पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की तरफ से भारत में मुस्लिम धर्मस्थलों को लेकर दिए गए विवादित बयान पर विदेश मंत्रालय ने फटकार लगाई है. भारत ने जरदारी के इस बयान को पूरी तरह से बेतुका, भ्रामक और नफरत से प्रेरित जानबूझकर किया गया राजनीतिक हमला बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान को भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने या टिप्पणी करने का कोई कानूनी या नैतिक अधिकार नहीं है.
पाकिस्तान राष्ट्रपति ने वाराणसी की ऐतिहासिक मस्जिद गंज शहीदा और भारत के अन्य मुस्लिम स्थलों पर कथित खतरे और डिमोलिशन को लेकर एक्स पर पोस्ट किया था. भारत ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इस्लामाबाद को आईना दिखाया है और उसके अपने देश के खराब मानवाधिकार रिकॉर्ड की याद दिलाई है.
Our response to media queries regarding comments made by the President of Pakistan ⬇️
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) June 20, 2026
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खुद के गिरेबां में झांके पाकिस्तान: विदेश मंत्रालय
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक आधिकारिक बयान जारी कर पाकिस्तानी राष्ट्रपति के दावों की धज्जियां उड़ाईं. जायसवाल ने कहा, "भारत पाकिस्तान के राष्ट्रपति की ओर से की गई इन अनुचित और बेबुनियाद टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज करता है. उन्हें भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई हक नहीं है."
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस बात पर गहरा आश्चर्य और तंज जताया कि जो देश खुद अपने यहां अल्पसंख्यकों के अधिकारों को पैरों तले कुचल रहा है, वह दूसरों को नसीहत दे रहा है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का अपना मानवाधिकार रिकॉर्ड बेहद घिनौना और निराशाजनक रहा है. ये आज पूरी दुनिया के सामने आ चुका है.
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर जुल्म जगजाहिर
विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान की असलियत से पर्दा हटाते हुए कहा कि वहां अलग-अलग धर्मों के अल्पसंख्यकों को लगातार निशाना बनाने और उन्हें प्रताड़ित करने का एक लंबा और बदनाम इतिहास रहा है. ऐसे में पाकिस्तान के राष्ट्रपति का यह बयान सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने और अपनी कट्टरता और नफरत की राष्ट्रीय नीतियों को बढ़ावा देने की एक सोची-समझी कोशिश है.
वैश्विक मानवाधिकार संगठनों और गैर-सरकारी संस्थाओं (NGOs) की रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती हैं. पाकिस्तान में लंबे समय से हिंदुओं, ईसाइयों और अहमदिया समुदाय के खिलाफ लगातार मजहबी हिंसा होती रही है. ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी अपनी रिपोर्टों में माना है कि पाकिस्तान में भेदभावपूर्ण कानूनों और सरकारी उदासीनता के चलते अल्पसंख्यकों के खिलाफ ईशनिंदा के नाम पर हिंसा थपने का नाम नहीं ले रही है.
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