विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की प्रक्रिया एक बहुत बड़ी घटना है, जो लंबे समय से चल रही है. उनका कहना है कि किसी एक घटना को इसका सीधा नतीजा मानना गलत हो सकता है, क्योंकि इसके लिए मौसम के सिस्टम और क्लाइमेट के बीच के अंतर को गहराई से समझना जरूरी है. सवाल केवल यह नहीं है कि मॉनसून के दौरान भारत में ज्यादा बारिश हो रही है, बल्कि यह है कि भारतीय राज्यों में यह बारिश किस तरह हो रही है.
महाराष्ट्र में भारी बारिश और बाढ़ की वजह क्या है
महाराष्ट्र में हो रही भारी बारिश को देखते हुए पुणे की पर्यावरणविद् हेमा चारी बताती हैं कि मौसम का यह अनिश्चित बर्ताव वही है, जिसकी भविष्यवाणी वैज्ञानिक लंबे समय से करते आ रहे हैं. वो कहती हैं,''बारिश के पैटर्न में बदलाव सबसे बड़ी चिंता की बात है. हम देख रहे हैं कि लंबे समय तक सूखा रहने के बाद अचानक कुछ समय के लिए बहुत तेज बारिश होती है. यह बात वैसी ही है जिसके बारे में वैज्ञानिक दशकों से चेतावनी देते आ रहे हैं. जैसे-जैसे वातावरण गर्म होता है, तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी के साथ यह करीब सात फीसदी ज्यादा जल-वाष्प सोख सकता है. इससे बहुत ज्यादा बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है."
चारी कहती हैं कि ऐसी घटनाएं अलग-थलग नहीं होतीं. हाल के सालों में, हमने केरल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र और गुजरात में बार-बार बहुत ज्यादा बारिश और बाढ़ की घटनाएं देखी हैं. हालांकि हर घटना के अपने-अपने मौसम संबंधी कारण होते हैं, लेकिन ये सभी मिलकर एक बड़े पैटर्न को दिखाते हैं. यह पर्यावरणविदों द्वारा गर्म होती दुनिया के लिए की गई भविष्यवाणियों से मेल खाता है.\

महाराष्ट्र के वसई में आई बाढ़ के दौरान पानी से होकर निकलते बारिश सवार. विशेषज्ञों में बारिश के मौसम में जलजमाव और बाढ़ को अनियंत्रित शहरीकरण का नजीता मानते हैं.
किस कीमत पर हो रहा है'विकास'
अक्सर, आधुनिकीकरण की होड़ में हम प्रकृति की उन सीमाओं को पार कर जाते हैं जिन्हें बनाए रखना जरूरी है. लेकिन हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि प्रकृति के दायरे में दखल देने के गंभीर नतीजे होते हैं. इससे प्राकृतिक घटनाओं की गंभीरता और बढ़ जाती है.
केरल की पर्यावरणविद् वीणा मारुथूर इस गहरे संकट के बारे में कहती हैं, ''इंसान विकास योजनाओं की अंधी दौड़ में शामिल है. हम पर्यावरण को हल्के में लेते हैं. कोई भी देश इससे अछूता नहीं है. हर साल हम गर्मी और तापमान के नए रिकॉर्ड बनाते हैं. नेता योजनाओं के आरामदेह माहौल में रहते हैं. उन्हें पता ही नहीं होता कि क्या हो रहा है. प्राकृतिक इकोसिस्टम खत्म हो रहे हैं. इससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है और इंसान इसमें तेजी लाने का काम कर रहा है."
मारुथूर इस बदलाव के पीछे एक बड़ी वजह की ओर इशारा करती हैं. वो कहती हैं, ''हमारा स्थानीय मौसम बदल रहा है. इस पर ध्यान देने की जरूरत है. पेड़ काटने से स्थानीय तापमान बढ़ता है, जिसका सीधा असर बारिश पर पड़ता है. केरल में पहले बारिश एक तय तरीके से होती थी, लेकिन अब यह अचानक और तेजी से होती है. भारी बारिश के ठीक बाद तेज धूप निकल आती है. यह एक बड़ा अंतर दिखाता है.''
विशेषज्ञों की चेतावनी है कि स्थानीय इकोलॉजी की अनदेखी ही इस बदलाव की वजह है. वे चेतावनी देते हैं कि जब मौसम को ध्यान में रखे बिना प्राकृतिक बनावट में बदलाव किया जाता है, तो शहर अचानक आने वाले पानी को संभालने की अपनी स्वाभाविक क्षमता को खो देते हैं.
गुजरात के रहने वाले अर्घ्यदीप हतुआ वॉकबिलिटी (पैदल चलने को आसान बनाने) और शहरी नीति के जानकार हैं. वो कहते हैं,"अहमदाबाद जैसे शहरों में, हम जलवायु परिवर्तन और तेजी से हो रहे शहरी विकास का मिला-जुला असर देख रहे हैं. बहुत ज्यादा कंक्रीट, कम पेड़ और खुली जगहों की कमी के कारण गर्मियों में शहर बहुत ज्यादा गर्म हो जाते हैं. जब बहुत भारी बारिश होती है तो पानी के प्राकृतिक रूप से निकलने की जगहें कम होती हैं, इससे बाढ़ और जल-जमाव की समस्या आती है. मौसम के बदलते इन पैटर्न से निपटने के लिए हमें ज्यादा हरियाली वाली जगहों, बेहतर जल निकासी व्यवस्था और स्मार्ट शहर योजना की जरूरत है."

