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मॉनसून सत्र में बरसने को तैयार विपक्ष, पर समीकरणों के भरोसे सरकार की नैया; किन एजेंडों पर नजर

सरकार गृह मंत्री अमित शाह के 17 अप्रैल को लोक सभा में दिए गए आश्वासन को बिल में शामिल करने को तैयार है जिसमें लोक सभा और सभी विधानसभाओं की 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने का प्रावधान है.

मॉनसून सत्र में बरसने को तैयार विपक्ष, पर समीकरणों के भरोसे सरकार की नैया; किन एजेंडों पर नजर
मॉनसून सत्र में इस बार कई बिलों पर रहेगी सरकार की नजर
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  • संसद का आगामी मॉनसून सत्र आर्थिक सुधारों, राजनीतिक ध्रुवीकरण और विधायी एजेंडे की पूर्ति के लिए महत्वपूर्ण होगा
  • सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण के संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्षी दलों से संपर्क में है
  • लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों में वृद्धि का प्रस्ताव है, जिससे दक्षिण भारत की हिस्सेदारी स्थिर रहेगी
नई दिल्ली:

सोमवार से शुरू होने जा रहा संसद का मॉनसून सत्र हंगामेदार रहने की संभावना है. विपक्ष राम मंदिर चढ़ावा चोरी, नीट पेपर लीक, विपक्षी दलों में तोड़-फोड़, महंगाई और सूखे जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी कर चुका है. वहीं सरकार बजट सत्र के अधूरे एजेंडे को पूरा करना चाहती है. केवल चार महीनों में प बंगाल और असम में मिली जीत, बदले राजनीतिक समीकरणों और बढ़ी संख्या के बाद सरकार का आत्मविश्वास आसमान पर है. ऐसे में सरकार कई ऐसे बिल पारित कराना चाहती है जिनके अर्थव्यवस्था और राजनीति पर दूरगामी परिणाम होंगे. संसद का आगामी मानसून सत्र विधायी सुधारों और राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने जा रहा है. इस सत्र में जहां एक ओर सरकार अपने आर्थिक और प्रशासनिक एजेंडे को 'बिग टिकट रिफॉर्म्स' के जरिए आगे बढ़ाएगी, वहीं दूसरी ओर सदन के भीतर बदलते गठबंधन समीकरणों और बहुमत के नए आंकड़ों की परीक्षा भी होगी. शिक्षा, न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक क्षेत्रों से जुड़े कई महत्वपूर्ण विधेयक इस सत्र में पारित कराए जाएंगे.

DMK से भी सरकार की चल रही है बातचीत

सरकार ने परिसीमन और महिला आरक्षण के संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए कमर कस ली है. शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई एनडीए मंत्रियों की बैठक में इसे पारित कराने के लिए विपक्षी दलों से संपर्क साधने की जिम्मेदारी अलग-अलग मंत्रियों को दी गई. बजट सत्र में आवश्यक संख्या बल न होने के कारण सरकार यह बिल पारित नहीं करा सकी थी. यह मोदी सरकार के लिए झटका था क्योंकि 12 साल में पहली बार कोई बिल गिरा था. उसी दिन से सरकार ने दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की व्यवस्था करने का अभियान शुरू कर दिया था. टीएमसी और शिवसेना यूबीटी में टूट, बीजेडी के राज्य सभा सांसदों के इस्तीफे और अब एनसीपी शरद पवार के एनडीए में शामिल होने की चर्चाओं से सरकार दो तिहाई बहुमत के नजदीक पहुंचती दिख रही है. डीएमके से भी सरकार की बातचीत चल रही है. वह दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों को लेकर पक्का आश्वासन चाहती है.

सरकार गृह मंत्री अमित शाह के 17 अप्रैल को लोक सभा में दिए गए आश्वासन को बिल में शामिल करने को तैयार है जिसमें लोक सभा और सभी विधानसभाओं की 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने का प्रावधान है. इस चिंता को दूर करने के लिए सरकार 'परिसीमन विधेयक, 2026' और '131वें संविधान संशोधन विधेयक' में एक नया फॉर्मूला शामिल कर रही है. इसके लिए यह प्रावधान सुनिश्चित किया जा रहा है कि लोक सभा की सीटों की कुल संख्या वर्तमान 543 से बढ़ाकर लगभग 850 कर दी जाएं. इनमें 815 सीटें राज्यों को और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों को देने का प्रस्ताव है. इसके लिए सीटों का मौजूदा अनुपात नहीं छेड़ा जाएगा.

