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बेटे के ऑटिज़्म ने कैसे बदली इस मां की ज़िंदगी? 38,000 परिवारों के लिए बन गई आशा की किरण

एक समय ऐसा भी आया जब नेहा ने ऑटिज्म के डर को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया. धीरे-धीरे वह उन परिवारों के लिए उम्मीद की नई किरण बन गईं, जो ऑटिज्म की चुनौतियों से जूझ रहे थे.

बेटे के ऑटिज़्म ने कैसे बदली इस मां की ज़िंदगी? 38,000 परिवारों के लिए बन गई आशा की किरण
ऑटिज्म से जंग में मां बनी ताकत, बेटे की बदल दी जिंदगी.

जरा सोचिए, जब आपका बच्चा आपकी कोई बात न समझ पाए, अपनी बात कहने के लिए शब्द न हों और हर छोटी-सी बात पर चीखने-चिल्लाने लगे. आंखें होने के बावजूद वह किसी की आंखों में आंखें डालकर बात न कर सके. ऐसे में एक मां के दिल पर क्या बीतती होगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है... नोएडा की नेहा टंडन ने भी ऐसा ही दौर देखा, जब उनके बेटे को ऑटिज्म की चुनौती का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और डर की जगह उम्मीद का दामन थामा और अपने बेटे के लिए हर दिन एक नई लड़ाई लड़ी. एक समय ऐसा आया जब नेहा ऑटिज्म की डर को उद्देश्य में बदल दिया, बहिष्कार को चुनौती दी और दूसरों की मदद के लिए आगे आई... आज वह न केवल अपने बेटे की प्रेरणा हैं, बल्कि देशभर के अनगिनत परिवारों के लिए आशा की किरण बनकर उनके जीवन में नई उम्मीद जगा रही हैं.

नेहा टंडन के बेटे माहिर का जन्म 30 जून 2006 को हुआ था. शुरुआती कुछ वर्षों तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला था, जिससे लगे कि वह दूसरे बच्चों से अलग है. वह उम्र के अनुसार विकास के हर पड़ाव को सामान्य रूप से पार कर रहा था. वह कुछ शब्द बोल लेता था, अपनी पसंद की चीजों की ओर इशारा करता था और घर के लोगों से बातचीत भी करता था. किसी भी मां की तरह नेहा भी उसकी हर छोटी-बड़ी उपलब्धि पर खुश होती थीं. उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि एक दिन यही पल उनके जीवन की सबसे कीमती यादें बन जाएगी.

जन्म के 2 साल बाद व्यवहार में बदलाव आने लगा

समय के साथ माहिर के व्यवहार में बदलाव आने लगा. शुरुआत में दूसरे लोग इसे समझ नहीं पाए, लेकिन एक मां की नजर से यह बदलाव छिप नहीं सका. माहिर ने पहले की तरह मुस्कुराना कम कर दिया, लोगों से नजरें मिलाने से कतराने लगा और धीरे-धीरे उन शब्दों को बोलना भी बंद कर दिया, जिन्हें वह पहले आसानी से बोल लेता था. उसके चेहरे पर एक खालीपन छा गया. 

गंभीर ऑटिज्म से ग्रसित था माहिर

नेहा के लिए यह दौर बेहद परेशान करने वाला था. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उनके बेटे के साथ क्या हो रहा है?  कई डॉक्टरों और विशेषज्ञों से सलाह लेने के बाद उन्हें पता चला कि ढाई साल का माहिर ऑटिज्म से जूझ रहा है. ऑटिज्म एक न्यूरो-डेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें बच्चा पहले से सीखे हुए कौशल को खो देता है. उस समय ऑटिज्म के बारे में जागरूकता भी बहुत कम थी. अधिकांश परिवारों में इस विषय पर कोई चर्चा नहीं होती थी. नेहा ने इससे पहले कभी ऑटिज्म का नाम भी नहीं सुना था. इतना ही नहीं, जिन लोगों से उन्होंने सलाह मांगी, उनमें से कई लोग भी इस बीमारी के बारे में बहुत कम जानते थे. ऐसे में नेहा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बेटे का इलाज नहीं, बल्कि इस बीमारी को समझना भी था.

अगले कई महीने बीत गए. एक डॉक्टर ने इंतज़ार करने की सलाह दी. दूसरे ने श्रवण क्षमता की जांच कराने का सुझाव दिया. फिर EEG, मस्तिष्क स्कैन और विशेषज्ञ परामर्श का सिलसिला शुरू हुआ. हर मुलाकात के साथ थोड़ी सी उम्मीद जगती थी, लेकिन फिर वो जवाबों से ज़्यादा सवाल लेकर घर लौटती थी.

लगभग नौ महीने तक नेहा टंडन अपने बेटे की स्थिति को समझने और सही जवाब तलाशने के लिए भटकती रहीं. इस दौरान समय भी तेजी से बीत रहा था और उनकी चिंता बढ़ती जा रही थी. आखिरकार किसी ने उन्हें दिल्ली स्थित ‘एक्शन फॉर ऑटिज्म' संस्था के बारे में बताया. वहां विशेषज्ञों ने माहिर का गहन अवलोकन किया, उसके व्यवहार का आकलन किया और विस्तृत रिपोर्ट तैयार की. साल 2008 के अंत में यह स्पष्ट हो गया कि माहिर गंभीर ऑटिज्म से प्रभावित है.

हर दिन अस्पतालों और थेरेपी सेंटरों के चक्कर लगाते हुए गुजर रहा था

निदान मिलने के बाद नेहा ने अपनी पेशेवर जिंदगी को पीछे छोड़ने का फैसला किया. उस समय वह मीडिया सेल्स के क्षेत्र में अपना करियर बना रही थीं, लेकिन उन्हें लगा कि बेटे की मदद से बढ़कर इस समय कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है. इसके बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया. हर दिन डॉक्टरों के अपॉइंटमेंट, लंबे ट्रैफिक जाम, थेरेपी के बीच गुजरने लगा. उनकी पूरी दुनिया बेटे को नई-नई चीजें सिखाने के प्रयासों तक सीमित हो गई थी. क्या बोलना है, क्या पहचानना है, क्या पढ़ना है और कैसे व्यवहार करना है... हर पल किसी न किसी सीख में बीतता था,  लेकिन जितना अधिक दबाव बढ़ता गया, माहिर उतना ही अपने भीतर सिमटता चला गया. नेहा ने महसूस किया कि अब उनका बेटा उनके साथ समय बिताने में सहज नहीं रहता था और पास आते ही वह बेचैन हो जाता है. 

अमेरिकी थेरेपिस्ट की सलाह- खेल और यात्रा से मिलेगा बेहतर विकास

इसके बाद उन्होंने अमेरिका के एक थेरेपिस्ट से बातचीत की, जिसके बाद नेहा की सोच पूरी तरह बदल गई. थेरेपिस्ट ने उन्हें सलाह दी कि बच्चे को लगातार सिखाने और सुधारने के दबाव से बाहर निकालें...  इसके बजाय उसके साथ समय बिताएं, खेलें, फिल्में देखें, टूर करें और जीवन के छोटे-छोटे पलों का आनंद लें. शुरुआत में नेता टंडन को यह सलाह अजीब लगी, लेकिन फिर यहीं से उनके रिश्ते में सकारात्मक बदलाव आने लगा. 

जैसे-जैसे माहिर बड़ा हुआ, नेहा को एक और कठिन चुनौती का सामना करना पड़ा. महज दो साल की उम्र में उसे एक प्रतिष्ठित प्ले स्कूल से निकाल दिया गया. इसके बाद एक नामी स्कूल में दाखिला दिलाया गया, जहां इन्क्लूसिव एजुकेशन का वादा किया. परिवार को भरोसा दिलाया गया कि समय आने पर माहिर को मुख्यधारा की कक्षाओं में शामिल कर लिया जाएगा, लेकिन हकीकत अलग थी. माहिर का अधिकांश समय ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए बने एक अलग कमरे में ही बीतता था. तीन वर्षों तक नेहा इंतजार करती रहीं, जिसका उनसे वादा किया गया था. उन्होंने बार-बार अनुरोध किया कि माहिर को संगीत, पेंटिंग और अन्य गतिविधियों में भाग लेने दिया जाए, जहां बच्चे स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से सीखते हैं. 

