तृणमूल कांग्रेस में टूट के बाद बनी परिस्थितियों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. पार्टी के विधायक दल और संसदीय दल, दोनों में ही विभाजन हो गया है. बंगाल में टूटे विधायक दल को विधानसभा स्पीकर ने अलग गुट के रूप में मान्यता दे दी है, लेकिन लोकसभा में इस पर अभी फैसला होना बाकी है. सबसे पहले लोकसभा के तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने एक-एक करके इस्तीफा देना शुरू किया. जब इनकी संख्या 20 तक पहुंच गई तो सोमवार को उन्होंने अपनी पार्टी का नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर दिया. अब इस पर बहस छिड़ गई है कि यह कदम सही है या गलत और क्या इन बागी सांसदों पर दल-बदल कानून लागू होगा.
इस मुद्दे पर लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य का कहना है कि संविधान की दसवीं अनुसूची और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों के अनुसार, जब तक मूल पार्टी किसी अन्य पार्टी में विलय नहीं करती, तब तक इसे वैध विलय नहीं माना जाएगा. यदि किसी पार्टी का बागी गुट, भले ही उसकी संख्या दो-तिहाई ही क्यों न हो, अपने स्तर पर किसी अन्य पार्टी में विलय करता है, तो वह मान्य नहीं होगा और उनकी सदस्यता जा सकती है.
'भ्रम फैलाया जा रहा है कि दो-तिहाई गुट अपने आप विलय कर सकता'
आचार्य ने आगे कहा कि लोकसभा अध्यक्ष बागी सांसदों से सबसे पहले पूछेंगे कि क्या मूल पार्टी ने विलय किया है या नहीं. उन्होंने साफ किया कि यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि दो-तिहाई गुट अपने आप विलय कर सकता है, जबकि कानून कहता है कि मूल पार्टी का विलय जरूरी है और उसमें दो-तिहाई समर्थन होना चाहिए. हालांकि, इस पर अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष का ही होगा.
अब सवाल यह भी उठ रहा है कि राज्यसभा में जब आम आदमी पार्टी के कुछ सदस्य टूटकर बीजेपी में शामिल हुए तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई. इस पर कहा गया कि यह राज्यसभा चेयरमैन का फैसला था और नियमों के अनुसार कोई भी पार्टी तुरंत अदालत नहीं जा सकती. तीन महीने के भीतर संबंधित पक्ष को नोटिस भेजना होता है और जवाब मिलने के बाद ही अदालत का रुख किया जा सकता है. माना जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस भी इस मामले में आगे अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है.
ऐसे मामलों में स्पीकर का फैसला अहम
पीडीटी आचार्य के अनुसार, शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस के मामलों में फर्क है. शिवसेना में संसदीय दल के साथ-साथ मूल पार्टी पर भी नियंत्रण की लड़ाई थी, जबकि यहां मामला अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है. यह विवाद चुनाव आयोग और फिर अदालत तक जा सकता है. जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में स्पीकर का फैसला अहम होता है और अदालत में प्रक्रिया लंबी चलती है, जिससे कई बार कार्यकाल ही खत्म हो जाता है.
लुटियंस दिल्ली की राजनीतिक गतिविधियों की बात करें तो माना जा रहा है कि शिवसेना और एनसीपी के मुकाबले तृणमूल की स्थिति अलग है और आगे इसमें कई और मोड़ आ सकते हैं. यह भी कहा जा रहा है कि यह केवल शुरुआत है और आने वाले समय में अन्य दलों में भी इस तरह की परिस्थितियां देखने को मिल सकती हैं.
ये भी पढ़ें : 'मेलोडी मूमेंट' के बाद PM मोदी से मेलोनी की फिर मुलाकात, बोलीं- हम इंस्टा पर सबसे ज्यादा वायरल
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं