- देश की सबसे लंबी दूरी तय करने वाली ट्रेन 'विवेक एक्सप्रेस'. असम के डिब्रूगढ़ से कन्याकुमारी तक जाती है
- 4,200 KM से ज्यादा का फासला, 9 राज्यों की सीमाएं और 57 ठहराव. यात्रा करीब 80 घंटे पूरे 4 दिन ले लेती है
- पूरे सफर में 10 से 15 बार लोको पायलट (ड्राइवर) बदले जाते हैं. राज्य बदलते हैं, खान-पान का रंग भी बदल जाता है
डिब्रूगढ़-कन्याकुमारी. अगर आपको एक ही ट्रेन में लगातार चार दिन और चार रातें बितानी पड़ें, तो कैसा लगेगा. खिड़की के बाहर बदलती भाषाएं, बदलता खान-पान और भारत का कभी न खत्म होने वाला भूगोल. हम बात कर रहे हैं देश की सबसे लंबी दूरी तय करने वाली ट्रेन 'विवेक एक्सप्रेस' की.
अक्सर लोगों को लगता है कि भारत की सबसे लंबी ट्रेन कश्मीर से कन्याकुमारी के बीच चलती होगी, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल जुदा है. यह ट्रेन देश के सुदूर उत्तर-पूर्व यानी असम के डिब्रूगढ़ से अपनी रफ्तार पकड़ती है और भारत के अंतिम छोर तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक का सफर तय करती है. साल 2012 में स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती के मौके पर जब इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाई गई, तभी इसका नाम 'विवेक एक्सप्रेस' रखा गया था.
पटरियों पर 'मिनी भारत' का रोमांचक सफर
यह सिर्फ एक ट्रेन का सफर नहीं, बल्कि पटरियों पर दौड़ता हुआ पूरा हिंदुस्तान है. 4,200 किलोमीटर से ज्यादा का फासला, 9 राज्यों की सीमाएं और 57 ठहराव. ब्रह्मपुत्र की वादियों से शुरू होकर यह सफर पश्चिम बंगाल के हरे-भरे मैदानों, ओडिशा के तटीय इलाकों, आंध्र प्रदेश और केरल से गुजरते हुए हिंद महासागर के मुहाने पर आकर थमता है. टाइम-टेबल के मुताबिक यह दूरी करीब 75 घंटे की है, लेकिन हकीकत में यह यात्रा लगभग 80 घंटे यानी पूरे चार दिन ले लेती है.
10 से 15 बार बदलते हैं लोको पायलट
इतनी लंबी दूरी एक क्रू के बस की बात नहीं होती. पूरे सफर में 10 से 15 बार लोको पायलट (ड्राइवर) बदले जाते हैं, हालांकि ट्रेन का अटेंडेंट और कैटरिंग स्टाफ पूरे आठ दिन (आना और जाना) इसी डिब्बे को अपना घर बनाए रखता है.
थाली में बदलता भारत का स्वाद
जैसे-जैसे राज्य बदलते हैं, खान-पान का रंग भी बदल जाता है. असम की चाय और बंगाल की रसमलाई से शुरू होकर यह स्वाद आंध्र के तीखे भोजन और तमिलनाडु के डोसे-इडली तक पहुंचता है. आज ई-कैटरिंग के जरिए यात्री अलग-अलग स्टेशनों पर स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ भी ले सकते हैं.
चार दिन का सफर रोमांच से भरा है, तो सब्र की परीक्षा भी लेता है. मोबाइल नेटवर्क का बार-बार गायब होना, बोगियों में साफ-सफाई और पानी का संकट, और ट्रेन की देरी इस सफर की कड़वी सच्चाई भी हैं.
अगर आप मंजिल तक पहुंचने की हड़बड़ी में हैं, तो यह ट्रेन आपके लिए नहीं है. लेकिन अगर आप भारत की विविधता, उसकी आत्मा और पटरियों की धड़कन को महसूस करना चाहते हैं, तो विवेक एक्सप्रेस का यह सफर जिंदगी भर न भूलने वाला तजुर्बा बन जाता है.
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