इसे नया अवसर बनाया

अपने बेटे की पहचान और सीमाएं समाज को तय नहीं करने देने के संकल्प के साथ नेहा उसे हर जगह लेकर जाने लगीं. रेस्तरां, मॉल, हवाई अड्डे, सिनेमाघर... हर जगह को उन्होंने उसके लिए सीखने और नए अनुभव हासिल करने का अवसर बनाया. पहली हवाई यात्रा के दौरान वह बेहद चिंतित थीं. उन्हें डर था कि माहिर सेंसरी ओवरलोड से परेशान हो जाएगा या सार्वजनिक जगह पर असहज व्यवहार करेगा, लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा. उन्होंने पाया कि माहिर को यात्रा करना बेहद पसंद है. इसके बाद परिवार ने भारत ही नहीं, बल्कि सिंगापुर, हांगकांग, मकाऊ और डिज्नीलैंड जैसे कई विदेशों की यात्राएं करवाई. इन यात्राओं के दौरान नेहा को समझ आया कि ऑटिज्म किसी बच्चे की संभावनाओं को सीमित नहीं कर सकता.

एक दिन नेहा को यह एहसास हुआ कि बेटे माहिर की विकास में सबसे बड़ी बाधा ऑटिज्म नहीं था, बल्कि समाज का उसे समझने में असफल होना था.

छिपाने के बजाय ऑटिज्म के बारे में खुलकर बोलना शुरू किया

साल 2014 में नेहा ने ऑटिज्म और समावेशन को लेकर खुलकर बोलना शुरू किया. इस दौरान दूसरे बच्चे के माता-पिता लगातार उनसे सलाह लेने आने लगे. कई परिवार पहली बार ऑटिज्म जैसी स्थितियों का सामना कर रहे थे. कुछ अपने बच्चों की पढ़ाई और थेरेपी को लेकर चिंतित थे, तो कुछ केवल ऐसे व्यक्ति से बात करना चाहते थे जो उनकी भावनाओं को समझ सके.

बेटे के संघर्ष और उपलब्धियों की कहानी

धीरे-धीरे वह ऑटिज्म से प्रभावित परिवारों के लिए जानकारी, भरोसे और उम्मीद का एक मजबूत सहारा बन गईं. अप्रैल 2023 में उन्होंने माहिर के स्कूल सीआरआईए फाउंडेशन में आयोजित एक ऑटिज्म जागरूकता कार्यक्रम में हिस्सा लिया. आज लगभग दो दशक बाद नेहा 44 वर्ष की हैं और वह एक अकेली मां हैं और जिंगाबाद में मुख्य विकास अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं. उनका बेटा माहिर इस साल 20 साल का होने वाला है. बता दें कि माहिर चॉकलेट और मोमबत्तियां बनाता है. इसके अलावा वह काफी टूर करता है. साथ ही छोटे बच्चों के लिए कार्यशालाएं आयोजित करता है, और उन उपलब्धियों को हासिल करने की कोशिश करता है, जिन्हें कई लोग कभी उसकी पहुंच से बाहर मानते थे.

बेटे के संघर्ष और उपलब्धियों की कहानी को समाज तक पहुंचाने के लिए नेहा ने @made.it.special की शुरुआत की. आज इस मंच से 38.5 हजार से अधिक लोग जुड़े हुए हैं. यह पहल देशभर के माता-पिता, शिक्षकों और देखभाल करने वाले परिवारों को न केवल जागरूक कर रही है, बल्कि उन्हें उम्मीद और प्रेरणा भी दे रही है.

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