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मैं Writers’ Building हूं, मैंने बंगाल की सत्ता को बेहद करीब से बनते, बदलते देखा है

मैं राइटर्स बिल्डिंग हूं. बंगाल की राजनीतिक सत्ता का केंद्र. वो ऐतिहासिक इमारत जिसने साम्राज्यों को बनते और मिटते देखा, जिसने बंगाल के इतिहास को आकार दिया. पढ़िए मेरी अनकही कहानी...

मैं Writers’ Building हूं, मैंने बंगाल की सत्ता को बेहद करीब से बनते, बदलते देखा है
  • मैंने शासन की महत्वाकांक्षा, नियम कायदे बनते और जुल्म होते देखा है.
  • अंग्रेजों का अहंकार देखा है तो भारतीयों की ललकार को देखा है.
  • मैंने क्रांति और प्रशासन दोनों को पनाह दी है और मैं आज भी वहीं खड़ा हूं.
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मैं हूं Writers' Building. कोलकाता के दिल में खड़ा, लाल रंग की अपने समय की सबसे ऊंची इमारत जिसे सरकारी दफ्तर से लेकर धरोहर तक का ओहदा मिला है. मेरी कहानी सिर्फ ईंट-पत्थर की नहीं है. मैं वक्त का गवाह हूं. मैंने बंगाल को बनते, टूटते, बदलते और फिर से उठते देखा है. मेरी दीवारों में इतिहास बसता है. मेरे भीतर सत्ता की आवाज, क्रांति की गूंज और जनता की बेचैनी आज भी कैद है. मैंने साम्राज्य देखा. विद्रोह देखा. आजादी देखी. वामपंथ का उभार देखा. बदलाव की राजनीति देखी और अब हो रहे नए परिवर्तन को भी देख रहा हूं.

जब मैं बना, तब बंगाल गुलाम था

मेरा जन्म 1777 में हुआ. उस वक्त यहां अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी राज था. तब थॉमस लॉयन को राइटर्स यानी क्लर्क के काम करने की जगह तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया. इंग्लैंड के थॉमस लॉयन ने मुझे 1780 में तैयार किया तो मैं कलकत्ता की पहली तीन मंजिला इमारत था. तब मेरे सामने टैंक स्क्वायर था जिसे लोग आज बीबीडी बाग के नाम से जानते हैं. लेकिन सच कहूं तो शुरुआत में मैं बहुत भव्य नहीं था. लोग मुझे थोड़ा भद्दा और साधारण मानते थे. लेकिन उन्हें क्या पता था कि आने वाले समय में मैं सिर्फ एक बिल्डिंग नहीं रहूंगा. मैं सत्ता का चेहरा बन जाऊंगा.

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मेरे कमरों में कलम किस्मत बदलती थी

मेरे कमरों में ईस्ट इंडिया कंपनी के राइटर्स (क्लर्क) बैठते थे. उनके हाथों की कलमें फैसले लिखा करती थीं. टैक्स तय किए जाते थे, जमीनें छीन ली जाती थीं. व्यापार के कायदे-कानून बनते थे और धीरे-धीरे मैंने पूरे भारत को मेरे ही कमरों में बैठे अंग्रेजों के नियंत्रण में आते देखा. मैंने व्यापार करने आई एक कंपनी को शासक बनते देखा. मैंने अपनी बिल्डिंग के बाहर भारतीयों को धूप में खड़े और अंग्रेज शासकों को अपने कमरों में बैठकर आदेश देते देखा. मैं खामोश खड़ा हर रोज सत्ता और गुलामी के बीच फर्क को देखता रहा. मैं खुद से पूछा करता कि क्या कभी इस जमीन के असली हकदार भारत के बासिंदों को इसका हक भी मिलेगा.

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मेरे मालिक बदले तो मैं भी बदला

जैसे जैसे समय बीता. मेरा पुराना ढांचा तो वही रहा पर मेरी शक्ल बदलती गई. जाधवपुर यूनिवर्सिटी में आर्किटेक्चर विभाग की हेड मधुमिता रॉय बताती हैं कि मेरे बाहरी रूप को बंगाल के शासकों ने अपनी विचारधारा के अनुसार बदले. पहले मुझे फोर्ट विलियम कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए इस्तेमाल किया गया. फिर मेरे सामने एक लंबा गलियारा बनाया गया. लेकिन असली बदलाव तब आया जब 1857 की बगावत ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी. 1857 में भारतीयों की क्रांति ने ब्रिटिश ताकतों को हिला दिया था. इंग्लैंड में बैठे हुक्मरानों ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का शासन अपने हाथों में लिया. उन्हें भारत में एक ताकतवर सचिवालय की जरूरत थी, जिसके लिए मुझे चुना गया.

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अंग्रेज डर और ताकत दिखाना चाहते थे

ब्रिटिश राज मुझे सिर्फ दफ्तर नहीं बनाना चाहता था. वो मुझे सत्ता का प्रतीक बनाना चाहता था. मुझे फ्रांस की वास्तुकला के तर्ज पर सजाया गया. मुझ पर व्यापार, न्याय, विज्ञान और कृषि के प्रतीक लगाए गए. मूर्तियां लगाई गईं लेकिन चेहरे यूरोपीय थे. ये संदेश था कि सभ्यता और शक्ति का ताकत यूरोप से होकर आता है. मेरी लाल दीवारें अब ब्रिटिश हुकूमत के भारतीय केंद्र के लिए पहचानी जाने लगीं. मेरे गलियारे में वायसराय और उनके अफसर घूमते थे. मेरे ही कमरों में बैठकर भारत का नसीब तय करने वाले फैसले लिए जाते थे.

