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91 गवाह, CCTV, मोबाइल लोकेशन और FSL रिपोर्ट; ताहिर हुसैन के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने कैसे बनाया मजबूत केस

अंकित शर्मा हत्याकांड में ट्रायल कोर्ट ने ताहिर हुसैन समेत 5 आरोपियों को दोषी ठहराया. जानिए कैसे दिल्ली पुलिस ने CCTV, मोबाइल लोकेशन, FSL रिपोर्ट, पोस्टमार्टम और 91 गवाहों के जरिए मजबूत केस तैयार किया.

91 गवाह, CCTV, मोबाइल लोकेशन और FSL रिपोर्ट; ताहिर हुसैन के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने कैसे बनाया मजबूत केस
91 गवाह, CCTV और मोबाइल वीडियो: ऐसे तैयार हुआ ताहिर हुसैन के खिलाफ केस, 6 साल बाद कैसे मिली सजा
दिल्ली:

फरवरी 2020. उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की वह तारीख, जिसने देश को झकझोर कर रख दिया. कई दिनों तक चली हिंसा में 53 लोगों की जान गई, सैकड़ों लोग घायल हुए और करोड़ों रुपये की संपत्ति जलकर राख हो गई. इन्हीं दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या का मामला पूरे देश में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. 26 फरवरी 2020 को चांदबाग पुलिया के पास खजूरी नाले से उनका शव बरामद हुआ था. पोस्टमार्टम में सामने आया कि उनके शरीर पर 51 गंभीर चोटें थीं. इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया.

छह साल बाद कोर्ट ने ठहराया दोषी

करीब छह साल तक चली सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने तत्कालीन आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन, नाजिम, कासिम, जावेद और अनस को हत्या और दंगों से जुड़े गंभीर अपराधों में दोषी ठहराया. अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि अभियोजन पक्ष ने आरोपियों के खिलाफ ऐसा मजबूत और विश्वसनीय केस पेश किया, जिसने उनके अपराध को "संदेह से परे" साबित कर दिया. लेकिन आखिर दिल्ली पुलिस ने ऐसा कौन-सा सबूत जुटाया, जिसने इतने लंबे ट्रायल के बाद भी अदालत में अपना दम बनाए रखा? NDTV Exclusive में पढ़िए जांच की पूरी कहानी.

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जांच की शुरुआत... जब नाले से मिला अंकित शर्मा का शव

25 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा चरम पर थी. चांदबाग, भजनपुरा, खजूरी खास, दयालपुर और आसपास के इलाकों में आगजनी, पथराव और हिंसा लगातार जारी थी. इसी दौरान आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा लापता हो गए. अगले दिन यानी 26 फरवरी को चांदबाग पुलिया के पास स्थित खजूरी नाले से उनका शव बरामद हुआ. पुलिस, गोताखोरों और स्थानीय लोगों की मौजूदगी में शव को बाहर निकाला गया. शुरुआती जांच में ही साफ हो गया कि यह सामान्य मौत नहीं बल्कि बेहद क्रूर हत्या का मामला है. यहीं से दिल्ली पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने हत्या की विस्तृत जांच शुरू की.

क्या थी सबसे बड़ी चुनौती?

जांच अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि पूरा इलाका दंगों की आग में जल चुका था. कई जगह आगजनी हुई थी, भारी पत्थरबाजी हुई थी और हजारों लोग सड़कों पर थे. कई सीसीटीवी कैमरे क्षतिग्रस्त हो चुके थे, जबकि कुछ कैमरों का रुख बदल दिया गया था. ऐसे माहौल में किसी एक व्यक्ति की भूमिका तय करना आसान नहीं था. इसलिए जांच एजेंसी ने शुरुआत से ही तय किया कि मामला केवल गवाहों के बयानों पर नहीं बनाया जाएगा, बल्कि हर तथ्य को वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों से जोड़ा जाएगा.

वैज्ञानिक जांच पर रहा पूरा फोकस

दिल्ली पुलिस ने जांच को पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर आगे बढ़ाया. जांच टीम ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और हर छोटे-बड़े साक्ष्य को सुरक्षित किया. जांच के दौरान पुलिस ने ये सब किया.

