- मद्रास हाई कोर्ट ने बिहार की एक एमबीबीएस छात्रा को फीस भुगतान विवाद में सर्टिफिकेट जारी करने से रोका है
- छात्रा की फीस माओवादी संगठन से जुड़े अवैध फंड से भरी गई थी जिसे एनआईए ने जब्त कर लिया था
- छात्रा के परिवार के सदस्यों पर अवैध फंडिंग के आरोप हैं जबकि छात्रा स्वयं आरोपी नहीं है और उसका रिकॉर्ड साफ है
मद्रास हाई कोर्ट ने बिहार की एक MBBS स्टूडेंट को लेकर बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. इस MBBS स्टूडेंट की कॉलेज फीस कथित तौर पर एक प्रतिबंधित माओवादी संगठन से जुड़े फंड से भरी गई थी. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि स्टूडेंट अपने मेडिकल कॉलेज को कोर्स पूरा होने और MBBS डिग्री का सर्टिफिकेट जारी करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती. जब तक कि फीस का भुगतान साफ-सुथरे और वैध तरीकों से दोबारा न किया जाए. डिवीजन बेंच ने कहा कि हालांकि आम तौर पर फीस से जुड़े विवादों के कारण एजुकेशनल सर्टिफिकेट नहीं रोके जा सकते, लेकिन यह मामला बिल्कुल अलग था. फीस के तौर पर जमा की गई मूल रकम को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने अपराध से हासिल हुई कमाई मानकर जब्त कर लिया था.
:छात्रा ने क्या मांग की थी
कोर्ट ने बिहार की रहने वाली पूजा कुमारी की अपील खारिज कर दी, जिन्होंने चेट्टिनाड एकेडमी ऑफ रिसर्च एंड एजुकेशन से अपना MBBS कोर्स और ज़रूरी इंटर्नशिप पूरी की थी. उन्होंने कॉलेज को निर्देश देने की मांग की थी कि वे फीस का दोबारा भुगतान करने की जिद किए बिना उन्हें कोर्स पूरा होने का सर्टिफिकेट और MBBS डिग्री सर्टिफ़िकेट जारी करें.
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कैसे आया माओवादी फंड
फैसले के मुताबिक, कॉलेज को कुल 1.13 करोड़ रुपये की फीस चुकाने के बाद छात्रा ने पांच साल का MBBS कोर्स और इंटर्नशिप पूरी कर ली थी. हालांकि, 'गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA) के तहत जांच के दौरान, NIA ने आरोप लगाया कि यह पैसा प्रतिबंधित 'कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी)' के लिए जबरन वसूली से इकट्ठा किया गया था. इसके बाद एजेंसी ने कॉलेज से पूरी रकम जब्त कर ली, जिससे छात्रा की पढ़ाई की फस का भुगतान नहीं हो पाया. चार्जशीट में आरोप लगाया गया है कि छात्रा का भाई और चाचा इस अवैध फंड को इकट्ठा करने में मुख्य रूप से शामिल थे. छात्रा को खुद आरोपी नहीं बनाया गया है.
हालांकि, मौजूदा मामले को अलग मानते हुए बेंच ने कहा, "यह मामला तथ्यों के लिहाज से बहुत ही असाधारण और पेचीदा है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, टेररिस्ट फंडिंग और आपराधिक संपत्ति जब्त करने जैसे मुद्दे शामिल हैं." बेंच ने आगे कहा, "छात्रा किसी अपराध से हुए फायदे का हक नहीं जता सकती." साथ ही यह भी कहा कि जब NIA ने फीस की रकम जब्त कर ली, तो कॉलेज में छात्रा का अकाउंट कानूनी तौर पर 'बिना भुगतान' वाली स्थिति में आ गया.
छात्रा के पास अब क्या विकल्प
बेंच ने कहा कि अगर छात्रा का दावा है कि पैसे सही तरीके से कमाए गए थे, तो उसके पास यह उपाय है कि वह NIA के पास जब्त किए गए पैसे को वापस पाने के लिए संबंधित स्पेशल कोर्ट में जाए. इसके अलावा, वह कानूनी तरीके से कमाए गए पैसे से फीस चुकाकर अपने एजुकेशनल सर्टिफिकेट वापस पाने के लिए भी स्वतंत्र है. फैसले से यह साफ नहीं है कि फीस भरते समय वह मेडिकल छात्रा नाबालिग थी या नहीं, या उसे अपनी पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किए गए कथित अवैध पैसे के बारे में पता था या नहीं. अगर उसे लगता है कि उसका कानूनी पक्ष मजबूत है, तो यह विवाद एक लंबी कानूनी लड़ाई में बदल सकता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ही उसका अगला और आखिरी कानूनी रास्ता होगा.
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