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किसान की आपबीती से खुली किडनी कांड की काली कहानी, दिल्ली से कंबोडिया तक जुड़े तार, 16 गरीबों को बना चुके शिकार

सात समंदर पार तक फैले अंग तस्करी के एक खौफनाक सिंडिकेट का पर्दाफाश कर दिया है. लाचार लोगों के शरीर को अंतरराष्ट्रीय मुनाफाखोरों की भेंट चढ़ा दिया जाता है.

किसान की आपबीती से खुली किडनी कांड की काली कहानी, दिल्ली से कंबोडिया तक जुड़े तार, 16 गरीबों को बना चुके शिकार
  • चंद्रपुर के किसान की किडनी बेचने की मजबूरी से शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय अंग तस्करी रैकेट का पर्दाफाश हुआ है.
  • रैकेट की साजिश महाराष्ट्र से दिल्ली, तमिलनाडु, कंबोडिया और चीन तक फैली हुई है और इसमें कई डॉक्टर शामिल हैं.
  • गिरोह में दिल्ली के डॉ. रविंदर पाल सिंह, तमिलनाडु के गोविंदस्वामी और पंजाब के हिमांशु जैसे आरोपी जुड़े हुए हैं
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मुंबई:

महाराष्ट्र के चंद्रपुर की गलियों से उठी एक बेबस किसान की चीख ने केवल देश को ही नहीं झकझोरा, बल्कि सात समंदर पार तक फैले अंग तस्करी के एक खौफनाक सिंडिकेट का पर्दाफाश कर दिया है. इसे महज 'किडनी चोरी' का मामला कहना इस अपराध की गंभीरता को कम आंकना होगा. असल में यह इंसानी अंगों का वह क्रूर अंतरराष्ट्रीय बाजार है, जहां गरीबी और लाचारी का खुलेआम सौदा किया जाता है. चंद पैसों की खातिर मासूम और गरीब लोगों के शरीर को नोचने वाला यह काला धंधा अब एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय साजिश के रूप में सामने आया है, जिसकी जड़ें सीमाओं को लांघकर विदेशों तक फैली हुई हैं.

चीन और कंबोडिया, इंटरनेशनल लिंक 

इस पूरे खेल की शुरुआत हुई महाराष्ट्र के चंद्रपुर के नागभीड़ तहसील के एक सीमांत किसान रोशन कुडे के वायरल वीडियो से. रोशन ने स्थानीय साहूकारों से अपनी खेती के लिए 1 लाख रुपये का कर्ज लिया था. लेकिन साहूकारी का जाल ऐसा फैला कि ब्याज दरें आसमान छूने लगीं और यह कर्ज बढ़कर 74 लाख रुपये हो गया. कर्ज के बोझ और साहूकारों की धमकियों से तंग आकर रोशन को अपनी किडनी बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा. जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, पुलिस के भी होश उड़ गए. इस गोरखधंधे के तार महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव से निकलकर बिहार, दिल्ली, कोलकाता, तमिलनाडु, कंबोडिया और चीन तक जा पहुंचे हैं. जांच में एक चीनी सर्जन डॉ. चियांग का नाम सामने आया है, जो कंबोडिया में बैठकर इस रैकेट को चला रहा था. किडनी निकालने की सर्जरी अक्सर कंबोडिया के अस्पतालों में की जाती थी.

दिल्ली, पंजाब और तमिलनाडु, घरेलू लिंक

इस रैकेट में दिल्ली के नामी सर्जन डॉ. रविंदर पाल सिंह और त्रिची, तमिलनाडु के स्टार किम्स हॉस्पिटल के एमडी डॉ. गोविंदस्वामी का नाम मुख्य आरोपी के तौर पर आया है. आरोप है कि भारत में भी कई अवैध ट्रांसप्लांट इन्हीं डॉक्टरों की देखरेख में हुए.

चंद्रपुर किडनी रैकेट मामले में पंजाब का कनेक्शन मुख्य रूप से आरोपियों और पीड़ितों की पहचान के जरिए सामने आया है. जांच के दौरान यह पता चला है कि इस अंतरराष्ट्रीय गिरोह का सक्रिय सदस्य और आरोपी हिमांशु भारद्वाज पंजाब के मोहाली का निवासी है. पुलिस की तकनीकी जांच में यह बात भी उजागर हुई है कि हिमांशु भारद्वाज स्वयं एक किडनी डोनर था, जिसने आर्थिक तंगी के कारण सोशल मीडिया के माध्यम से गिरोह के सरगना कृष्णा से संपर्क किया था.

इसके अतिरिक्त, रैकेट के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले डॉ. रविंदर पाल सिंह के तार भी दिल्ली और पंजाब के चिकित्सा नेटवर्कों से जुड़े होने की बात पुलिस जांच में सामने आई है. पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या पंजाब के अन्य युवाओं को भी इसी तरह कंबोडिया या देश के अन्य हिस्सों में ले जाकर इस अवैध व्यापार का शिकार बनाया गया है.

