महाराष्ट्र के नाशिक में स्थित सैमसोनाइट की लगेज फैक्ट्री उत्पादन के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी फैक्ट्री बन गई है. उसने यूरोप की पुरानी मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों को पीछे छोड़ दिया है. यह इस बात का सबूत है कि जब बड़ा पैमाना, सप्लाई चेन और कुशल श्रमिक एक साथ मिल जाते हैं तो भारतीय उद्योग क्या कर सकता है. यह सिर्फ एक कंपनी की सफलता नहीं है, बल्कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 की एक अहम बात को साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा अलग-अलग फैक्ट्रियों से नहीं, बल्कि औद्योगिक क्लस्टरों से बनती है.
भारत को अगर दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है, तो यह इस बात पर कम निर्भर करेगा कि कितनी फैक्ट्रियां बनाई जाती हैं और इस पर ज़्यादा निर्भर करेगा कि उद्योग कहां और किस तरह एक साथ विकसित किए जाते हैं. सर्वेक्षण कहता है कि अच्छे औद्योगिक क्लस्टर- जहां कंपनियाँ, सप्लायर, मजदूर, लॉजिस्टिक्स और संस्थान एक साथ हों ही वे इकाइयां हैं जिनसे देश वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़ते हैं, विदेशी निवेश लाते हैं और उत्पादकता बढ़ाते हैं.
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चीन का ग्रेटर बे एरिया कितना बड़ा है
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देते हुए सर्वे में बताया गया है कि चीन का ग्रेटर बे एरिया, जो देश की जमीन का एक फीसदी से भी कम है, लेकिन निर्यात में करीब 35 और जीडीपी में 11 फीसदी का योगदान करता है.इसी तरह वियतनाम के दो मुख्य आर्थिक क्षेत्र की जमीन 11 फीसदी है, लेकिन देश की करीब दो-तिहाई जीडीपी और व्यापार वहां से होता है.

क्लस्टर इसलिए उत्पादक होते हैं क्योंकि कंपनियां, सप्लायर और श्रमिक एक ही जगह पास-पास होते हैं. साझा इंफ्रास्ट्रक्चर, बड़ा श्रम बाजार, कम लागत और ज्ञान का आदान-प्रदान कंपनियों को तेजी से बढ़ने और दुनिया में मुकाबला करने में मदद करता है. नाशिक का लगेज उद्योग इसका अच्छा उदाहरण है. सैमसोनाइट ने न केवल वहां फैक्ट्री लगाई, बल्कि उसे और विस्तार भी दिया, क्योंकि यहां भरोसेमंद सप्लायर, कुशल कामगार और स्थिर माहौल मौजूद है. यह सस्ती लेकिन बिखरी हुई जगहों से अच्छा विकल्प है.
भारत में औद्योगिक क्लस्टर
आर्थिक सर्वे में यह भी कहा गया है कि भारत के अधिकतर औद्योगिक क्लस्टर अभी घरेलू बाजार तक ही सीमित और छोटे पैमाने के हैं. बीते सालों विशेष आर्थिक क्षेत्र, इंडस्ट्रियल पार्क और कॉरिडोर जैसी कई योजनाएं बनीं, लेकिन वे पूरी तरह वैश्विक स्तर के क्लस्टर नहीं बन पाईं. इसके दो मुख्य कारण हैं. पहला यह बड़े स्केल की कमी– कई क्लस्टर छोटे हैं, जमीन सीमित है और मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स से सही तरह जुड़े नहीं हैं. वहीं कठोर श्रम कानून, निर्माण के नियम और मंजूरी की सरकारी प्रक्रियाएं जटिल और अनिश्चित हैं.इससे विदेशी कंपनियां आने से हिचकती हैं. नाशिक का उदाहरण यह दिखाता है कि भारत में सफलता के उदाहरण पहले से मौजूद हैं. असली चुनौती उन्हें एक ऐसी राष्ट्रीय क्लस्टर रणनीति बनाना है, जो दुनिया के बेहतरीन देशों से मुकाबला कर सके.
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