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मीरा रोड: मुंबई का वो विवादित इलाका जहां सपने भी बसते हैं, डर भी... और हर गली की है अपनी एक कहानी

ईद-उल-अजहा से पहले मंगलवार को मीरा रोड में कुर्बानी के लिए बनाए गए शेड को लेकर विवाद हुआ. बीते कुछ वर्षों से मीरा रोड अक्सर विवादों की वजह से सुर्खियों में आया है, पर यह उसकी असली पहचान नहीं है. तो आखिर क्या है मीरा रोड की कहानी?

मीरा रोड: मुंबई का वो विवादित इलाका जहां सपने भी बसते हैं, डर भी... और हर गली की है अपनी एक कहानी
  • मीरा रोड कभी सुनसान और सस्ती जमीन वाला इलाका था, जो आज हजारों मध्यमवर्गीय परिवारों के सपनों का घर है.
  • हाल के दिनों में मीरा रोड बार-बार विवादों में आता रहा है, हालिया बकरा विवाद और 2024 की झड़पें इसकी मिसाल हैं.
  • पर असली मीरा रोड लोगों के सपनों, संघर्ष, उम्मीदों और रोज की जिंदगी का वो मिश्रण है जहां पूरा भारत बसता है.
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मुंबई का नाम आते ही मरीन ड्राइव, जुहू, चौपाटी, बांद्रा, नवी मुंबई और लोकल ट्रेन समेत बॉलीवुड की चमक घूमने लगती है. लेकिन मुंबई की असली कहानी तो उन इलाकों में बसती है जहां लाखों की संख्या में लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के संघर्ष कर रहे होते हैं. उन्हीं इलाकों में से एक मीरा रोड है, जो कभी नमक के खेतों और सुनसान जमीनों का इलाका था. जहां तब के बंबई वासी घर खरीदने की सोचते भी नहीं थे लेकिन आज वही मीरा रोड लाखों लोगों का ठिकाना है, सपनों का पता है, संघर्ष का चेहरा है और अब विवादों की सुर्खियों का स्थायी किरदार भी बनता जा रहा है.

मीरा रोड स्थित पूनम इस्टेट क्लस्टर-1 की एक सोसाइटी में ईद के लिए लाए गए करीब 25 बकरों को रखने के लिए अस्थायी शेड बनाया गया. यहां रहने वाले कुछ लोगों ने इसका विरोध किया. आरोप लगे कि बिना आधिकारिक मीटिंग के अनुमति दी गई. मामला पुलिस स्टेशन और महाराष्ट्र नगर पालिका के दफ्तर तक पहुंच गया. प्रशासन ने शेड हटवा दिया. लेकिन तनाव बना रहा. पुलिस तैनात करनी पड़ी.

इसकी जानकारी देते हुए डीसीपी मीरा भयंदर राहुल चौहान ने बताया, "पूनम क्लस्टर सोसाइटी में कुछ लोग ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी के लिए बकरे लेकर आए थे. इस पर सोसाइटी के कुछ दूसरे लोगों ने आपत्ति जताई. शिकायत मिलने के बाद प्रशासन ने इस मामले को लेकर बैठक बुलाई और सभी पक्षों से बात की. इसके बाद नगर निगम ने कुर्बानी के लिए एक अलग जगह तय कर दी. सोसाइटी के अंदर आपसी सहमति से फैसला लिया गया कि बकरों को परिसर से हटाकर नगर निगम की तय की गई जगह पर भेजा जाएगा. अब सभी बकरों को वहां शिफ्ट कर दिया गया है और फिलहाल सोसाइटी में कोई विवाद या समस्या नहीं है."

लेकिन सवाल ये है कि आखिर यहां इतने विवाद क्यों?

बीते कुछ वर्षों में मीरा रोड का नाम बार-बार विवादों की वजह से सुर्खियों में आने लगा. कभी हेट स्पीच तो कभी धार्मिक झड़प. सड़क के नाम पर राजनीति, कबूतरों को दाना खिलाने पर विवाद और कभी सोशल मीडिया पोस्ट पर तनाव. 