  • घटनास्थल का वैज्ञानिक निरीक्षण कराया.
  • आसपास के सभी उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज जुटाए.
  • मोबाइल फोन और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) का विश्लेषण किया.
  • आरोपियों की लोकेशन की जांच की.
  • पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मेडिकल साक्ष्यों का अध्ययन किया.
  • एफएसएल (फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी) की मदद ली.
  • इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित किए.
  • सार्वजनिक और पुलिस गवाहों के बयान दर्ज किए.
  • घटनास्थल से बरामद सभी वस्तुओं की वैज्ञानिक जांच कराई.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जांच केवल आरोपों पर आधारित नहीं थी, बल्कि हर दावे को स्वतंत्र और वैज्ञानिक साक्ष्यों से पुष्ट किया गया.

सीसीटीवी फुटेज जुटाना आसान नहीं था

जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल और उसके आसपास लगे कई सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग जुटाई. लेकिन जांच में एक चौंकाने वाली बात सामने आई. पुलिस के मुताबिक, घटना के समय कई कैमरों का रुख नीचे कर दिया गया था या उनके लेंस ढक दिए गए थे, ताकि घटनाएं रिकॉर्ड न हो सकें. इससे साफ था कि कुछ लोगों ने पहले से ही अपनी गतिविधियां कैमरे में कैद होने से रोकने की कोशिश की थी. इसके बावजूद जांच एजेंसी ने उपलब्ध फुटेज को एकत्र किया और उसका फ्रेम-दर-फ्रेम विश्लेषण कराया.

मोबाइल में रिकॉर्ड वीडियो बना अहम सबूत

जांच के दौरान पुलिस को एक बेहद महत्वपूर्ण वीडियो मिला. यह वीडियो किसी सीसीटीवी कैमरे का नहीं था, बल्कि एक प्रत्यक्षदर्शी ने अपने मोबाइल फोन से रिकॉर्ड किया था. इस वीडियो में तीन लोग चांदबाग पुलिया के पास खजूरी नाले में एक शव फेंकते हुए दिखाई दे रहे थे. पुलिस ने इस वीडियो को कानूनी प्रक्रिया के तहत जब्त किया. इसके बाद इसकी फोरेंसिक जांच कराई गई और अदालत में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में पेश किया गया.

ट्रायल कोर्ट ने इसे पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सबूत माना

अदालत के अनुसार, इसी वीडियो की मदद से जांच एजेंसी हत्या के बाद शव को ठिकाने लगाने की पूरी कहानी अदालत के सामने रखने में सफल रही. इस वीडियो ने प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों की भी पुष्टि की.

डिजिटल जांच ने भी खोले कई राज

इस मामले में केवल सीसीटीवी फुटेज ही नहीं, बल्कि डिजिटल साक्ष्य भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए. जांच अधिकारियों ने आरोपियों के मोबाइल फोन, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), मोबाइल टावर लोकेशन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का विस्तृत विश्लेषण कराया. इन तकनीकी साक्ष्यों के जरिए यह पता लगाया गया कि घटना के समय आरोपी किस इलाके में मौजूद थे और उनकी गतिविधियां क्या थीं. अदालत ने कहा कि सभी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड कानून के अनुसार एकत्र किए गए थे. इसलिए उनकी प्रमाणिकता पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता.

केवल एक गवाह पर नहीं बनाया गया केस

अदालत ने अपने फैसले में विशेष रूप से कहा कि पूरी जांच किसी एक प्रत्यक्षदर्शी पर आधारित नहीं थी. आरोपियों की पहचान और उनकी भूमिका साबित करने के लिए जांच एजेंसी ने कई स्वतंत्र गवाहों, डिजिटल रिकॉर्ड, मेडिकल रिपोर्ट, फोरेंसिक रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों का सहारा लिया. यही वजह रही कि अभियोजन पक्ष अदालत के सामने घटनाओं की पूरी श्रृंखला स्थापित करने में सफल रहा.

