दिल्ली में फरवरी 2020 के दंगों के दौरान आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच आरोपियों को दोषी करार दिया है. वहीं छह अन्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया. करीब छह साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद यह फैसला आया है, जिसे अंकित शर्मा के परिवार के लिए न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है और उपलब्ध गवाहों व साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि दोषी एक हिंसक और गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा थे.
कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऊपर किए गए पूरे विश्लेषण और चर्चा के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि अभियोजन पक्ष ने अपने आरोपों को पूरी तरह और किसी भी उचित संदेह से परे साबित कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन द्वारा पेश किए गए PW-6, PW-13 और PW-14 के बयानों पर भरोसा किया जा सकता है. इन गवाहों की गवाही की पुष्टि PW-11 और PW-56 ने भी की, जिससे अभियोजन का पक्ष और मजबूत हो गया.
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यह कोई सामान्य भीड़ नहीं थी : कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि इन सभी गवाहों के बयानों और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से यह साबित होता है कि 25 फरवरी 2020 को शाम करीब 5 बजे आरोपी ताहिर हुसैन चांदबाग पुलिया पर मौजूद एक बड़ी भीड़ और गैरकानूनी जमावड़े (अनलॉफुल असेंबली) का हिस्सा था. अदालत के मुताबिक, यह कोई सामान्य भीड़ नहीं थी, बल्कि ऐसी भीड़ थी जिसके सदस्यों के मन में हिंदू समुदाय के प्रति दुश्मनी, वैमनस्य और हिंसक मंशा थी. कोर्ट ने माना कि इस भीड़ का एक साझा उद्देश्य (Common Object) था और वह उद्देश्य था दंगा करना, लूटपाट करना, आगजनी करना और हिंदू समुदाय के लोगों के साथ-साथ उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना.
फैसले में क्या कहा?
फैसले में कहा गया है कि इस गैरकानूनी जमावड़े में शामिल सभी लोगों को इस बात की जानकारी और अंदाजा था कि अगर वे अपने इस साझा उद्देश्य को अंजाम देंगे, तो उसके दौरान किसी व्यक्ति की जान भी जा सकती है और किसी की हत्या भी हो सकती है. यानी भीड़ के सदस्यों को पहले से यह एहसास था कि उनकी हिंसक गतिविधियों का नतीजा मौत तक पहुंच सकता है.
साथ ही, उस भीड़ के सदस्यों को यह भी पता था कि उनकी इन हरकतों के दौरान किसी व्यक्ति की मौत हो सकती है या किसी की हत्या हो सकती है. इसलिए अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष ने यह आरोप संदेह से परे (Beyond All Reasonable Doubt) साबित कर दिया है.
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