सुप्रीम कोर्ट में जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर हटाने के फैसले को चुनौती दी गई है. एक याचिका दाखिल कर कहा गया है कि इससे विरोध-प्रदर्शनों का असर कम हो सकता है. एक वकील की ओर से दायर इस याचिका में 11 अक्टूबर, 2026 के स्टैंडिंग ऑर्डर को चुनौती दी गई है. इसमें तर्क दिया गया है कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत गारंटीकृत बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी और शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है.
मालूम हो कि हाल ही में सरकार ने दिल्ली के जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह से हटा दिया है. सरकार ने रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी मैदान को विरोध-प्रदर्शन के लिए नोटिफाई किया है. सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है.
याचिका में क्या कहा गया?
याचिका में कहा गया है कि विरोध-प्रदर्शनों को दिल्ली के दूर-दराज़ इलाकों में ले जाने से प्रदर्शनकारियों पर बोझ बढ़ सकता है और वे उन अधिकारियों और संस्थाओं से दूर हो सकते हैं, जिनसे वे अपनी बात कहना चाहते हैं. इससे इन मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल बेअसर हो सकता है.
'आंखों से दूर, तो दिमाग से भी दूर' वाली आम कहावत का ज़िक्र करते हुए याचिका में तर्क दिया गया है कि अगर विरोध-प्रदर्शन उन लोगों से दूर हो जाए जिन तक बात पहुँचानी है, तो उसका व्यावहारिक असर काफ़ी हद तक कम हो सकता है.
याचिका में मनमाने ढंग से फैसला लेने और प्रक्रिया में कमियों के आधार पर भी इस फैसले पर सवाल उठाए गए हैं. इसमें बताया गया है कि भले ही जंतर-मंतर को तुरंत प्रशासनिक आदेश से विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर हटा दिया गया है, लेकिन विरोध-प्रदर्शन के लिए नई तय की गई तीन जगहों के लिए संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) अभी जारी नहीं किए गए हैं.
याचिका में कहा गया है कि इससे विरोध-प्रदर्शन के अधिकार का इस्तेमाल करने का तरीका अनिश्चित और अधूरा रह जाता है, जिससे इस स्टैंडिंग ऑर्डर को चुनौती दी जा सकती है.
प्रदर्शन अधिकारियों और लोगों का ध्यान खींचने का माध्यम
'मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए याचिका में तर्क दिया गया है कि विरोध करने का अधिकार सिर्फ़ किसी तय जगह पर इकट्ठा होने का अधिकार नहीं है.
याचिका में कहा गया है, "विरोध करने का अधिकार सिर्फ़ किसी तय जगह पर इकट्ठा होने का अधिकार नहीं है; यह अपनी शिकायतें बताने, असहमति ज़ाहिर करने और सरकारी अधिकारियों व आम जनता का ध्यान उन मुद्दों की ओर खींचने का अधिकार है जिन पर कार्रवाई की ज़रूरत है."
याचिका में आगे तर्क दिया गया है कि विरोध-प्रदर्शन की जगह कोई मामूली प्रशासनिक बात नहीं है, क्योंकि संबंधित संस्थाओं से इसकी नज़दीकी, जनता की पहुँच और जिन लोगों तक बात पहुँचानी है, उनकी नज़र में आना ये सब इसकी असरदारता पर सीधा असर डाल सकते हैं.
याचिका के अनुसार, प्रदर्शनों को दूर की जगहों पर ले जाने से शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने का मकसद काफ़ी हद तक कम हो सकता है, खासकर तब जब प्रदर्शनकारियों को उन अधिकारियों से दूर कर दिया जाए जिनसे वे अपनी शिकायतें कहना चाहते हैं.
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