ये है समीकरण

उदाहरण के लिए, तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 और कर्नाटक की 28 से बढ़कर 42 हो जाएंगी. इससे दक्षिण भारत की कुल हिस्सेदारी संसद में करीब 24% पर ही स्थिर रहेगी. गृह मंत्री शाह ने कहा था कि अभी 543 सीटों में दक्षिण भारत की 129 सीटें हैं जो सदन की कुल संख्या का 23.76% है. नए परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़ कर 195 हो जाएगी जिससे नए सदन में उसकी हिस्सेदारी 23.87% रहेगी. यानी हिस्सेदारी में कुछ बढोत्तरी ही होगी, कमी नहीं. तमिलनाडु की वर्तमान में 39 सीटें हैं यानी 7.18 प्रतिशत. यह बढ़ कर 59 सीटें यानी 7.23% हो जाएगी. कर्नाटक की 28 सीटें (5.15%) जो बढ़ कर 42 सीटें (5.14%), आंध्र प्रदेश की 25 सीटें (4.60%) बढ़ कर 38 सीटें (4.65%), तेलंगाना की वर्तमान 17 सीटें (3.13%) से बढ़ कर 26 सीटें (3.18%) और केरल की वर्तमान 20 सीटें (3.68%) बढ़ कर 30 सीटें (3.67%) हो जाएंगी. इसी अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं की संख्या भी बढ़ाई जाएगी.

क्या कुछ है प्रावधान

यह प्रावधान होने के बाद डीएमके और अन्य विपक्षी दल भी बिल का समर्थन कर सकते हैं. एक वरिष्ठ मंत्री के अनुसार बड़े विपक्षी दलों में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को छोड़ कर बाकी सभी दलों के समर्थन का सरकार को भरोसा है.सरकार ने इसीलिए उस विवादास्पद संविधान संशोधन विधेयक पर आगे नहीं बढ़ने का फैसला किया है जिसमें तीस से अधिक की हिरासत पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को पद से हटाने का प्रावधान है. जेपीसी इस पर अपनी रिपोर्ट नहीं दे सकी. इसके जरिए विपक्ष को संदेश है जिसे आशंका थी कि सरकार इसके माध्यम से विपक्षी सरकारों को निशाना बना सकती है. सरकार एक देश एक चुनाव पर भी फिलहाल आगे नहीं बढ़ेगी जिसका अधिकांश विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं.



इसके अलावा सरकार अपनी विचारधारा से जुड़े मुद्दों पर भी कुछ महत्वपूर्ण विधेयक इस सत्र में पारित कराएगी. इनमें जन्म और मृत्यु का पंजीकरण (संशोधन) विधेयक और वंदे मातरम के सम्मान से जुड़े विधेयक शामिल हैं. जन्म मृत्य पंजीकरण बिल के जरिए देश में डिजिटल रूप से एकीकृत एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का प्रस्ताव है. इसके तहत जन्म प्रमाण पत्र  को एक एकल दस्तावेज का दर्जा दिया जाएगा. इस प्रमाणपत्र का उपयोग वोटर लिस्ट, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और सरकारी योजनाओं के लिए एकमात्र पहचान के रूप में किया जा सकेगा. इससे प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ेगी.

वहीं राष्ट्र गीत वंदे मातरम को लेकर लाए जा रहे विधेयक का उद्देश्य राष्ट्रगान 'जन गण मन' की तर्ज पर ही राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को भी आधिकारिक तौर पर समान सम्मान और वैधानिक दर्जा देना है, ताकि इसके गौरव को अक्षुण्ण रखा जा सके. इसका अपमान करने या बाधा डालने पर तीन साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान होगा. सरकार सभी सरकारी कार्यक्रमों में पूरे वंदे मातरम का गायन पहले ही अनिवार्य कर चुकी है. इसके अलावा मानसून सत्र में सरकार का मुख्य ध्यान आर्थिक तरक्की, वैश्विक निवेश को आकर्षित करने और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी है. इसके लिए विधायी एजेंडे के शीर्ष पर कई अहम विधेयक हैं. आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026 लाया जा रहा है जो उस अध्यादेश की जगह लेगा जो विदेशी निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों से मिलने वाले ब्याज और पूंजीगत लाभ पर टैक्स से छूट देता है.

इसका उद्देश्य भारतीय ऋण बाजार में वैश्विक पूंजी को आकर्षित करना है. दूसरा महत्वपूर्ण विधेयक एमएसएमई विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 है. छोटे और मध्यम उद्योगों को मजबूती देने के लिए यह बिल 'उद्यम पंजीकरण पोर्टल' को वैधानिक दर्जा देगा और भुगतान में देरी के विवादों को ऑनलाइन निपटाने का तंत्र बनाएगा. साथ ही एफसीआरए (संशोधन) विधेयक लाया जा रहा है जो विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाने और कड़े नियम लागू करेगा.साथ ही, सरकार न्यायिक सुधार पर भी आगे बढ़ेगी. सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 से बढ़ा कर 37 करने के लिए अध्यादेश लाया गया था. अब अध्यादेश की जगह विधेयक लाया जाएगा. सरकार ने लंबित मामलों के तेजी से निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का फैसला किया है जिसे लागू भी किया जा चुका है.

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़े सुधार की भी तैयारी है. इसके नियमन, मानकीकरण और प्रशासनिक ढांचे को पूरी तरह से बदलने के लिए विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक पर बनी संयुक्त संसदीय समिति भी अपनी रिपोर्ट देने जा रही है. जेपीसी की सिफारिशों का समावेश करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को कानूनी रूप देने के लिए सरकार इस बिल को भी मॉनसून सत्र में ला सकती है. इसके तहत यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई की जगह एक सिंगल रेगुलेटरी बॉडी जिसे विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान कहा जाएगा, बनाने का प्रस्ताव है.

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