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This Article is From Mar 12, 2021

मोदी सरकार में महंगाई काबू में रही, 4 साल के आंकड़ों का दिया हवाला

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति अक्टूबर 2016 से मार्च 2020 की अवधि में औसतन 3.9 प्रतिशत रही है. यह चार फीसदी के लक्ष्य से कम है. 

मोदी सरकार में महंगाई काबू में रही, 4 साल के आंकड़ों का दिया हवाला
Inflation को लेकर बैंक ऑफ अमेरिका ने जारी की रिपोर्ट
मुंबई:

मोदी सरकार के पिछले चार साल में महंगाई काबू में रही है. यह चार फीसदी के अनुमानित लक्ष्य से नीचे है. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति अक्टूबर 2016 से मार्च 2020 की अवधि में औसतन 3.9 प्रतिशत रही है. यह चार फीसदी के लक्ष्य से कम है. 

बैंक ऑफ अमेरिका की रिपोर्ट में कहा गया है कि 5 साल बाद रिजर्व बैंक एक बार फिर अपनी मौद्रिक नीति व्यवस्था की समीक्षा करने जा रहा है. आरबीआई गवर्नर की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति 31 मार्च तक नीतिगत ढांचे और मुद्रास्फीति लक्ष्य की समीक्षा करने की तैयारी कर रही है. ऐसे में ये आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण है. जून 2016 में आरबीआई ने पहली बार मुद्रास्फीति को 2 प्रतिशत की घट-बढ़ के साथ चार फीसदी पर स्थिर रखने का लक्ष्यदिया गया था.

इसके बाद यह पहली बार रिजर्व बैंक इसकी समीक्षा करेगा. बैंक आफ अमेरिका (बोफा) सिक्युरिटीज ने रिजर्व बैंक के आंकड़ों का हवाला देते हुये कहा कि न केवल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति औसतन 3.9 प्रतिशत रही, बल्कि इसमें उतार-चढ़ाव भी 1.4 फीसदी के ऊपर नीचे रहा. ये आंकड़े अक्टूबर 2016 से मार्च 2020 की अवधि के हैं. इससे पहले 2012 से 2016 के दौरान मुद्रास्फीति में घट-बढ़ का दायरा 2.4 फीसदी तक रहा था.

बैंक आफ अमेरिका सिक्युरिटीज के अर्थशास्त्री इंद्रनिल सेन गुप्ता और आस्थ गुडवानी का मानना है कि अगले वित्त वर्ष 2021- 22 में सीपीआई मुद्रास्फीति औसतन 4.6 प्रतिशत पर रहेगी. यह चालू वित्त वर्ष 2020-21 के 6.2 प्रतिशत से कम होगी. इस प्रकार यह रिजर्व बैंक के मौजूदा तय दायरे 2 से 6 प्रतिशत के भीतर ही रहेगी. फरवरी 2021 में उनका मानना है कि सीपीआई का आंकड़ा 4.8 प्रतिशत रह सकता है जो कि जनवरी में 4.1 प्रतिशत पर था

 यह वृद्धि प्रतिकूल तुलनात्मक आधार और बढ़ते खाद्य और ईंधन मुद्रास्फीति की वजह से हुई है.मुद्रास्फीति लक्ष्य के बारे में अर्थशास्त्रियों का मानना है कि संशोधित रूपरेखा भी निचले स्तर पर 2 प्रतिशत और उच्च स्तर पर 6 प्रतिशत के दायरे में बनी रहेगी. यह छह प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है क्योंकि ऐसा होने से वित्तीय स्थिरता और वृद्धि पर प्रभाव पड़ सकता है.

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