सड़कों पर सरपट दौड़ती इलेक्ट्रिक गाड़ियां यानी ईवी (EV) तो आजकल हम सब रोज देखते हैं. लेकिन जरा सोचिए, अगर यही खामोश तकनीक हमारी सेना के लिए एक 'ब्रह्मास्त्र' बन जाए तो? आज हम आपको एक ऐसे नए भारत की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जहां हमारी युवा सोच ने इलेक्ट्रिक तकनीक को एक अलग ही मुकाम पर पहुंचा दिया है.
दुश्मन की नाक के नीचे से गुजरने वाली 'खामोश' गाड़ी
हम बात कर रहे हैं बेंगलुरु के एक स्टार्टअप की. इन्होंने कोई आम गाड़ी नहीं, बल्कि एक खास 'टैक्टिकल इलेक्ट्रिक व्हीकल' तैयार किया है. इसे सीधे तौर पर हमारी सेना के जांबाजों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है. जंग के मैदान में सिर्फ रफ्तार काम नहीं आती; वहां फौलादी इरादे और हर मुश्किल रास्ते को चीरने का दम चाहिए.
इस स्वदेशी गाड़ी की सबसे बड़ी खासियत है इसकी 'खामोशी'. यह पेट्रोल या डीजल वाली गाड़ियों की तरह जरा भी शोर नहीं मचाती. जब यह दुश्मन के इलाके से गुजरेगी, तो उसकी नाक के नीचे से निकल जाएगी और दुश्मन को कानों-कान खबर तक नहीं होगी.
इतना ही नहीं, इस खामोश योद्धा में एक 'जादुई' स्टील बटन दिया गया है, जो दुश्मन की आंखों में धूल झोंकने का काम करता है. यह एक स्टेल्थ मोड (Stealth Mode) है. इसे दबाते ही अंदर की सारी स्क्रीन्स एकदम डल हो जाती हैं, बाहर की लाइटें बुझ जाती हैं, यहां तक कि एयर कंडीशनिंग के पंखे की आवाज भी न के बराबर रह जाती है. मकसद सिर्फ एक है- अंधेरे में खुद को पूरी तरह से छिपा लेना. न कोई रोशनी, न कोई आवाज, दुश्मन गलती से भी इसे पकड़ नहीं सकता.
कमाल की बात ये है कि सिर्फ तकनीक ही नहीं, इसे बनाने वाली टीम भी पूरी तरह से देसी है. इसके सॉफ्टवेयर से लेकर डिजाइन तक, सब कुछ यहीं भारत में विकसित किया गया है.
पुरानी से बना रहे नई बैटरी
अब कहानी के दूसरे पहलू पर आते हैं. इलेक्ट्रिक गाड़ियां तो खूब आ रही हैं, लेकिन जब इनकी बैटरियां पुरानी हो जाती हैं, तो उनका क्या? अगर उन्हें यूं ही फेंक दिया जाए, तो वो कचरा नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए एक टिक-टिक करता बम बन जाएंगी. इस मुसीबत को एक शानदार मौके में बदला है नोएडा के एक स्टार्टअप ने. ये लोग पुरानी और बेकार बैटरियों को फेंकने के बजाय, उनसे 'खजाना' निकाल रहे हैं.
इसकी शुरुआत लैब से होती है. सबसे पहले पुरानी बैटरियों के सैंपल्स की जांच होती है कि किसमें कितना लिथियम, कोबाल्ट या निकेल है. इसके बाद इन्हें बड़ी सावधानी से खोला जाता है और भारी मशीनों में पीसा जाता है. पीसने के बाद एक खास काला पाउडर निकलता है, जिसे 'ब्लैक मास' (Black Mass) कहते हैं.
यह कोई आम धूल नहीं है. इसी काले पाउडर से शुद्ध लिथियम कार्बोनेट, कोबाल्ट और निकेल जैसी बेहद कीमती धातुएं वापस निकाली जाती हैं. सोचिए, जिन धातुओं को खरीदने के लिए हमें विदेशी मुद्रा पानी की तरह बहानी पड़ती थी, आज वो हमारे ही देश के कचरे से निकल रही हैं. इससे न सिर्फ हमारा पर्यावरण बच रहा है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी ताकत मिल रही है.
तकनीक के मोर्चे पर अजेय होती सेना
आज का भारत सिर्फ यहीं नहीं रुक रहा. हमारी भारतीय सेना तेजी से भविष्य की तकनीकों को अपनाकर अपनी ताकत में इजाफा कर रही है. सेना अब सुरक्षित फैसले लेने के लिए 'एकम AI' और 'विद्युत AI' जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रही है.
दुश्मन पर पैनी नजर रखने और सटीक हमले के लिए 'स्वार्म ड्रोन' का जाल बिछाया जा रहा है. युद्ध अब तकनीक से जीते जाएंगे, इसलिए 6G, क्वांटम कंप्यूटिंग और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया जा रहा है. ब्रह्मोस मिसाइल, पिनाका रॉकेट लॉन्चर और K9 वज्र-T जैसी तोपें हमारी सरहदों को अभेद्य बना रही हैं.
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