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हिमालय में क्यों तेजी से बन रही हैं ग्लेशियर झीलें? जानिए 28 हजार झीलों से कितना है खतरा

हिमालय में मौजूद ग्लेशियर झीलें बनने की वजह कई तरह की है. इसमें सबसे बड़ी वजह ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जलवायु परिवर्तन है और बढ़ता तापमान है. इसके साथ ही बड़े पैमाने पर फॉसिल फ्यूल के जलने और जंगलों में लगाने वाली आग से ब्लैक कार्बन भी ग्लेशियरों की सेहत खराब कर रहा है. इसके साथ ही ग्लेशियर पर झीलें बन रही है.

हिमालय में क्यों तेजी से बन रही हैं ग्लेशियर झीलें? जानिए 28 हजार झीलों से कितना है खतरा
सांकेतिक तस्वीर
NDTV

पूरे हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर ग्लेशियर पर पड़ रहा है. लगातार ग्लेशियर न सिर्फ पीछे हट रहे है बल्कि हिमालय पर मौजूद ग्लेशियरों पर झीलें भी बन रही है. हिमालय पर 28043 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं.  नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट में ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन, गंगा नदी बेसिन और सिंधु नदी बेसिन में रिसर्च की गई थी. जिसमें यह पाया गया कि तीनों नदी बेसिन में लगभग 28043 ग्लेशियर झीलें हैं. 

नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट में हाई रेजोल्यूशन सैटेलाइट डेटा का उपयोग कर ग्लेशियर पर मौजूद झीलों का रिकॉर्ड तैयार किया गया.

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नेपाल में आए जल प्रलय के बाद सभी का फोकस हिमालय के उन ग्लेशियर पर है जहां पर ग्लेशियर पर झीलें बनी हुई है . लगातार वैज्ञानिक मौजूद संवेदनशील और अति संवेदनशील झीलों की निगरानी कर रहे हैं. 

उत्तराखंड की अगर बात करें तो उत्तराखंड में लगभग 13 ऐसी ग्लेशियर झीलें हैं लेकिन इनमें पांच सबसे खतरनाक अति संवेदनशील झीलें हैं, अगर पूरे हिमालय क्षेत्र की बात करें तो पूरे हिमालय क्षेत्र में लगभग 28  हजार के करीब ग्लेशियर झीलें है. 

नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट में ग्लेशियर झीलें रिकॉर्ड की गई है. झीलों की लिस्ट ऐसे तैयार की गई है ताकि इनकी मॉनिटरिंग की जाए. इनमें कौन सी खतरनाक झीलें हैं, कौन सी बड़े आकार की है और किसी से भविष्य में होने वाले खतरे से बचा जा सकता है. 

इसके अलावा ऐसी कौन सी ग्लेशियर झीलें हैं जो भविष्य में बड़ा नुकसान कर सकती है उन सब की लिस्ट तैयार की गई है.  

नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट में गंगा ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी बेसिन का अध्ययन किया गया और उसमें ग्लेशियर झीलों की लिस्ट तैयार की गई. गंगा नदी बेसिन में लगभग 4707 ग्लेशियर झीलें हैं जिसमें गंडक, कोसी, शारदा ,अपर गंगा ,यमुना, घाघरा नदी बेसिन शामिल है, ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में लगभग 18001 ग्लेशियर झीलें हैं. इसमें अमो चुदिबांर दिहांग, जिया भरली, ल्हासा त्सांगपो, लोहित, लोअर यारलुंग त्सांगपो,मानस,पूना त्सांग चु, सुबनसिरी, तीस्ता,अपर यारलुंग त्सांगपो जैसी नदियां बेसिन है. 

सिंधु नदी बेसिन में लगभग 5335 ग्लेशियर लेक है,जिसमें ब्यास, चिनाब, गिलगित, सिंधु मिडिल ,सिंधु अपर, झेलम ,रावी, सतलुज,श्योक, नदी बेसिन शामिल है. 

पूरे हिमालय क्षेत्र में 28043 ग्लेशियर लेक में सबसे ज्यादा

  • 16106-Other Glacial Erosion Lake
  • 5664 - Other Moraine Dammed Lake
  • 1798-Other Glacial Lake
  • 1698- Supra glacial Lake
  • 1286 -Cirque Erosion Lake
  • 1058-  End-moraine Dammed Lake
  • 363 -Lateral Moraine Dammed Lake
  • 56-Lateral Moraine Dammed Lake with Ice
  • 09 -Glacier Trough Valley Erosion Lake
  • 05 -Glacier Ice-dammed Lake

हिमालय में मौजूद ग्लेशियर झीलें  बनने की वजह कई तरह की है. इसमें सबसे बड़ी वजह ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जलवायु परिवर्तन है और बढ़ता तापमान है. इसके साथ ही बड़े पैमाने पर फॉसिल फ्यूल के जलने और जंगलों में लगाने वाली आग से ब्लैक कार्बन भी ग्लेशियरों की सेहत खराब कर रहा है. इसके साथ ही ग्लेशियर पर झीलें बन रही है . 

सबसे ज्यादा खतरनाक झीलों में मोरेन डैम लेक होती गई. इसके बाद आइस ब्लॉक लेक,ग्लेशियर एरोजन लेक, सुपरागलेशियर लेक, सबग्लेशियर लेक होती है. 

वही मोरेन डैम झील ग्लेशियर के मलबे, मिट्टी और छोटे-छोटे कंकर होते है  और यह सब इन मैटेरियल से बनी दीवारें होती है जो बेहद ही कमजोर होती हैं और लगातार बढ़ते दबाव या भूकंप/भूस्खलन के कारण कभी भी टूट सकती हैं. 

इसके अलावा इस ब्लॉक लेक होती है जो आगे बढ़ते हुए ग्लेशियर किसी जलधारा या नदी को रोक देते हैं. तब इस तरह की झील बनती है उसके बाद सुपर ग्लेशियर लेक होती है,  जो ग्लेशियर के ऊपर छोटे-छोटे पानी के तालाब या पॉट्स में होते है, सबग्लेशियर लेक भी होती है जो ग्लेशियर के नीचे बनती है.

बढ़ रहा तापमान

वही ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान बढ़ रहा है. ऐसे में बढ़ते तापमान के कारण जलवायु परिवर्तन हुआ है और वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी वजह से इसका सीधा असर हिमालय के ग्लेशियर पर पड़ रहा है जब तापमान वायुमंडल का बढ़ रहा है. तो ऐसे में ग्लेशियर पर छोटे-छोटे पानी के स्पॉट्स बन जाते है. इसके अलावा ग्लेशियर का आकार भी छोटा हो रहा है. ग्लेशियर  पीछे खिसक रहे हैं और उनके आगे मोरेन डैम लेके बन जाती है. 

वहीं गलेशियर को फीडिंग नहीं हो पा रही है यानी ग्लेशियर पर पड़ने वाली बर्फ समय पर नहीं पड़ रही है और जब पड़ती है तो उसको फ्रीजिंग होने का टाइम नहीं मिल पाता क्योंकि वायुमंडल का तापमान बढ़ा हुआ हैं और पृथ्वी के सरफेस का तापमान भी बढ़ा हुआ है.

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