- बुलढाणा जिले के लोणार सरोवर में पिछले कुछ महीनों से जलस्तर में लगभग पंद्रह से बीस फीट की वृद्धि हुई है
- जलस्तर बढ़ने के कारण सरोवर के तट पर स्थित कई प्राचीन मंदिर जलमग्न हो गए हैं और जैव विविधता खतरे में है
- मीठे पानी के स्रोतों के मिल जाने से लोणार सरोवर की क्षारीय प्रकृति प्रभावित हो रही है
महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के विश्व प्रसिद्ध लोणार सरोवर के जलस्तर में लगातार वृद्धि होने की चौंकाने वाली खबर सामने आई है. जलस्तर बढ़ने के कारण सरोवर की जैव-विविधता को उत्पन्न हुए खतरे को देखते हुए, मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने इस मामले का गंभीर संज्ञान लिया है. अदालत ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका (PIL) दर्ज करने के आदेश दिए हैं. पिछले सितंबर माह से लोणार सरोवर के जलस्तर में लगातार वृद्धि देखी जा रही है. सरोवर के चारों ओर स्थित मुख्य स्रोतों और झरनों से पानी का प्रवाह लगातार जारी है, जिससे अनुमान है कि जलस्तर लगभग 15 से 20 फीट बढ़ गया है.

पानी बढ़ने के कारण सरोवर के तट पर स्थित महादेव के कई प्राचीन मंदिर जलमग्न हो गए हैं. विश्व प्रसिद्ध कमलजा माता मंदिर के गर्भगृह में भी पानी घुस गया है. मंदिर के सामने स्थित दीपस्तंभ, जो पहले पूरी तरह दिखाई देता था, अब आधा पानी में डूब चुका है. पर्यावरणविदों के अनुसार, लोणार एक खारे पानी की झील है. पिछले 3-4 महीनों से मीठे पानी के स्रोतों के इसमें मिलने से इसकी क्षारीय विशेषता खतरे में पड़ गई है. हैरानी की बात यह है कि अब इस पानी में मछलियां भी दिखने लगी हैं, जो खारे पानी के सरोवर की प्राकृतिक संरचना के लिए हानिकारक हो सकता है.

उधर सरकारी आदेशानुसार, छत्रपति संभाजीनगर के भूजल विशेषज्ञ प्रोफेसर अशोक तेजनकर और तहसीलदार भूषण पाटिल ने सरोवर का निरीक्षण किया है. जलस्तर बढ़ने का सटीक वैज्ञानिक कारण अभी स्पष्ट नहीं हुआ है और इसके लिए गहन शोध की आवश्यकता बताई गई है. लेकिन, अब इस मामले में न्यायालय ने हस्तक्षेप किया है. मुंबई हाई कोर्ट की नागपुर बेंच के न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति राज वाकोडे की खंडपीठ ने इस स्थिति को गंभीरता से लिया है. न्यायालय ने एडवोकेट मोहित खजानची को 'एमिकस क्यूरी' (न्याय मित्र) नियुक्त किया है और उन्हें अगले सात दिनों में विस्तृत जनहित याचिका प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है.

उल्कापिंड के टकराने से निर्मित लोणार सरोवर वैश्विक अनुसंधान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. पर्यटकों के साथ-साथ दुनिया भर के शोधकर्ता इसका अध्ययन करने आते हैं. इसीलिए उच्च न्यायालय ने इस प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के लिए कड़ा रुख अपनाया है, जिसका पर्यावरण प्रेमियों ने स्वागत किया है.
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