और अब बकरी ईद से पहले बकरों को लेकर नया विवाद.

असल में यह उस मीरा रोड की बेचैनी है जहां तेजी से बढ़ती आबादी, अलग-अलग पहचान, राजनीति और सोशल मीडिया का जहर एक साथ मिलकर माहौल को बारूद बना देता है.

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Photo Credit: ANI

2024 का वो दिन जब मीरा रोड पूरे देश की खबर बन गया

22 जनवरी 2024. अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से एक दिन पहले मीरा रोड के नया नगर इलाके में जुलूस निकल रहा था. आरोप लगा कि जुलूस पर पथराव हुआ. फिर हिंसा भड़क गई. गाड़ियों के शीशे टूटे. लोग भागे. पुलिस उतरी. 19 गिरफ्तारियां हुईं. प्रत्यक्षदर्शियों ने दावा किया कि लोगों से नाम पूछे गए और फिर उनकी गाड़ियों को निशाना बनाया गया.

उस रात टीवी चैनलों पर सिर्फ मीरा रोड था. लोग पूछ रहे थे कि क्या मीरा रोड बदल गया है?

लेकिन सच यह है कि मीरा रोड हमेशा से ऐसा नहीं था.

मीरा रोड की पहचान मुंबई के मिनी इंडिया के रूप में होती रही है, यहां मस्जिद की अजान भी सुनाई देती है और गणपति विसर्जन के ढोल भी. यहां बिरयानी की खुशबू भी है और गुजराती ढोकले की दुकान भी. यहां करोड़ों के टॉवर भी हैं और मॉनसून में पानी भर जाने वाली सड़कें भी.

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जहां कभी दलदल था, वहां आज करोड़ों के फ्लैट हैं

90 के दशक से पहले मीरा रोड को मुंबई नहीं माना जाता था. लोग कहते थे- इतनी दूर कौन रहेगा?

यहां जमीनें बाकी मुंबई की तुलना में काफी सस्ती थीं. चारों तरफ खाली प्लॉट, नमक के खेत और छोटी बस्तियां थीं. तब मुंबई धीरे-धीरे फैल रही थी. साउथ मुंबई बेहद महंगी हो रही थी. कई उपनगर बसाए गए पर वो भी भर चुके थे. तब मध्यम वर्ग ने मीरा रोड का रुख किया.

ये वही समय था जब यहां लोकल ट्रेनें आईं. बिल्डर आए. सोसाइटी खड़ी होने लगीं. और फिर देखते-देखते मीरा रोड मुंबई की सबसे तेजी से बढ़ती आबादी वाले इलाकों में शामिल हो गया. यहां यूपी, बिहार, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, बंगाल और दक्षिण भारत तक के लोग आकर बस गए. मुसलमानों की बड़ी आबादी भी यहां बसी. खासकर नया नगर इलाका मुस्लिम बहुल बन गया. यह मुंबई की वो जगह बन गई जहां आम लोगों के वन बीएचके का सपना होने लगा पूरा.

लेकिन मीरा रोड की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि यहां हर कोई बाहरी था. कोई मूल निवासी नहीं था. इसलिए सबने मिलकर इसे अपना शहर बनाया.

सैयद नजर हुसैन

सैयद नजर हुसैन
Photo Credit: Facebook/ Muzaffar Hussain

मीरा रोड को बनाने वाले सैयद नजर हुसैन की कहानी

मीरा रोड की कहानी सैयद नजर हुसैन के बिना अधूरी है. लोग उन्हें प्यार से नजर सेठ कहते थे. छोटे कद, साधारण कपड़े, कुर्ता-पायजामा और काली टोपी पहनने वाले नजर साहब ने वो सपना देखा था जिसे उस दौर में लोग पागलपन कहते.

महाराष्ट्र के अमरावती के छोटे से गांव से आए नजर हुसैन ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे. गरीबी की वजह से सातवीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी. मुंबई आए तो छोटे-मोटे काम किए. लेकिन उनमें एक खास बात थी, लोगों से रिश्ता बनाना.

