नेपाल में अभी बहुत दिन नहीं हुआ कि नदियों ने सैकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया. लांगटांग आपदा के एक महीने बाद कल शाम मस्टांग जिले के लेटे के पास पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा घाटी में गिर गया. काली गंडकी नदी का बहाव कुछ समय के लिए रुक गया था, लेकिन पानी ने फिर से मलबे के बीच से रास्ता बना लिया है और नदी बहने लगी है. इस घटना में किसी इंसानी जान का नुकसान नहीं हुआ है.
मगर रविवार को ही नेपाल के पश्चिमी पहाड़ी जिले मनांग में माउंट हिमलुंग के बेस कैंप इलाके में बर्फीला तूफान आने से कम से कम चार लोगों की मौत हो गई है और 12 लोग लापता हैं. मनांग के मुख्य जिला अधिकारी मुक्ति प्रसाद खनाल ने IANS को बताया, "अब तक घटना स्थल से चार लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं. बरामद किए गए दो शवों को काठमांडू भेज दिया गया है, जबकि दो अन्य शवों को घटना स्थल से एयरलिफ़्ट करके मनांग के जिला मुख्यालय चामे लाया गया है." माना जा रहा है कि जब इस इलाके में बर्फीला तूफान आया, तो 7,126 मीटर ऊंचे पहाड़ के बेस कैंप में अलग-अलग अभियान कंपनियों के दो दर्जन से ज्यादा अभियान गाइड और सपोर्ट स्टाफ मौजूद थे. वे शरद ऋतु में चढ़ाई के मौसम से पहले रस्सियां लगाने और टेंट लगाने के लिए वहां गए थे.खनाल ने बताया कि आपदा के बाद 11 लोगों ने संपर्क किया है. उन्होंने कहा कि जब उस इलाके में हिमस्खलन हुआ, तो पहाड़ के बेस कैंप में कुल 27 लोगों के मौजूद होने का अनुमान था.
मोटे तौर पर एक्सपर्ट इसे 4 भागों में बांटते हैं. पहला ग्लेशियरों का लगातार पिघलना, दूसरा हिमालय की संवेदनशील भौगोलिक संरचना में छेड़छाड़, तीसरा पहाड़ों और नदियों के पास अवैध निर्माण, और चौथा मौसम चक्र में बदलाव. आइए, एक-एक कर इनको समझते हैं.
- ग्लेशियरों का लगातार पिघलना: ग्लोबल वार्मिंग के कारण हर जगह के ग्लेशियर बड़ी तेजी से पिघल रहे हैं. हिमालय भी इससे अछूता नहीं है. इनके पिघलने से नई अस्थाई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलों का आकार खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है. तापमान बढ़ने से कई बार ग्लेशियर अचानक टूटकर इन झीलों में गिर जाते हैं, और अचानक बाढ़ आ जाती है. नेपाल-तिब्बत सीमा पर हाल में आई बाढ़ ग्लेशियर फटने के कारण ही आई थी. नेपाल और भारत का हिमालय से नाता सभी को पता ही है.
- हिमालय की संवेदनशील भौगोलिक संरचना से छेड़छाड़: हिमालय टेक्टोनिक प्लेटों के कारण अति संदेदनशील है. सरल भाषा में कहें तो भूकंप के लिए ये क्षेत्र काफी संवेदनशील माना जाता है. यहां की चट्टाने और मिट्टी बहुत ही संवेदनशील है, जब भी पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश होती है तो मिट्टी और चट्टानें पानी के साथ बहने लगती हैं. लगातार होते लैंडस्लाइड इसके उदाहरण हैं.
- पहाड़ों और नदियों के पास अवैध निर्माण: बढ़ते प्रदूषण के कारण अब हर कोई हिमालय, पर्वतों और नदियों के आसपास जाना चाह रहा है. इन क्षेत्रों में पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में स्थानीय लोग लगातार निर्माण पर निर्माण किए जा रहे हैं. लगातार बढ़ती भीड़ और निर्माण पर्वतों और नदियों पर दबाव बढ़ा रहे हैं. इसी तरह इन क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई भी लगातार जारी है. कई लोग तो नदियों से एक दम सटकर घर और होटल पर्यटकों और खरीदारों को लुभाने के लिए बना रहे हैं.
- मौसम चक्र में बदलाव: इन सबके कारण मॉनसून के दौरान बारिश का पैटर्न बदलता जा रहा है. बादल फटने की घटनाएं भी अब आम होती जा रही हैं. पहाड़ों पर कुछ ही घंटों में इतनी बरसात हो जा रही है कि बाढ़ की नौबत आ जा रही है. इसी तरह कई इलाकों में सूखे की स्थिति बन जा रही है. बेमौसम बरसात भी अब आम हो चुका है. यह सब प्रकृति को अंदर से हिला रहा है. प्रकृति गुस्से में कांप रही है.
भारत में 2024 में श्री वैष्णो देवी मंदिर में लैंडस्लाइड हुआ था. कारण त्रिकुटा पर्वत पर कई दिनों से मूसलाधार बारिश हो रही थी. जिससे पहाड़ की मिट्टी ढीली हो गई. भारी दबाव से मिट्टी और चट्टान भरभरा कर टीन के शेड पर गिरे और 34 श्रद्धालुओं की मौत हो गई. इसी तरह से उत्तराखंड से लेकर हिमाचल तक में लगातार आपदाएं भी यही संकेत दे रहे हैं कि नदियां, पहाड़, प्रकृति अब इंसानों के लालच को और बर्दाश्त करने से इनकार कर रहे हैं. वो लगातार संकेत दे रहे हैं कि बस करो! रुक जाओ! नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब तुम्हारे जीवन को चलाने वाले हम सब मिलकर तुम सबको काल के गाल में समा देंगे.
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