- भारत में दुनिया की लगभग 20 % आबादी रहती है जबकि रिन्यूएबल मीठे पानी का केवल चार प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध है.
- जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी और अनियमित बारिश से भारत में पानी का संकट और गंभीर होता जा रहा है.
- मॉनसून के दौरान औसत से तेरह प्रतिशत कम बारिश होने से कृषि और आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है.
"दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, लेकिन दुनिया के रिन्यूएबल मीठे पानी (renewable freshwater) का सिर्फ़ चार प्रतिशत हिस्सा ही यहां है. ऐसे में भारत को एक ऐसे संसाधन (पानी) को लेकर बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जो असमान रूप से बंटा हुआ है और काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर है. क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) इस समस्या को और गंभीर बना रहा है, क्योंकि बढ़ती गर्मी और अनियमित बारिश से पानी का संकट और गहरा रहा है". एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) के असिस्टेंट चीफ इकोनॉमिस्ट, जैंग पिंग थिया ने एनडीटीवी को दिए एक बयान में ये अहम बात कही है.
जैंग पिंग थिया के मुताबिक, पानी पर्यावरण और बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता) के साथ-साथ खेती, इंडस्ट्री और शहरों में होने वाली आर्थिक गतिविधियों का एक अहम आधार है. ऐसे में जब जल संसाधनों पर दबाव पड़ता है, तो बायोडायवर्सिटी और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े ये सभी पहलू खतरे में पड़ जाते हैं.
अलनीनो के कारण औसत से 13 फीसदी कम हुई बारिश
एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) का ये आंकलन ऐसे समय पर सामने आया है जब El Nino की वजह से दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सीजन के दौरान भारत में औसत से 13% कम बारिश रिकॉर्ड की गयी है. पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत के राज्यों में जून से सितम्बर के बीच बारिश की कमी सबसे ज़्यादा 26% रही, जबकि दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बारिश औसत से 24% कम रिकॉर्ड की गयी है.
देश में होने वाली कुल बारिश का लगभग 73% हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (जून से सितंबर) से आता है. देश के कुल बोए गए क्षेत्र का लगभग 40.7% हिस्सा बारिश पर निर्भर है और अनाज वाली फसलों के तहत आने वाले 37.4% क्षेत्र में भी खेती बारिश पर निर्भर है.

अभी 5 राज्यों का बड़ा इलाका सूखे की जद में
ऐसे में देश में खेती के उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण मॉनसून की बारिश औसत से कम होने से इसके असर को लेकर चिंता बढ़ रही है. कृषि मंत्रालय के मुताबिक, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश का रायलसीमा इलाका, तेलंगाना और राजस्थान के हिस्से सूखे से प्रभावित हुए हैं, हालाँकि कर्नाटक और महाराष्ट्र को छोड़कर दूसरे राज्यों से विस्तृत रिपोर्ट आना अभी बांकी है.
एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) के असिस्टेंट चीफ़ इकोनॉमिस्ट जैंग पिंग थिया के मुताबिक, पानी एक बेहद कीमती संसाधन है, लेकिन अकसर इसे जितना महत्व दिया जाना चाहिए वो नहीं दिया जाता है. भारत पानी की ज़्यादा खपत वाले सामानों का सबसे बड़ा निर्यातक है, लेकिन पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को भी बेहतर ढंग से ध्यान में रखा जाना चाहिए.
जैंग पिंग थिया ने एनडीटीवी से कहा, "पानी की दरों (टैरिफ) को तय करने के तरीके में बदलाव करके बहुत ज़रूरी निवेश के लिए फंड जुटाने और प्रकृति संरक्षण में मदद मिल सकती है. यह एक बड़ी चुनौती भी है और बदलाव लाने का एक बड़ा मौका भी.”
साल के अंत तक और मजबूत होगा अलनीनो
भारत मौसम विभाग ने बुधवार को दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सीजन के दौरान बारिश पर जारी अपनी रिपोर्ट में कहा - अभी इक्वेटोरियल पैसिफ़िक महासागर (equatorial Pacific Ocean) में मज़बूत अल नीनो की स्थिति बनी हुई है, और समुद्र की सतह का तापमान औसत से काफी ज़्यादा है (खासकर पूर्वी-मध्य और पूर्वी इक्वेटोरियल पैसिफ़िक में). मॉनसून मिशन कपल्ड फ़ोरकास्ट सिस्टम (MMCFS) और दूसरे प्रमुख क्लाइमेट मॉडल के अनुमान बताते हैं कि साल के आखिर तक अल नीनो और मज़बूत होता रहेगा.
वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन (WMO) ने भी आगाह किया है कि अल नीनो पूरी तरह से स्थापित हो चुका है और आने वाले महीनों में यह और भी मज़बूत हो जाएगा. इससे बारिश और तापमान के पैटर्न पर बड़ा असर पड़ेगा और बाढ़, सूखे और भीषण गर्मी का खतरा भी बढ़ जाएगा. जाहिर है, आने वाले महीनों के दौरान भारत में पानी के मोर्चे पर चुनौती और बड़ी हो सकती है.
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