- मिडिल ईस्ट के युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से भारत तक कच्चे तेल की सप्लाई में भारी बाधा आई है.
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से तेल कंपनियों को प्रतिदिन 10 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है
- पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की गई ताकि तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे का कुछ हिस्सा कम किया जा सके.
लंबे समय के बाद आखिरकार तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए हैं. पिछले 77 दिनों से मिडिल ईस्ट में युद्ध और टकराव की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिये भारत पहुंचने वाले करीब 40% कच्चे तेल की सप्लाई बुरी तरह बाधित हुई है. इसकी वजह से अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में न सिर्फ कच्चे तेल की कीमत काफी बढ़ गयी है, बल्कि पश्चिम एशिया के कई देशों में कच्चे तेल का प्रोडक्शन भी घट गया है.
सूत्रों के मुताबिक, इस बढ़ोतरी के बाद भी सरकारी तेल कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल और डीजल पर काफी ज्यादा नुकसान हो रहा है.
- तेल कंपनियों को कितना नुकसान हो रहा है?
- हर दिन सरकारी तेल कंपनियों को 1000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है
- हर महीने सरकारी तेल कंपनियों को 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है
- सरकारी तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी बढ़कर 1,98,000 करोड़ तक पहुंच गयी है
जाहिर है इस बड़े नुकसान की कुछ भरपाई के लिए पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतें बढ़ाई गयी हैं. इससे पहले सरकारी तेल कंपनियों पर तेल आयात के बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने के लिए भारत सरकार ने 27 मार्च, 2026 को पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर घटाने का फैसला किया था. सरकार ने आसमान छूती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के इस दौर में तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को कम करने के लिए taxation revenues छोड़ने का फैसला किया था.
लेकिन ये महत्वपूर्ण है कि संकट के इस दौर में राज्यों ने VAT/Sales Tax में कोई कमी नहीं किया है. राज्य सरकारों को पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले VAT/Sales Tax से हर साल लाखों करोड़ रुपये की कमाई होती है. इसीलिए, संकट के इस दौर में भी राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर VAT/Sales Tax घटाने के लिए तैयार नहीं हैं.

सेल्स टैक्स/VAT से कितना राजस्व मिला?
वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्यों को पेट्रोलियम, ऑयल और लुब्रिकेंट्स (POL) उत्पादों पर लगने वाले सेल्स टैक्स/VAT से कुल 3,02,058.5 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ. वहीं, वित्तीय वर्ष 2025-26 के पहले नौ महीनों में ही यह कलेक्शन 2,29,168.5 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जो दर्शाता है कि यह साधन राज्यों के लिए अहम कमाई का जरिया बना हुआ है. मौजूदा रुझानों को देखते हुए, यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो राज्यों की VAT और सेल्स टैक्स से होने वाली आय में और इजाफा होने की संभावना है, जिससे उनके वित्तीय संसाधनों को अतिरिक्त मजबूती मिल सकती है.
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