रॉयटर्स बिल्डिंग के सामने लगी है विनय बासु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता की प्रतिमा

रॉयटर्स बिल्डिंग के सामने लगी है विनय बासु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता की प्रतिमा
Photo Credit: AI Generated

फिर एक दिन… मेरे अंदर गोलियों की आवाज गूंजी

फिर आज से करीब 100 साल पहले 8 दिसंबर 1930 के दिन मेरे अंदर तीन भारतीय नौजवान आए. विनय बासु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता. उनकी आंखों में कोई खौफ नहीं था. वो दिन मैं कभी नहीं भूल सकता, उस दिन मैंने उनकी आंखों में आग देखी थी. मेरे गलियारे में गोलियां गूंजीं और ब्रिटिश अफसर सिम्पसन खून से लथपथ मेरी ही जमीन पर गिरे थे.

मैंने पहली बार देखा कि कोई अंग्रेजों की इस सत्ता से डर नहीं रहा था. लंबे समय तक हुकूमत देखने के बाद उस दिन मैं पहली बार बगावत का भी गवाह बना. उसी घटना की याद में बाद डलहौजी स्क्वायर का नाम बदल कर Benoy, Badal और Dinesh के नाम पर बीबीडी BBD बाग रखा गया.

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फिर आजादी आई पर मेरी जिम्मेदारी बरकरार रही

15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ और अंग्रेज चले गए तब मैंने राहत की सांस ली. पर मेरी जिम्मेदारी बरकरार रही. हां, अब मेरे कमरे में अंग्रेज अफसर नहीं, भारतीय अधिकारी बैठते थे. हालांकि जल्द ही मैं समझ गया कि सत्ता तो बदली पर व्यवस्था नहीं. अब भी मेरे गलियारे में फाइलें चला करती थीं, फर्क बस इतना था कि अब फैसले भारतीय लिया करते थे लेकिन आम जनता आज भी इंतजार करती थी. 

बस चेहरे बदल गए थे. बंगाल में वामपंथ का लंबा दौर शुरू हुआ. ज्योति बसु जैसे नेताओं ने दशकों मेरे अंदर ही बैठकर रिकॉर्ड 23 वर्षों तक सत्ता चलाई. फिर बुद्धदेव भट्टाचार्य का दौर आया. 11 सालों तक मैंने उनकी सरकार को देखा. इन वर्षों में मैंने ट्रेड यूनियन, किसानों, मजदूरों, उद्योगों पर नीतियां बनते देखा. पर मेरे बाहर मोर्चे और प्रदर्शन आज भी लगातार दिखते थे. 

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फिर बदलाव आया और मेरी ताकत छीन ली गई

मैंने परिवर्तन की गूंज देखी और 2011 में बंगाल की राजनीति बदल गई. ममता बनर्जी सत्ता में आईं तो एक बड़ा फैसला लिया गया. सचिवालय को मुझसे हटाकर नबन्ना ले जाया गया. धीरे-धीरे मेरे कमरे खाली होने लगे. उन गलियारों में सन्नाटा उतर आया, जहां कभी सत्ता की आवाज गूंजती थी. मैंने खुद को पहली बार अकेला महसूस किया, पर मैं चुपचाप सब देखता रहा और सोचता रहा कि क्या मेरा वक्त खत्म हो गया है?

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मैं बंगाल की यादों में बसा हूं

फिर मुझे समझ आया कि मेरी ताकत सिर्फ प्रशासन नहीं थी. मैं याद बन चुका था. लोग मुझे देखने आते थे. मेरी तस्वीरें खींचते थे. मेरे सामने विरोध प्रदर्शन के लिए जुटते थे. मेरे इतिहास को याद करते थे.

मैं समझ गया कि दशकों तक मैं यूं ही अकेले नहीं खड़ा था. अब मैं केवल एक दफ्तर नहीं रहा, मैंने बंगाल की आवाम के जेहन में अपनी जगह बनाई है. मेरी दीवारों में केवल खामोशी नहीं बल्कि इतिहास का वो खजाना छिपा है जो किताबों में भी नहीं मिलेगा.

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मैंने हर दौर का चेहरा देखा है

मैंने ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार को पसरते देखा, ब्रिटिश राज के अहंकार को पनपते देखा, क्रांतिकारियों की गोलियां चलते देखा, आवाम में आजादी का उत्हास देखा, वामपंथ की विचारधारा देखी और 34 साल के वामपंथ से ममता बनर्जी तक होता बदलाव देखा और अब मैं बंगाल की राजनीति में दक्षिणपंथ के प्रवेश को देख रहा हूं. मुझे फिर से सचिवालय के लिए तैयार किया जा रहा है. 

यानी मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. आज फिर से मेरी चर्चा हो रही है. मैं फिर से मुस्कुरा रहा हूं क्योंकि सत्ता फिर मेरे गलियारे में लौट रही है और नए हुक्मरान बंगाल की राजनीति के आईने के रूप में मेरी अहमियत को पहचानते हुए मेरा सम्मान लौटा रहे हैं. 

मैंने शासन की महत्वाकांक्षा को देखा है. नियम कायदे बनते देखा है. अंग्रेजों का अहंकार देखा है तो भारतीय जनता का गुस्सा देखा है. मैंने क्रांति और प्रशासन दोनों को पनाह दी है और मैं आज भी वहीं खड़ा हूं. क्योंकि मैं हूं Writers' Building. वही राइटर्स बिल्डिंग जो बंगाल की राजनीति की आत्मा है.

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