट्रैफिक में Self-Driving कार चला दी तो समझूंगा मशीन में चेतना आ गई.' उन्होंने बताया कि SoftBank सैकड़ों अरब डॉलर जुटाकर अमेरिका की सबसे बड़ी सिक्योरिटी कंपनी Allied Universal को खरीदने की तैयारी में है, ताकि रोबोट से सिक्योरिटी की जा सके. Unitree का नया सिक्योरिटी रोबोट अब क्यूट नहीं रहा. जापान के 7-Eleven में पहले जापान से ही टेली-ऑपरेटेड रोबोट चल रहे थे, अब वो फिलीपींस के Ghost Operation Center से चल रहे हैं, जहां कभी कॉल सेंटर में काम करने वाले लोग अब रोबोट ट्रेन कर रहे हैं.
- इंसानों से ज्यादा होंगे AI एजेंट: वॉल्श ने कहा कि भारत UPI के लिए यूनिफाइड एजेंट प्रोटोकॉल बना रहा है, जिससे AI एजेंट बिना हर बार परमिशन के छोटे पेमेंट कर पाएंगे. ये पूरी इकोनॉमी बदल देगा. नोबेल विजेता हर्ब सिमोन की थ्योरी 'बाउंडेड रेशनलिटी' का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हम बेस्ट डील नहीं ढूंढते क्योंकि हमारे पास टाइम नहीं. जब सबके पास AI एजेंट की फौज होगी, तो वो सबका बिजली बिल, सब्सक्रिप्शन, सब कुछ री-नेगोशिएट कर देंगे.
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डिजिटल लेबर आया, तो आम लोगों का क्या होगा?
NDTV के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल ने वॉल्श से पूछा कि डिजिटल लेबर का यह मॉडल आया तो इससे लाखों-करोड़ों युवा बेरोजगार हो सकते हैं. कंपनियों को तो फायदा होगा, लेकिन आम जनता और बाकी लोगों का क्या होगा?
इसका जवाब देते हुए माइक वॉल्श ने कहा, 'भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) और बीपीओ में बैठे लोगों से सिर्फ इनवॉइस चेक करवाना या घंटों के हिसाब से लेबर बेचना इंसानी दिमाग की क्षमता का सरासर अंडर-यूटिलाइजेशन है. भारत को अब 'ह्यूमन लेबर आवर्स' बेचने के बजाय 'आउटकम' और 'एजेंट ऑपरेशन सेंटर्स' चलाने पर ध्यान देना चाहिए.'
नौकरियों पर AI के खतरे पर उन्होंने कहा कि 'हम जॉब को टास्क का बंडल समझकर डरते हैं. लेकिन जॉब टास्क नहीं, जिम्मेदारी है. स्ट्रक्चरल इंजीनियर का 90% काम कंप्यूटर बेहतर करेगा, पुल टिका है या नहीं, कंप्यूटर बता देगा. पर साइन करने वाला हमेशा इंसान ही रहेगा.'
उन्होंने चेतावनी दी कि सबसे बड़ा खतरा एंट्री-लेवल जॉब्स खत्म होने का है, खासकर भारत के IT सेक्टर में. इससे शॉर्ट टर्म में पैसे बचेंगे, पर अगली पीढ़ी के लीडर्स की ट्रेनिंग ग्राउंड ही खत्म हो जाएगी.

इंसानों की जगह क्यों नहीं लेगा AI?
सेशन के दौरान जब उनसे पूछा गया कि AI एजेंट आ जाएंगे, हर जगह AI होगा तो फिर इंसानों की जरूरत क्या होगी? इस पर जवाब देते हुए माइक वॉल्श ने बताया कि AI कभी भी इंसानों की जगह नहीं ले सकता.
उन्होंने इसे उदाहरण देते हुए समझाते हुए कहा, 'मान लीजिए कि कोई AI मॉडल मेरी किसी गंभीर बीमारी का सही पता लगा लेता है तो भी मैं चाहूंगा कि कोई डॉक्टर मुझसे इस बारे में बात करे. भले ही AI मॉडल यह काम कर सकता है, फिर भी मैं इसके लिए किसी इंसान को ही चुनूंगा.'
उम्होंने कहा कि कई कामों में इंसानों को चुनने का सबसे अहम कारण उनकी सोचने-समझने की क्षमता नहीं है, बल्कि यह है कि वे सामाजिक मूल्यों को मानवीय निर्णय में बदलने की बेहतर समझ रखते हैं.
उन्होंने कहा, 'AI मॉडल को आप सब कुछ सिखा तो सकते हैं लेकिन उन्होंने कभी असल दुनिया में जिया नहीं है. उनका दांव पर कुछ नहीं लगा होता. उनके फैसलों का उन पर कोई असर नहीं पड़ता. इसलिए मुझे नहीं लगता कि AI एजेंट अचानक कोई 'डिजिटल देवता' बन जाएंगे. मुझे लगता है कि यह बस कुछ लोगों की कोरी कल्पना है.'
उन्होंने कहा कि 'मुझे लगता है कि अहम फैसलों के मामले में इंसानों को अधिकार न देना एक ऐसा खतरा है, जिस पर आपको गंभीरता से सोचना चाहिए. इतना कि शायद आपकी रातों की नींद ही उड़ जाए.'
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