उन्होंने यहां रियल एस्टेट का काम शुरू किया. तब मीरा रोड वीरान इलाका था. जमीनें सस्ती थीं. लोग यहां आने से डरते थे. लेकिन नजर साहब ने यहां प्लॉट खरीदने शुरू किए. उन्होंने नया नगर बसाया.

कहा जाता है कि नया नगर के शिलान्यास में बाल ठाकरे और गुलाम महमूद बनातवाला दोनों मौजूद थे. यानी दो अलग विचारधाराओं वाले नेता एक ही मंच पर, और उन्हें साथ लाने वाले शख्स थे- नजर हुसैन. उनका सपना सिर्फ मुस्लिम कॉलोनी बनाना नहीं था. वह ऐसा इलाका बनाना चाहते थे जहां हर समुदाय रहे. जहां रोजी-रोटी हो. जहां लोग डर के बिना जिंदगी जी सकें.

सबसे बड़ी बात, जब 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई जल रही थी, तब मीरा रोड मुंबई के अन्य इलाकों की तुलना में शांत था. लोग कहते हैं कि इसके पीछे नजर साहब की समझ और सामुदायिक रिश्तों की बड़ी भूमिका थी. आज उनकी पत्नी नूरजहां को इलाके में लोग मम्मी कहकर बुलाते हैं.

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फिर आखिर क्या बदल गया?

असल में मीरा रोड बहुत तेजी से बड़ा हुआ. शायद जरूरत से ज्यादा तेजी से. जहां 5 हजार लोग रहने थे, वहां हजारों की संख्या में लोग रहने लगे. सड़कें छोटी पड़ गईं. ट्रैफिक बढ़ गया. पानी की दिक्कत बढ़ी. मानसून में जलभराव आम हो गया. लोकल ट्रेनें ठसाठस भरने लगीं. और जब भी शहरों में जगह कम पड़ने लगती है, तनाव भी साथ ही बढ़ता है.

फिर सोशल मीडिया आया. हर छोटी घटना को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देखने का दौर शुरू हुआ. राजनीतिक संगठनों ने भी जमीन तलाश ली. अब हर विवाद वायरल होने लगा. कभी कोई वीडियो, कभी किसी की हेट स्पीच, तो कभी कोई पोस्टर. मीरा रोड धीरे-धीरे न्यूज का हॉटस्पॉट बन गया.

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मगर केवल टीवी पर इन विवादों को देखकर अगर मीरा रोड को समझने की कोशिश करेंगे तो यह गलती होगी. क्योंकि यहां रोज सुबह से शाम तक रोजमर्रा के संघर्ष में लगे आम जन दिखेंगे. कोई नौकरी के दौड़कर मुंबई लोकल पकड़ता शख्स दिखेगा, तो टिफिन ले जाती महिला भी साथ ही दिखेगी. परीक्षाओं की तैयारियां करते छात्र दिखेंगे तो ऑटो चलाकर अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे जुटाते पिता भी दिखेंगे. 

फिर जब शाम को यहां की गलियों में पहुंचेंगे तो शावरमा भी मिलेगा और वड़ा पाव भी. मोहम्मद रफी के गाने भी सुनने को मिलेगे तो किशोर और अरिजीत सिंह की आवाजें भी. यहां मस्जिद भी है और मंदिर भी. और यही मीरा रोड की असली पहचान है.

यहां हर इंसान अपने गांव से कुछ लेकर आया है. कोई वहां की भाषा लाया है तो कोई खाना. यहां वो अपने दर्द लेकर आया है और सुनहरे भविष्य की कल्पना भी. यहां जिंदगी मुंबई के लोकल की तरह ही हर रोज इन्हीं लोगों की भविष्य की उम्मीदों के बीच आगे बढ़ जाती है. इन्हीं लोगों से आज मीरा रोड की असली पहचान बनी है.

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