फोटो पहचान भी बनी जांच का हिस्सा

जांच के दौरान कई गवाहों को आरोपियों की तस्वीरें दिखाकर उनकी पहचान कराई गई. बचाव पक्ष ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि फोटो पहचान और टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) केवल जांच में मदद करने वाले साधन हैं. सबसे महत्वपूर्ण सबूत अदालत में गवाह द्वारा की गई पहचान होती है. इस मामले में कई गवाहों ने अदालत में आरोपियों की पहचान की, जिसे ट्रायल कोर्ट ने महत्वपूर्ण माना.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खोली हत्या की भयावह तस्वीर

अंकित शर्मा के शव का पोस्टमार्टम कराया गया. रिपोर्ट में सामने आया कि उनके शरीर पर 51 गंभीर चोटें थीं. इनमें धारदार हथियारों और भारी वस्तुओं से पहुंचाई गई चोटें शामिल थीं.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साफ संकेत दिया कि अंकित शर्मा पर बेहद क्रूर तरीके से हमला किया गया था. जांच एजेंसी ने अदालत को बताया कि यह सामान्य मारपीट का मामला नहीं बल्कि सुनियोजित और निर्मम हत्या थी.

जांच में यह भी सामने आया कि शव के कुछ हिस्सों को जलाने की कोशिश की गई थी. पुलिस के अनुसार, ऐसा मृतक की पहचान छिपाने और जांच को गुमराह करने के उद्देश्य से किया गया.अदालत ने भी इस तथ्य को जांच की महत्वपूर्ण कड़ी माना.

घटनास्थल से जुटाए गए वैज्ञानिक सबूत

जांच टीम ने खजूरी नाले और उसके आसपास के पूरे इलाके का वैज्ञानिक तरीके से निरीक्षण किया. फोरेंसिक विशेषज्ञों की मौजूदगी में हर उस वस्तु को सुरक्षित किया गया, जो घटना से जुड़ी हो सकती थी.

जांच के दौरान नाले की दीवार से खून के नमूने लिए गए, मिट्टी के नमूने एकत्र किए गए और अन्य जैविक एवं भौतिक साक्ष्यों को सील कर एफएसएल भेजा गया. इन सभी नमूनों की वैज्ञानिक जांच कराई गई और उनकी रिपोर्ट अदालत में पेश की गई. अदालत ने माना कि मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्यों ने प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों की पुष्टि की और अभियोजन पक्ष के मामले को मजबूत बनाया.

अंकित शर्मा हत्याकांड की जांच में दिल्ली पुलिस ने सिर्फ घटनास्थल से मिले सबूतों या गवाहों के बयानों पर भरोसा नहीं किया. जांच आगे बढ़ने के साथ पुलिस ने फोरेंसिक रिपोर्ट, बरामद हथियारों, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन, गवाहों की गवाही और दस्तावेजी साक्ष्यों को एक-दूसरे से जोड़कर पूरी घटनाक्रम की ऐसी श्रृंखला तैयार की, जिसे अदालत ने भी विश्वसनीय माना. ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष ने हर महत्वपूर्ण तथ्य को कई स्वतंत्र साक्ष्यों से साबित किया है.

हत्या में इस्तेमाल हथियारों की बरामदगी

जांच के दौरान पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल किए गए हथियार भी बरामद किए. इन हथियारों को फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) भेजा गया. बाद में फोरेंसिक विभाग की तरफ से कहा गया कि अंकित शर्मा के शरीर पर पोस्टमार्टम में जो चोटें मिली थीं, वे बरामद हथियारों से पहुंचाई जा सकती थीं.
अदालत ने इस वैज्ञानिक राय को महत्वपूर्ण माना. कोर्ट ने कहा कि इससे बरामद हथियारों और हत्या के बीच संबंध स्थापित होता है. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि केवल हथियारों की बरामदगी पर आधारित नहीं थी, बल्कि यह कई साक्ष्यों की संयुक्त कड़ी का हिस्सा थी.

ताहिर हुसैन के घर से क्या मिला?

जांच के दौरान पुलिस ने तत्कालीन पार्षद ताहिर हुसैन के मकान की तलाशी ली. जांच एजेंसी के मुताबिक मकान की छत से बड़ी मात्रा में दंगों में इस्तेमाल होने वाला सामान बरामद हुआ.

इनमें बड़ी संख्या में पत्थर, ईंटें, पेट्रोल से भरी कांच की बोतलें, गुलेल (कैटापुल्ट) और अन्य दंगाई सामग्री शामिल थी. इन सभी वस्तुओं को एफएसएल भेजा गया, जहां उनकी वैज्ञानिक जांच कराई गई.

अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि गवाहों के बयान, घटनास्थल के साइट प्लान और बरामद सामग्री एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं. अदालत ने भी माना कि ताहिर हुसैन का मकान हिंसक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ था.

91 गवाहों ने मजबूत किया अभियोजन पक्ष का केस

इस मामले में कुल 91 गवाहों की गवाही दर्ज हुई. इनमें प्रत्यक्षदर्शी, स्थानीय निवासी, पुलिस अधिकारी, जांच अधिकारी, डॉक्टर, पोस्टमार्टम करने वाले विशेषज्ञ, एफएसएल वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल थे.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इन गवाहों की गवाही एक-दूसरे का समर्थन करती है और उनमें ऐसा कोई विरोधाभास नहीं है, जिससे पूरे घटनाक्रम पर संदेह पैदा हो.

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रमुख गवाहों और शिकायतकर्ता की सुरक्षा भी सुनिश्चित की गई, ताकि वे बिना किसी दबाव के अदालत में अपनी बात रख सकें.

अदालत ने खुद किया घटनास्थल का निरीक्षण

इस मुकदमे की एक खास बात यह भी रही कि 11 मई 2026 को ट्रायल कोर्ट ने स्वयं चांदबाग पुलिया और आसपास के घटनास्थल का निरीक्षण किया. निरीक्षण के दौरान अदालत ने पुलिस द्वारा तैयार किए गए साइट प्लान का वास्तविक घटनास्थल से मिलान किया. कोर्ट ने पाया कि जांच एजेंसी द्वारा तैयार किया गया साइट प्लान सही था और घटनास्थल की वास्तविक स्थिति को दर्शाता था. इस निरीक्षण ने भी अदालत के सामने जांच की विश्वसनीयता को मजबूत किया.

जांच से जुड़े हर दस्तावेज को अदालत में साबित किया गया

पुलिस ने जांच के दौरान तैयार किए गए सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज अदालत में पेश किए. इनमें साइट प्लान, जब्ती मेमो, गिरफ्तारी मेमो, खुलासा बयान, घटनास्थल से जुड़े रिकॉर्ड, फोरेंसिक रिपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड शामिल थे. अदालत ने माना कि इन सभी दस्तावेजों को कानूनी प्रक्रिया के तहत तैयार किया गया और मुकदमे के दौरान विधिवत साबित भी किया गया.

बचाव पक्ष की दलीलें क्यों नहीं चलीं?

सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से कई कानूनी और तथ्यात्मक आपत्तियां उठाई गईं. एफआईआर दर्ज होने में कथित देरी, जांच की प्रक्रिया, गवाहों की विश्वसनीयता और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर सवाल उठाए गए. लेकिन अभियोजन पक्ष ने हर आपत्ति का जवाब दस्तावेजी, मेडिकल, फोरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के जरिए दिया. अदालत ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, एफएसएल रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल रिकॉर्ड और घटनास्थल से मिले साक्ष्य एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं. इसलिए बचाव पक्ष की दलीलें अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं कर सकीं.

ताहिर हुसैन के खिलाफ अदालत ने क्या माना?

ट्रायल कोर्ट ने कहा कि कई स्वतंत्र गवाहों ने यह बताया कि 25 फरवरी 2020 को चांदबाग पुलिया और उसके आसपास मौजूद हिंसक भीड़ में ताहिर हुसैन सक्रिय भूमिका निभा रहा था. गवाहों के अनुसार वह अपने मकान से लगातार बाहर आ-जा रहा था, भीड़ को उकसा रहा था और भड़काऊ बातें कह रहा था. अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि उसका मकान पत्थर, ईंट और पेट्रोल बम जैसी सामग्री का केंद्र बना हुआ था.

गवाहों की गवाही, बरामद सामग्री और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने ताहिर हुसैन को भारतीय दंड संहिता की धारा 188, 147, 148, 365, 153ए  149 और 302 के तहत दोषी ठहराया.

हालांकि अदालत ने उन्हें धारा 120बी, 505, 109 और 114 के आरोपों से बरी कर दिया.

नाजिम और कासिम के खिलाफ क्या मिला?