गुजरात के सूरत में बारिश के बाद शहर की एक सड़क पर लगे पानी से होकर गुजरते लोग.
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आज ही करनी होगी बेहतर कल की तैयारी
इस बात पर किसी को हैरानी नहीं होगी कि विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन को इंसानी गतिविधियों से जोड़ते हैं. बार-बार आने वाली बाढ़ और खराब प्रबंधन यह दिखाते हैं कि हमारा शहरी इंजीनियरिंग सिस्टम देश की पर्यावरणीय वास्तविकताओं से कितने अलग-थलग हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बुनियादी ढांचा बनाते समय जलवायु में होने वाले उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखना चाहिए.
पर्यावरणविद् हेमा चारी इसी की हिमायती हैं. वो कहती हैं कि मजबूती बनाने के लिए प्राकृतिक इकोसिस्टम को केवल खाली जमीन या रियल एस्टेट समझने की सोच से बाहर आना होगा. वो कहती हैं,''हमने अपने प्राकृतिक बुनियादी ढांचे को कमजोर कर दिया है. वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि), बाढ़ के मैदान (floodplains), जंगल और पानी के प्राकृतिक बहाव के रास्ते मिलकर प्रकृति के स्पंज की तरह काम करते हैं. ये बारिश के पानी को हमारे शहरों तक पहुंचने से पहले सोख लेते हैं,पानी जमा करते हैं और उसकी गति को धीमा करते हैं. जब विकास के नाम पर ये इकोसिस्टम खत्म हो जाते हैं, तो कुछ घंटों की तेज बारिश भी शहरी इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है. हम अक्सर वेटलैंड्स और बाढ़ के मैदानों को विकास के इंतजार में पड़ी खाली ज़मीन समझते हैं. असल में, वे हमारे बाढ़ सुरक्षा तंत्र का हिस्सा हैं.''

महाराष्ट्र के वसई की हाईराइज सोसाइटियों के आसपास जमा बारिश का पानी.
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जलवायु के हिसाब से मजबूत बुनियादी ढांचे की जरूरत पर चारी कहती हैं,''महाराष्ट्र में हाल ही में आई बाढ़ और उससे हुई परेशानियां इस बात की याद दिलाती हैं कि जलवायु हमारे शहरों की योजना बनाने के तरीके से कहीं ज्यादा तेजी से बदल रही है.सड़कों, पुलों, सुरंगों और जल निकासी प्रणालियों को केवल उस जलवायु के हिसाब से नहीं बनाना चाहिए जिसमें हम पले-बढ़े हैं, बल्कि उस जलवायु के हिसाब से बनाना चाहिए जिसमें हम आज जी रहे हैं और जिसका सामना हम भविष्य में करेंगे.''
जलवायु परिवर्तन लंबे समय के लिए देश के मौसम के नक्शे को बदल सकता है. जैसे-जैसे मौसम के पैटर्न में उतार-चढ़ाव बढ़ रहा है, विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इसका समाधान हमारे शहरों को बेहतर ढंग से बसाने में है, ताकि मौजूदा संकट का प्रबंधन किया जा सके और भविष्य में ऐसे संकटों की संभावना को कम किया जा सके.
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