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'ये हमारा सहारा हैं', उज्जैन में हनुमान जी के लिए रो रहीं महिलाएं; मंदिर टूटा तो और बढ़ गई भक्तों की भीड़

करीब 150 से 170 साल पुराने ऐतिहासिक 'खड़े हनुमान मंदिर' की दीवारें और गुंबद सड़क निर्माण के दायरे में आने के कारण ढहा दिए गए हैं, लेकिन मंदिर के स्थान पर खुले आसमान और केनोपी के नीचे विराजे खड़े हनुमान जी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए.

खड़े हनुमान की प्रतिमा हटाने के लिए प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं.
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नई दिल्ली:

मध्य प्रदेश के उज्जैन के कंठाल चौराहा, छत्रीचौक मार्ग के चौड़ीकरण के दायरे में आ रहे खड़े हनुमान अपनी जगह से टस से मस होने को तैयार नहीं हैं. गुरुवार रात 11 बजे से निगम अमले ने प्रतिमा की शिफ्टिंग शुरू की, लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली थी. नुकसान से बचाने के लिए प्रतिमा को पॉलीथिन से पैक करने के बाद फिर से पैकिंग खोली गई. फिलहाल प्रतिमा अपनी जगह पर ही है. बस हनुमान जी केनोपी के नीचे विराजे हैं. 

दरअसल, करीब 150 साल से ज्यादा पुराने खड़े हनुमान मंदिर से पूरे शहर का आस्था भरा जुड़ाव है. ऐसा कोई भी सनातनी नहीं होगा, जो अपने जीवनकाल में बाबा के दर पर एक बार नहीं पहुंचा होगा. झाड़ा लगाने के लिए तो रोजाना ही सैकड़ों लोगों की कतार लगी रहती है. सिंधिया स्टेट के जमाने से स्थापित यह प्रतिमा दिव्य है. 

मंदिर का गुंबद और दीवारें टूट चुकी हैं. आसपास के स्थल को साफ कर दिया है. इस मंदिर के स्थान पर मूर्ति ही खड़ी है. शाम को रोज की तरह हनुमान जी का पूजन उसी स्थान पर हुआ. आरती के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन और हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता उपस्थित थे. 

वहीं, मंदिर पर प्रशासन की कार्रवाई को लेकर महिलाओं में जबरदस्त गुस्सा देखने को मिल रहा है. महिलाएं रो रही हैं. एक महिला ने रोते हुए कहा कि हम अपने भगवान को कहीं नहीं जाने देंगे. उन्होंने कहा कि ये कहीं नहीं जाने चाहिए, ये गरीबों का सहारा है.

फिलहाल रोका गया शिफ्टिंग का काम

हालांकि लोगों का कहना था कि लोगों की भावना को देखते हुए महाकाल सवारी के बाद हनुमान जी को शिफ्ट करना चाहिए. यही कारण है प्रतिमा शिफ्टिंग का काम रोक दिया गया. महाकाल सवारी भी निकल चुकी है अब फिर से काम शुरू होगा.

जमीन पर खड़े हनुमानजी की प्रतिमा 8 फीट ऊंची है. प्रतिमा को बगैर सहारे के खड़ा रखने के लिए प्रतिमा का हिस्सा शिला पर खड़ा किया गया है. 4 से 5 फीट की शिला जमीन के नीचे है. जमीन से प्रतिमा निकालने के लिए आसपास की खुदाई फिर से की जाएगी.

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खड़े हनुमान 'डॉक्टर', उनका मंदिर 'एम्स'!

भक्तों के लिए ये सिर्फ मंदिर या प्रतिमा हटाने का मामला नहीं है. बल्कि अब ये मुद्दा आस्था और चमत्कार के नाम पर चर्चा में है. दरअसल यहां खड़े हनुमान को ‘डॉक्टर हनुमान' कहा जाता है. जबकि हनुमान जी के इस मंदिर को 'उज्जैन का एम्स' कहा जाता है. क्योंकि कहते हैं यहां माथा टेकने पर कई मरीजों का इलाज हो जाता है. मान्यता है कि यहां बच्चों और बीमार लोगों की मन्नतें पूरी होती हैं.

