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This Article is From Nov 14, 2025

बिहार चुनाव का परिणाम कांग्रेस के लिए कैसे बना बड़ा सबक, पढ़ें इनसाइड स्टोरी

बिहार की जीत एनडीए ही नहीं देश के आम नागरिकों और उनके स्वाभिमान की जीत मानी जा रही है. ये जीत कांग्रेस के लिए उसके झूठ और निजी हमलों के खिलाफ एक सीख मानी जा रही है.

बिहार चुनाव का परिणाम कांग्रेस के लिए कैसे बना बड़ा सबक, पढ़ें इनसाइड स्टोरी
बिहार में कांग्रेस के लिए क्या सबक.
  • बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 202 से अधिक सीटें जीतकर स्पष्ट जनादेश हासिल किया है.
  • बीजेपी ने बिहार में 89 सीटें जीती हैं जबकि कांग्रेस महज 6 सीटों पर सिमट गई है जो उसकी चिंता बढ़ाने वाला है.
  • कांग्रेस की मोदी सरकार पर लगातार तीखी टिप्पणियों और तुष्टिकरण की राजनीति को बिहार चुनाव में जनता ने नकारा.
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बिहार में अबकी बार एनडीए 200 पार... ये सच साबित हुआ है. बिहार के परिणाम चौंकाने वाले हैं. इसे बिहार की जनता का प्यार ही कहा जाएगा जो एनडीए पर जनादेश के रूप में बरसा है. वहीं बीजेपी ने 89 सीटें जीत ली हैं. कांग्रेस का यह प्रदर्शन उसकी चिंता और बढ़ाने वाला है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि उसके तमाम कोशिशों के बाद भी पार्टी बिहार में महज 6 सीटें ही जीत सकी है. कांग्रेस के इस जनादेश को 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार पर टिप्पणी करने की सजा कहा जाए तो गलत नहीं होगा. आपको बता दें कि साल 2024 में बीजेपी को बहुमत से कम, 240 सीटें मिली थीं, जबकि एनडीए ने 293 सीटें जीती थीं.  ये आंकड़ा इतना बड़ा था, कि कांग्रेस इसे पिछले 40 सालों में ही हासिल नहीं कर सकी. कांग्रेस महज 99 सीटें ही जीत पाई थी. फिर भी कांग्रेस ने मोदी सरकार पर टिप्पणी करने का कोई मौका नहीं छोड़ा था.

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कांग्रेस को मिल रही किस बात की सजा?

मोदी सरकार के विकास के मॉडल पर उन्होंने (कांग्रेस) बार-बार हमला बोला. संसद के पटल तक पर सरकार का तीखी टिप्पणियां की गईं. लेकिन जनता ने बीजेपी और एनडीए को हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और अब बिहार में ऐसा प्रचंड जनादेश देकर ये साबित कर दिया कि जनता 2024 में बीजेपी को सत्ता में लाकर बिल्कुल सही फैसला लिया था. 

बिहार के नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस ने जिस तरह से बार-बार पीएम मोदी, संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अपमान किया है, जनता उससे गुस्से में है. बिहार में बीजेपी  और एनडीए को मिला जनादेश कांग्रेस को लेकर लोगों के गुस्से की एक वजह माना जा रहा है. परिवारवाद की राजनीत से तंग आ चुके लोग कांग्रेस को उसकी नाकामी के लिए जमकर खरी खोटी सुना रहे हैं. वोट परसेंटेज पर भी इसका खास असर दिखा है.  

PTI फोटो.

PTI फोटो.

तुष्टिकरण की राजनीति तक सिमटी कांग्रेस

जो कांग्रेस कभी स्वतंत्रता आंदोलन की रीढ़ रही थी और हमेशा सभी समुदायों के हितों के लिए खड़ी रही, वह अब अपनी ही एक धुंधली परछाई बनकर रह गई है. 2025 की कांग्रेस की तुलना जिन्ना की 1925 की मुस्लिम लीग से की जाने लगी है. कांग्रेस की राजनीति सिर्फ एक समुदाय की तुष्टिकरण पर सिमटकर रह गई है.  वक्फ संशोधनों का विरोध भी एसका बड़ा उदाहरण है. ये राजनीति लोगों को माओवादियों और मुस्लिम लीग की याद दिलाने लगी है. लोग ये मान चुके हैं कि ये अब पहले वाली कांग्रेस नहीं रही. 

कांग्रेस आज राष्ट्रीय स्तर पर अस्तित्व बचाने के साथ ही वोटर्स का विश्वास जीतने का संकट झेल रही है. वहीं राज्य स्तर पर मुस्लिम वोटों के लिए अपने ही गठबंधन सहयोगियों से जूझ रही है. अपने-अपने मतलब के लिए क्षेत्रीय दल भले ही कांग्रेस को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन बिहार और महाराष्ट्र के रिजल्ट से साबित करने के लिए काफी हैं कि ये पार्टी गठबंधन को भी आगे बढ़ने नहीं दे रही.  

कांग्रेस को मिल रही किस बात की सजा?

दिल्ली में हुए बम विस्फोट को कांग्रेस नेताओं ने बिहार चुनाव से जोड़ने की कोशिश की. कुछ नेताओं ने तो जांच को एक समुदाय के ख़िलाफ पक्षपातपूर्ण तक बता दिया. ये बयान पार्टी की तुष्टिकरण की राजनीति को बढ़ाने वाले हैं. अब ऐसा लगता है कि इसी मानसिकता की वजह से कांग्रेस गर्त में जा रही है. अपने मूल वोट बैंक को साधने के लिए वह देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और यहां तक कि उसकी संप्रभुता को भी खतरे में डालने को तैयार हैं.

एक के बाद एक चुनाव में कांग्रेस की हार और बुरे प्रदर्शन का ही असर है कि अब पार्टी के अंदर ही दो धड़े नजर आने लगा है. पुराने नेता पार्टी के मौजूदा आदर्शों से तालमेल नहीं बिठा पा रहे. पहले और अब की कांग्रेस के बीच एक बड़ा अंतर देखकर वे पार्टी छोड़ने को मजबूर हैं. कांग्रेस खुद को मुस्लिमों का पैरोकार बताती है लेकिन न मुसलमान भी उसके खोखले एजेंडे का हवाला देकर पार्टी छोड़ रहे हैं. कांग्रेस अब सिर्फ एक परिवार की पार्टी बनकर रह गई है. जिसका अस्तित्व सिर्फ तुष्टिकरण और अराजकता के एजेंडे को आगे बढ़ाने तक सिमटकर रह गया है.  

NDA को जनादेश, राहुल के लिए क्या संदेश ?

बिहार की जीत एनडीए ही नहीं देश के आम नागरिकों और उनके स्वाभिमान की जीत मानी जा रही है. ये जीत कांग्रेस के लिए उसके झूठ और निजी हमलों के खिलाफ एक सीख मानी जा रही है. माना जा रहा है कि बार-बार पीएम मोदी को नीचा दिखाना उसको ही महंगा पड़ गया है. बिहार ने इसका मुंहतोड़ जवाब अपने वोटों दे दिया है. बिहार चुनाव के रिजल्ट ने एक बात साफ कर दी है कि जनता सब देखती है और वक्त आने पर सटीक जवाब देने से नहीं चूकती. 

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