कोलकाता और सोलापुर, एजेंट नेटवर्क

सोलापुर से डॉ. कृष्णा असली नाम मल्लेश नाम के एक फर्जी डॉक्टर को पकड़ा गया है, जो खुद कभी इस रैकेट का शिकार हुआ था और बाद में कमीशन के चक्कर में एजेंट बन गया.

कैसे होता था ये गोरखधंधा?

सोशल मीडिया पर किडनी डोनर कम्युनिटी जैसे ग्रुप्स के जरिए कर्ज में डूबे लाचार किसानों और युवाओं को फंसाया जाता था. डोनर को 5 से 8 लाख रुपये देने का वादा किया जाता, जबकि एक किडनी को 50 से 80 लाख रुपये में अमीर मरीजों अक्सर चीनी नागरिकों को बेचा जाता था. डोनर को पहले कोलकाता ले जाया जाता, वहां मेडिकल टेस्ट और होटल में रुकने की व्यवस्था होती, और फिर उन्हें कंबोडिया भेज दिया जाता था. कंबोडिया के अस्पतालों में किडनी निकाली जाती और महज 12 घंटे के भीतर वह अंग चीन में किसी क्लाइंट को ट्रांसप्लांट कर दिया जाता.

कितना बड़ा है दायरा?

चंद्रपुर पुलिस की SIT की कार्रवाई शुरू है! जांच में सामने आया है कि अब तक कम से कम 16 लोग अपनी किडनी इस रैकेट को बेच चुके हैं. किसान का वीडियो आए ही सबसे पहले 6 साहूकारों को पुलिस ने हिरासत में लिया. ये साहूकार किसानों को ऊंचे ब्याज पर कर्ज देकर उन्हें किडनी बेचने के लिए मजबूर करते थे. रैकेट के लिए शिकार तलाशने वाले 2 एजेंटों को गिरफ्तार किया गया है. 'डॉ. कृष्णा' (मल्लेश), इसे सोलापुर से गिरफ्तार किया गया था. यह खुद कभी किडनी बेचने का शिकार हुआ था और बाद में कमीशन के लिए एजेंट बन गया.

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हिमांशु भारद्वाज को चंडीगढ़ से गिरफ्तार किया गया था. इसने अपनी प्रेमिका की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी किडनी बेची और फिर इस धंधे में एजेंट के रूप में जुड़ गया. डॉ. रविंदर पाल सिंह (दिल्ली): इसे दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था, लेकिन फिलहाल अंतरिम जमानत पर है. डॉ. राजरत्नम गोविंदस्वामी (त्रिची): ये स्टार किम्स हॉस्पिटल का एमडी है और फिलहाल फरार है, तलाश में पुलिस टीमें तमिलनाडु भेजी गई हैं. जानकारी के अनुसार, इस अस्पताल में कई अवैध किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी की गईं।

आरोप है कि डॉ. रविंदर पाल सिंह को प्रति केस लगभग 10 लाख रुपये और डॉ. गोविंदास्वामी को 20 लाख रुपये मिलते थे. एक किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मरीजों से 50 से 80 लाख रुपये तक वसूले जाते थे. किडनी देने वाले गरीब किसानों या कर्ज में डूबे लोगों को केवल 5 से 8 लाख रुपये ही दिए जाते थे. चंद्रपुर पुलिस अधीक्षक ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच टीम (SIT) का गठन किया है, जो पूरे रैकेट की कड़ियां जोड़ने में जुटी है.

क्या है कंबोडिया कनेक्शन?

चंद्रपुर किडनी रैकेट के तार कंबोडिया से जुड़ने के बाद अंदेशा साइबर स्लेवरी के प्रताड़ित पीड़ितों की कहानियों से भी तार जुड़ते दिखते हैं. नौकरी के झांसे में आकर कंबोडिया पहुंचने वाले भारतीय युवाओं को वहां केवल साइबर अपराध के लिए मजबूर ही नहीं किया जाता था, बल्कि विरोध करने पर उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर उनकी किडनियां तक निकाल ली जाती थीं. कंबोडिया से छूटकर भारत लौटे साइबर स्लेवरी के शिकार कुछ पीड़ितों ने ऐसी ही कंबोडिया के मिलिट्री अस्पताल में ट्रांसप्लांट सर्जरी का ज़िक्र किया था, जिसका ज़िक्र चंद्रपुर किडनी रैकेट में भी हो रहा है. पुलिस को संदेह है कि इसमें और भी कई बड़े अस्पताल और प्रभावशाली लोग शामिल हो सकते हैं, जिसकी जांच जारी है.

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