लद्दाख में जल संरक्षण और खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. अब लेह के स्टॉक गांव नाले से आने वाले ग्लेशियर के पिघले पानी का बेहतर उपयोग किया जा रहा है. पहले यह पानी बिना इस्तेमाल के सिंधु नदी में बह जाता था, लेकिन अब प्रशासन ने इसे इगू-फे सिंचाई नहर की ओर मोड़ दिया है. अब प्रतिदिन करीब 9 करोड़ लीटर (90 मिलियन लीटर) ग्लेशियर का पानी सिंचाई के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है.
इस परियोजना का सीधा लाभ लेह क्षेत्र के लगभग 12 गांवों को मिल रहा है. सबसे बड़ी बात यह है कि पानी की कमी के कारण जो 1000 एकड़ से अधिक भूमि वर्षों से बंजर पड़ी थी, अब वहां खेती संभव हो सकेगी. स्थानीय किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलने से कृषि उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है.
कृषि पर निर्भर परिवारों को आर्थिक लाभ मिलेगा
ग्लेशियर के पानी का यह उपयोग न केवल खेती को मजबूती देगा, बल्कि क्षेत्र में जल सुरक्षा को भी बेहतर बनाएगा. इससे ग्रामीणों की आजीविका में सुधार होगा और कृषि पर निर्भर परिवारों को आर्थिक लाभ मिलेगा. लद्दाख प्रशासन की यह पहल पर्वतीय और शुष्क क्षेत्रों में जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन का एक सफल उदाहरण बन सकती है, जहां हर बूंद पानी की अहमियत होती है.
स्टोक नाला में मिली सफलता, पूरे केंद्र शासित प्रदेश में जल प्रबंधन क्रांति के लिए एक ब्लूप्रिंट का काम करती है. प्रशासन ने इगू-फे नहर प्रणाली के आस-पास ऐसी ही पहल के लिए कई अन्य जल-धाराओं की पहचान भी कर ली है, जिनमें माथो नाला, तुचिक चेनमो नाला, तुचिक चोन नाला और स्टकना नाला शामिल हैं.

10 क्यूसेक पानी का इस्तेमाल करने की योजना
स्टोक नाले से बहने वाले पानी की मात्रा, जो आगे चलकर सिंधु नदी में मिलती है, लगभग 36.60 क्यूसेक आंकी गई थी (1 क्यूसेक का मतलब है प्रति सेकंड 28.32 लीटर पानी, यानी 24 घंटे में लगभग 90 मिलियन लीटर पानी). हालांकि, स्टोक नाले से अतिरिक्त 26 क्यूसेक पानी को इगू-फे नहर में भेजने के लिए दो डायवर्जन बनाए गए हैं - 19 क्यूसेक इगू गांव (अपस्ट्रीम) की ओर और 7 क्यूसेक फे गांव (डाउनस्ट्रीम) की ओर. बाकी बचे 10 क्यूसेक पानी का इस्तेमाल करने की योजना पर काम चल रहा है.
Union Territory of Ladakh has started utilising 90 million litres of glacier water per day, for sustainable water and agricultural security in Ladakh.
— ANI (@ANI) August 20, 2026
Previously lost as untapped runoff into the River Indus, this volume of glacial-melt water from Stok village Nallah in Leh, is… pic.twitter.com/iguWufV6qG
खास बात यह है कि 43 किलोमीटर लंबी इगू-फे नहर का निर्माण 1979 में शुरू हुआ और 2005 में पूरा हुआ. उस दौरान, नहर का लगभग 200 मीटर हिस्सा ज़मीन के नीचे बनाया गया था ताकि स्टोक नाले का पानी नहर के बहाव में रुकावट डाले बिना उसके ऊपर से गुज़र सके. इससे पता चलता है कि जब 47 साल पहले यह प्रोजेक्ट सोचा गया था, तब पानी आसानी से उपलब्ध था. हालांकि, किसी ने भी इस पानी के स्रोत की क्षमता के बारे में नहीं सोचा और न ही इस ज़रूरी संसाधन का इस्तेमाल करके पानी की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम उठाया, जब तक कि LG सक्सेना ने नहर में भरपूर पानी भेजने की यह नई पहल शुरू नहीं की. दशकों तक हुई इस अनदेखी के कारण, नहर में बनने के बाद से ही हर साल पानी की कमी रही और आखिरकार यह बेकार हो गई.

ग्लेशियर जल को इगू-फे नहर की ओर मोड़ दिया
सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग ने जेसीबी मशीनों की मदद से दो खाइयां बनाकर अतिरिक्त ग्लेशियर जल को इगू-फे नहर की ओर मोड़ दिया. आकलन के अनुसार, स्टोक नाले से लगभग 36.6 क्यूसेक पानी बहता है, जिसमें से 26 क्यूसेक पानी को नहर में मोड़ा गया है. इसमें 19 क्यूसेक पानी इगू गांव और 7 क्यूसेक पानी फे गांव की ओर भेजा जा रहा है. शेष 10 क्यूसेक पानी के उपयोग की योजना भी बनाई जा रही है.
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