अदालत ने कहा कि कई प्रत्यक्षदर्शी गवाहों ने नाजिम और कासिम की पहचान हिंसक भीड़ के सदस्यों के रूप में की. कुछ गवाहों ने दोनों को अंकित शर्मा को पकड़कर घसीटते हुए देखने की बात कही. जांच के दौरान बरामद चाकू और फोरेंसिक विभाग की  राय ने भी अभियोजन पक्ष के मामले को समर्थन दिया. अदालत ने दोनों को हत्या और दंगों से जुड़े गंभीर अपराधों में दोषी ठहराया. हालांकि नाजिम को आर्म्स एक्ट और दोनों को आपराधिक साजिश की धारा 120बी से राहत दी गई.

जावेद और अनस की भूमिका कैसे साबित हुई?

जावेद और अनस के खिलाफ भी कई प्रत्यक्षदर्शी गवाह सामने आए. गवाहों ने अदालत को बताया कि दोनों हिंसक भीड़ का हिस्सा थे और चांदबाग पुलिया के पास हुई हिंसा और हत्या की घटना के दौरान मौके पर मौजूद थे. फोटो पहचान, अदालत में हुई पहचान और अन्य गवाहों की गवाही ने उनकी भूमिका की पुष्टि की. अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ आरोप साबित करने में सफल रहा.

कॉमन ऑब्जेक्ट को अदालत ने क्यों माना अहम

अदालत ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 149 यानी गैरकानूनी जमावड़े के साझा उद्देश्य (Common Object) को महत्वपूर्ण माना. कोर्ट ने कहा कि 25 फरवरी 2020 की शाम चांदबाग पुलिया पर मौजूद हिंसक भीड़ का साझा उद्देश्य हिंसा फैलाना था. इसी साझा उद्देश्य के तहत अंकित शर्मा की हत्या हुई. इसलिए भीड़ का हिस्सा रहे और उसमें सक्रिय भूमिका निभाने वाले आरोपियों पर धारा 149 लागू होती है.

अदालत ने जांच को क्यों माना भरोसेमंद?

अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी ने किसी एक साक्ष्य पर भरोसा नहीं किया. हर महत्वपूर्ण तथ्य को कई स्वतंत्र स्रोतों से पुष्ट किया गया.

जहां प्रत्यक्षदर्शियों ने आरोपियों की मौजूदगी बताई, वहीं मोबाइल लोकेशन ने उनकी मौजूदगी की पुष्टि की. सीसीटीवी और मोबाइल वीडियो ने घटनाक्रम को स्पष्ट किया. पोस्टमार्टम और एफएसएल रिपोर्ट ने हत्या के तरीके और बरामद हथियारों को घटना से जोड़ा.

घटनास्थल से मिले वैज्ञानिक साक्ष्यों और दस्तावेजी रिकॉर्ड ने पूरी कड़ी को मजबूत किया. अदालत ने कहा कि जब इन सभी साक्ष्यों को एक साथ देखा जाता है तो घटनाओं की ऐसी श्रृंखला सामने आती है, जिसमें किसी भी उचित संदेह की गुंजाइश नहीं बचती.

करीब छह साल तक चले ट्रायल के बाद अदालत ने माना कि दिल्ली पुलिस की जांच वैज्ञानिक, निष्पक्ष और पेशेवर तरीके से की गई. जांच एजेंसी ने मौखिक, दस्तावेजी, मेडिकल, फॉरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को जोड़कर अपराध की पूरी श्रृंखला स्थापित की और अभियोजन पक्ष आरोपियों का अपराध "संदेह से परे" साबित करने में सफल रहा. इसी आधार पर अदालत ने मोहम्मद ताहिर हुसैन, नाजिम, कासिम, जावेद और अनस को दोषी ठहराया.

यह फैसला केवल एक हत्या के मामले में दोषसिद्धि भर नहीं है, बल्कि यह भी बताता है कि दंगे जैसे अत्यंत संवेदनशील मामलों में यदि जांच वैज्ञानिक ढंग से की जाए, हर साक्ष्य को कानूनी प्रक्रिया के तहत सुरक्षित रखा जाए और अदालत के सामने तथ्यों की पूरी श्रृंखला पेश की जाए, तो सालों बाद भी न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है. अदालत ने अपने फैसले के जरिए यही संदेश दिया कि कानून के शासन के तहत गंभीर अपराधों को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना ही आपराधिक न्याय प्रणाली की सबसे बड़ी कसौटी है.

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