पुजारी महेश बैरागी के मुताबिक मंदिर में पिछले कई सालों से छोटे बच्चों को झाड़नी दी जाती है और ताबीज बांधे जाते हैं. पुजारी का दावा है कि इससे कई बीमार बच्चों को फायदा मिला है.

दिलचस्प बात है कि इस मंदिर में सिर्फ हिंदू ही नहीं, कहते हैं यहां मुस्लिम भी मन्नत मांगने आते हैं. जिन परिवारों में संतान नहीं होती या जो किसी बीमारी से परेशान हैं. वे यहां मन्नत मांगते हैं, और दावा है कई लोगों की मुरादें पूरी होती हैं. ये मंदिर कंठाल चौराहे से छत्री चौक यानी बड़ा सराफा मार्ग पर बना है.

स्थानीय लोग और पुजारी इसे 170 साल पुराना मंदिर बता रहे हैं. विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ डॉ रमण सोलंकी के मुताबिक, खड़े हनुमान जी की ये प्रतिमा 1000 साल पुरानी भी हो सकती है.

पुजारी ने एक बच्चे के बारे में कहा कि उसका लिवर ट्रांसप्लांट होना था. परिवार एयर एंबुलेंस से बच्चे को दिल्ली ले जाने की कोशिश में था. लेकिन हर बार उस बच्चे की तबीयत बिगड़ जाती थी. परिवार मंदिर आया और बच्चे को भगवान का ताबीज बांधा गया. इसके बाद एयर एंबुलेंस से दिल्ली ले गए और लीवर ट्रांसप्लांट हुआ.

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मूर्ति हटाने में तकनीक अड़चनें क्या?

प्रतिमा के ना हटने के पीछे वैज्ञानिक और तकनीकी पहलू भी हैं. इसके पीछे प्राचीन मूर्ति का निर्माण और उसकी स्थापना है. ऐसे में प्रशासन के लिए बिना खंडित किए इसे हटाना चुनौती है.

  • इंटरलॉक तकनीक: विक्रम यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विशेषज्ञ डॉ रमण सोलंकी के मुताबिक, ये प्रतिमा भी इंटरलॉक तकनीक से स्थापित किये जाने की संभावना है. इस प्राचीन भारतीय तकनीक को 'खांचा पद्धति' भी कहा जाता है. जिसमें पत्थरों को एक-दूसरे के खांचों में फंसाकर जोड़ा जाता है. इस दौरान किसी तरह के गारे या सीमेंट का इस्तेमाल नहीं होता है. जब तक इंटरलॉकिंग के मुख्य जोड़ को अनलॉक नहीं किया जाता. तब तक ऊपर से कितना भी खींचो, वो अपनी जगह से अलग नहीं होती. बल्कि दबाव डालने पर पत्थरों के खांचे आपस में और कसते चले जाते हैं
  • एक ही चट्टान से निर्माण: उन्होंने बताया कि प्रतिमा मालवा क्षेत्र के मजबूत बेसाल्ट पत्थर की है. परमार वंश और राजा भोज के समय ऐसे पत्थरों पर कलाकृतियां बनाते थे. विशेषज्ञ मानते हैं ये प्रतिमा एक बड़ी चट्टान से बनाई गई हो सकती है. और इसका निचला हिस्सा जमीन में मौजूद चट्टानों से जुड़ा हो सकता है. अगर ऐसा है तो फिर चट्टान को काटे बिना अलग नहीं किया जा सकता. अगर क्रेन से खींचा जाएगा तो प्रतिमा के खंडित होने का खतरा है.
  • 3D नक्शा मददगार: प्रतिमा को हटाने के लिए वैज्ञानिक और एडवांस तकनीक जरूरी है. इसीलिए तो उज्जैन प्रशासन ने इंदौर IIT की टीम को बुलाया था. IIT एक्सपर्ट्स की टीम ने करीब 2 घंटे तक तक जानकारी जुटाई. विशेष उपकरणों से प्रतिमा की जमीन में गहराई और संरचना देखी. टीम अब GPR यानी ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार तकनीक इस्तेमाल कर रही है. ये रडार जमीन में तरंगें भेजकर बिना खुदाई किए नीचे का 3D नक्शा बनाएगा. जिससे नींव की गहराई, इंटरलॉक जोड़ और चट्टान का पता चलेगा. IIT की रिपोर्ट के बाद प्रतिमा को कैसे हटाया जाए इस पर फैसला होगा.
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